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SUPREME COURT HEADNOTES

📑 17 FEBRUARY 2023

राम गोपाल पुत्र मंशाराम बनाम मध्य प्रदेश राज्य
SPECIAL LEAVE PETITION (Crl.) No. 9221 OF 2018
बेंच – जस्टिस अजय रस्तोगी और बेला त्रिवेदी

[ इंडियन एविडेंस एक्ट 1872 – लास्ट सीन थ्योरी ]

एक बार अभियोजन पक्ष ने यह साबित कर दिया कि पीड़िता को आखिरी बार आरोपी के साथ देखा गया था,

तो अभियुक्त को स्पष्टीकरण देना होगा

अर्थात एक बार “लास्ट सीन टुगेदर” का सिद्धांत अभियोजन पक्ष द्वारा स्थापित हो जाने के बाद, अभियुक्त से कुछ स्पष्टीकरण देने की अपेक्षा की जाती हैं कि कब और किन परिस्थितियों में उसने मृतक के साथ को अलग किया था

यदि अभियुक्त कोई स्पष्टीकरण नहीं देता है या गलत स्पष्टीकरण प्रस्तुत करता है, फरार हो जाता है, मकसद स्थापित हो जाता है और हथियार आदि की बरामदगी के रूप में कुछ अन्य सहायक सबूत परिस्थितियों की एक श्रृंखला स्थापित करते हैं,

तो इस तरह के सबूतों के आधार पर सजा हो सकती है

📑 15 FEBRUARY 2023

पंचम लाल पांडे बनाम नीरज कुमार मिश्रा
SLP(C) 3329/2021
बेंच – जस्टिस वी रामासुब्रमण्यन और जस्टिस पंकज मिथल

पुनर्विलोकन का प्रावधान निर्णय की शुद्धता की जांच करने के लिए नहीं होता है,

यह उस त्रुटि को ठीक करने के लिए है, यदि कोई जो आदेश / रिकॉर्ड के चेहरे पर दिखाई दे रही है,

इस बात पर ध्यान दिए बिना कि क्या कोई अन्य राय भिन्न होने की संभावना है।

📑 13 FEBRUARY 2023

हाजी अब्दुल गनी खान व अन्य बनाम भारत संघ और अन्य
WP(C) No. 237 of 2022
बेंच – जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस अभय एस. ओका

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने जम्मू-कश्मीर में परिसीमन की कवायद को बरकरार रखते हुए कहा

” संसद एक राज्य को केंद्र शासित प्रदेश में बदल सकती है “

पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 3 में प्रावधान है कि संसद कानून द्वारा नए राज्यों का गठन कर सकती है और मौजूदा राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों को बदल सकती है।

अनुच्छेद 3 के अनुसार, एक “राज्य” में “केंद्र शासित प्रदेश” भी शामिल है

◾ कोर्ट ने कहा, “अनुच्छेद 3 के खंड (ए) के तहत संसद की शक्ति, एक नया राज्य बनाने या नया केंद्र शासित प्रदेश, राज्य की सीमा बदलने के लिए एक कानून बनाने की शक्ति शामिल है।

◾ अनुच्छेद 3 के स्पष्टीकरण II में कहा गया है कि खंड (ए) द्वारा संसद को प्रदत्त शक्ति में किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के किसी हिस्से को किसी अन्य राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के साथ मिलाकर एक नया राज्य या केंद्र शासित प्रदेश बनाने की शक्ति शामिल है।“

📑 10 FEBRUARY 2023

बार काउंसिल ऑफ इंडिया बनाम बोनी फोई लॉ कॉलेज व अन्य
Special Leave Petition (Civil) No. 22337 of 2008
बेंच – जस्टिस संजय किशन कौल , संजीव खन्ना , एएस ओका , विक्रम नाथ और जेके माहेश्वरी

” एक नामांकित वकील, जो काफी समय के लिए गैर – कानूनी पेशे में काम कर रहे हैं,

और वे कानूनी पेशे में वापस आना चाहते हैं तो उन्हें दोबार बार एग्जाम देना होगा । “

एक सक्रिय लीगल प्रैक्टिस और एक असंबद्ध नौकरी की आवश्यकताएं अलग-अलग हैं। यहां तक कि अगर किसी व्यक्ति के पास कानून की डिग्री या नामांकन है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि अदालत की सहायता करने की उसकी क्षमता उसके साथ बनी रहेगी अगर किसी असम्बद्ध नौकरी में लंबा अंतराल है

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सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ अखिल भारतीय बार परीक्षा की वैधता को बरकरार रखती है

” अभ्यास के लिए ऐसी शर्त निर्धारित करने के लिए बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अधिकार को मान्यता देती है तथा वी. सुदीर बनाम बार काउंसिल ऑफ इंडिया, (1999) 3 SCC 176 में निर्णय को रद्द करती है ,

जिसमें शीर्ष अदालत ने कहा था कि अधिवक्ता अधिनियम की धारा 24 में उल्लिखित शर्तों के अलावा कोई भी शर्त कानून का अभ्यास करने के इच्छुक व्यक्ति पर नहीं लगाई जा सकती “

गैस प्वाइंट पेट्रोलियम इंडिया लिमिटेड बनाम राजेंद्र मारोथी
Civil Appeal 619 of 2023
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस सीटी रविकुमार

आदेश 21 नियम 84 सीपीसी के तहत नीलामी क्रेता द्वारा राशि का 25% जमा करना अनिवार्य,

खरीद की पूरी राशि का भुगतान बिक्री की तारीख से पंद्रह दिनों के भीतर किया जाना चाहिए

📑 09 FEBRUARY 2023

पी शिवकुमार बनाम राज्य
CrA 1404-1405 OF 2012
बेंच – जस्टिस बीआर गवई और विक्रम नाथ

[ भारतीय दंड संहिता, 1860; धारा 498ए ]

आईपीसी की धारा 498-ए के तहत दी गई सजा टिकाऊ नहीं होगी, जब शादी को अमान्य पाया जाता है

इस मामले में अभियुक्तों को आईपीसी की धारा 498-ए और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 के तहत दंडनीय अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया था। सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अपील में, यह तर्क दिया गया था कि पार्टियों के बीच विवाह को मद्रास उच्च न्यायालय के फैसले से शून्य माना गया है, अतः आईपीसी की धारा 498-ए के तहत दोषसिद्धि टिकाऊ नहीं होगी।

📑 08 FEBRUARY 2023

एम/एस गैस अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड बनाम एम/एस इंडियन पेट्रोकेमिकल्स कॉर्पोरेशन लिमिटेड और अन्य 
Civil Appeal No. 3504-3505 of 2010
बेंच – न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति अभय एस ओका

अगर राज्य निष्पक्ष रहने में विफल रहता है या भेदभाव करता है,

तो अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय के रिट क्षेत्राधिकार का उपयोग संविदात्मक व्यवहार में भी किया जा सकता है

📑 02 FEBRUARY 2023

बैनी प्रसाद एलआर बनाम दुर्गा देवी
Civil Appeal 6182-6183 of 2009
बेंच – जस्टिस सीटी रविकुमार

एक अतिक्रमणकर्ता को ‘अंतरिती’ के रूप में नहीं माना जा सकता है,

इसलिए TP ACT 1882 की धारा 51 के तहत ‘आवश्यकता के अधिकार’ का दावा नहीं किया जा सकता

धारा 51 एक अंतरिती के संदर्भ में लागू होता है जो एक संपत्ति पर सद्भाव में सुधार करता है जो खुद को उसका पूर्ण मालिक मानता है,

धारा 51 को आकर्षित करने के लिए भूमि के अधिभोगी का कब्जा हक में और उसका कब्जा वास्तविक मालिक के शीर्षक ( Tittle ) के प्रतिकूल होना चाहिए।

उसे इस दृढ़ विश्वास के तहत होना चाहिए कि उसने प्रश्न में संपत्ति के लिए अच्छा शीर्षक ( Title ) हासिल किया है और वह उसका मालिक है

📑 01 FEBRUARY 2023

गोदरेज सारा ली लिमिटेड बनाम एक्साइज एंड टैक्सेशन ऑफिसर कम असेसिंग अथॉरिटी
Civil Appeal 5393 of 2010
बेंच – जस्टिस एस रवींद्र भट और दीपांकर दत्ता

Constitution of India, 1950 Article 226

“रिट याचिका को वैकल्पिक उपाय के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता है,

जहां कानून का प्रश्न शामिल”

अर्थात जहां विवाद विशुद्ध रूप से कानूनी है और इसमें तथ्य के विवादित प्रश्न शामिल नहीं हैं, बल्कि केवल कानून के प्रश्न शामिल हैं,

तो वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने के आधार पर रिट याचिका को खारिज करने के बजाय उच्च न्यायालय द्वारा निर्णय लिया जाना चाहिए

📑 31 JANUARY 2023

In Re Policy Strategy for Grant of Bail SMW (Crl.) No. 4/2021
बेंच – जस्टिस संजय किशन कौल और अभय एस ओका

“ऐसे मामलों में जहां विचाराधीन कैदी या दोषी अनुरोध करे कि वह रिहा होने के बाद ज़मानत बॉन्ड या ज़मानत राशि दे सकता है, तो एक उपयुक्त मामले में, अदालत आरोपी को एक निर्दिष्ट अवधि के लिए अस्थायी जमानत देने पर विचार कर सकती है, ताकि वह ज़मानत बॉन्ड या ज़मानत राशि जमा कर सके।’’

अगर ज़मानत मंजूर करने की तारीख से एक महीने के भीतर ज़मानत बॉन्ड नहीं भरा जाता, तो संबंधित अदालत इस मामले को स्वत: संज्ञान में ले सकती है और विचार कर सकती है कि क्या ज़मानत की शर्तों में संशोधन या छूट की जरूरत है।”

◾शीर्ष अदालत के निर्देश

• किसी विचाराधीन कैदी या दोषी को ज़मानत देने वाली अदालत को उसी दिन या अगले दिन जेल अधीक्षक के माध्यम से आदेश की प्रति ई-मेल पर उपलब्ध करानी होगी।

• जेल अधीक्षक को ई-जेल सॉफ्टवेयर (या जेल विभाग द्वारा उपयोग किए जा रहे किसी अन्य सॉफ्टवेयर) में ज़मानत देने की तारीख दर्ज करनी होगी।

• यदि ज़मानत देने की तारीख से सात दिन की अवधि के भीतर आरोपी को रिहा नहीं किया जाता है, तो यह जेल अधीक्षक का कर्तव्य होगा कि वह सचिव, डीएलएसए को सूचित करें, जो किसी अर्ध-कानूनी स्वयंसेवक या जेल का दौरा करने वाले अधिवक्ता की प्रतिनियुक्ति कर सकते हैं। कैदी के साथ बातचीत करें और उसकी रिहाई के लिए हरसंभव तरीके से कैदी की मदद करें।

• राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र को ई-जेल सॉफ्टवेयर में आवश्यक स्थान बनाने के प्रयास करने का भी निर्देश दिया, ताकि जमानत देने की तारीख और रिहाई की तारीख जेल विभाग द्वारा दर्ज की जा सके और यदि कैदी सात दिन के भीतर रिहा नहीं होता एक स्वचालित ई-मेल डीएलएसए सचिव को भेजा जा सके।

जोसेफिन शाइन बनाम भारत संघ
बेंच – न्यायमूर्ति केएम जोसेफ, न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी, न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस, न्यायमूर्ति हृषिकेश रॉय और न्यायमूर्ति सीटी रविकुमार की संविधान पीठ 

भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को समाप्त करने के बावजूद,

सशस्त्र बल के कार्मिक व्यभिचार के लिए अनुशासनात्मक कार्रवाई का सामना करने के लिए उत्तरदायी

◾ पीठ ने स्पष्ट किया कि उसके 2018 के फैसले से भारतीय दंड संहिता की धारा 497 (जो कि व्यभिचार को अपराध मानती है) को रद्द कर दिया गया है, व्यभिचार के लिए सशस्त्र बलों की सेवा करने वाले कर्मियों के खिलाफ शुरू की गई कोर्ट मार्शल की कार्यवाही को प्रभावित नहीं करेगा।

◾ 2018 का फैसला सशस्त्र बल अधिनियमों के प्रावधानों से बिल्कुल भी संबंधित नहीं था। पीठ ने आगे कहा कि संविधान के अनुच्छेद 33 के अनुसार, सशस्त्र बलों को नियंत्रित करने वाले कानून मौलिक अधिकारों की प्रयोज्यता से छूट प्रदान कर सकते हैं।

📑 30 JANUARY 2023

रंगप्पा जवूर बनाम कर्नाटक राज्य
SLP(Crl) Diary 33313/2019 |
बेंच – जस्टिस संजीव खन्ना और एमएम सुंदरेश

( भारत का संविधान, 1950 – अनुच्छेद 142 / दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 – धारा 482 )

वैवाहिक विवादों से संबंधित अपराधों के मामलों में पार्टियों के बीच आपराधिक कार्यवाही को रद्द किया जा सकता है,

अगर अदालत संतुष्ट है कि पार्टियों ने वास्तव में विवादों को सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझा लिया है

◼ क्या था मामला

इस मामले में पत्नी द्वारा दर्ज कराई गई FIR के अनुसार पति पर भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए, 427, 504 और 506 के तहत आरोप लगाया गया था। दंपति ने एक समझौता किया और आपसी सहमति से तलाक की डिक्री मंजूर कर ली गई।

पक्षकार इस बात पर भी सहमत हुए कि FIR और उससे उत्पन्न होने वाली कार्यवाही को रद्द कर दिया जाना चाहिए।

लेकिन कर्नाटक उच्च न्यायालय ने पति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की प्रार्थना को खारिज कर दिया था

उषा चक्रवर्ती और अन्य बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य
SLP (Criminal) 5866 of 2022
बेंच – जस्टिस अजय रस्तोगी और सीटी रविकुमार

धारा 482 सीआरपीसी के तहत शक्तियों के प्रयोग में आपराधिक कार्यवाही को रद्द किया जा सकता है,

जब यह पाया जाता है कि एक विवाद को “आपराधिक अपराध का लबादा” देने का प्रयास किया गया था जो अनिवार्य रूप से दीवानी प्रकृति का है

नईम अहमद बनाम राज्य (दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र)
CrA 257 OF 2023
बेंच – जस्टिस अजय रस्तोगी और बेला एम. त्रिवेदी

Code of Criminal Procedure, 1973 Section 277

गवाह के बयान को केवल अंग्रेजी भाषा के रूप में दर्ज करने की प्रथा को अस्वीकार किया जाता है ,

जब गवाह एक अलग भाषा में गवाही देता है तो गवाह के साक्ष्य को अदालत की भाषा में या गवाह की भाषा में जैसा भी संभव हो दर्ज किया जाना चाहिए और फिर रिकॉर्ड का हिस्सा बनने के लिए अदालत की भाषा ( अंग्रेजी ) में इसका अनुवाद किया जाना चाहिए।

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सहमति से किया गया बलात्कार – झूठे वादे और वादे के उल्लंघन के बीच अंतर

शादी करने के वादे के प्रत्येक उल्लंघन को झूठा वादा मानना ​​और धारा 376 के तहत किसी व्यक्ति पर अपराध के लिए मुकदमा चलाना मूर्खता होगी।

अदालत को बहुत सावधानी से जांच करनी चाहिए कि क्या अभियुक्त वास्तव में पीड़िता से शादी करना चाहता था या दुर्भावनापूर्ण मंशा थी, और केवल उसकी वासना संतुष्ट करने के लिए इस आशय का झूठा वादा किया था

• अदालत को यह जांच करनी चाहिए कि क्या प्रारंभिक चरण में अभियुक्त द्वारा शादी का झूठा वादा किया गया था; और

• क्या शामिल सहमति पूरी तरह से यौन लिप्तता की प्रकृति और परिणामों को समझने के बाद दी गई थी। 

• ऐसा कोई मामला हो सकता है जहां अभियोजिका अभियुक्त के लिए अपने प्यार और जुनून के कारण संभोग करने के लिए सहमत हो, न कि केवल अभियुक्त द्वारा उसे दी गई गलतबयानी के कारण या जहां अभियुक्त परिस्थितियों के कारण ऐसा नहीं कर सका जहा ऐसा करने का हर इरादा होने के बावजूद, उससे शादी करने में असमर्थ था। 

ऐसे मामलों को अलग तरह से ट्रीट किया जाना चाहिए। एक अभियुक्त को बलात्कार के लिए केवल तभी दोषी ठहराया जा सकता है जब अदालत इस निष्कर्ष पर पहुँचती है कि अभियुक्त का इरादा दुर्भावनापूर्ण था और उसकी गुप्त मंशा थी।

📑 25 JANUARY 2023

एलुमलाई @वेंकेटशन और अन्य बनाम एम कमला और अन्य
Civil Appeal 521-522 /2023
बेंच – जस्टिस केएम जोसेफ और जस्टिस हृषिकेश रॉय

जब एक बेटा पिता की स्व-अर्जित संपत्ति पर अधिकार छोड़ देता है, तो एस्टोपेल का सिद्धांत लागू होता है और उसके बेटों का उस संपत्ति पर दावा नहीं होता

संपत्ति पर दावा करने से एस्टॉपेल यानी विबंधन के प्रभाव को उन व्यक्तियों द्वारा दावा नहीं किया जा सकता है जिनके आचरण ने एस्टॉपेल उत्पन्न किया है।

📑 24 JANUARY 2023

तलत सान्वी बनाम झारखंड राज्य
Criminal Apeal 205/2023
बेंच – जस्टिस संजय किशन कौल और अभय एस. ओका

[ दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 धारा 357 ]

अंतरिम पीड़ित प्रतिकर अग्रिम जमानत के लिए एक शर्त के रूप में नहीं लगाया जा सकता है,

अंतरिम पीड़ित प्रतिकर का प्रश्न जमानत न्यायशास्त्र का हिस्सा नहीं हो सकता

शरीर के खिलाफ अपराधों के मामलों में पीड़ित को प्रतिकर अनावश्यक उत्पीड़न को रोकने के लिए है , जहां अर्थहीन आपराधिक कार्यवाही शुरू की गई है

लेकिन इस तरह के प्रतिकर को जमानत देने के चरण में शायद ही निर्धारित किया जा सकता है

संजीव कुमार सिंह बनाम बिहार राज्य
Special Leave to Appeal (C) No(s). 19038/2022
बेंच – जस्टिस एएस बोपन्ना और हिमा कोहली

केवल अपील दायर करना डिक्री के स्थगन के रूप में कार्य नहीं करेगा

सीपीसी के आदेश 41 नियम 5 में निहित प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए,

जब तक अपील को सूचीबद्ध नहीं किया जाता है, कोई अंतरिम आदेश नहीं होता

बहारुल इस्लाम बनाम इंडियन मेडिकल एसोसिएशन
CIVIL APPEAL NOS. OF 2023
(@ SLP(C) Nos. 32592-32593 of 2015)
बेंच – जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस बीवी नागरत्ना

विधायिका सीधे न्यायिक निर्णय को रद्द नहीं कर सकती है। लेकिन जब एक सक्षम विधायिका निर्णय को अप्रभावी बनाने के लिए निर्णय के आधार या आधार को पूर्वव्यापी रूप से हटा देती है,

तो उक्त अभ्यास एक वैध विधायी अभ्यास है, बशर्ते यह किसी अन्य संवैधानिक सीमा का उल्लंघन न करे।

संक्षेप में कहा जाए तो विधायिका किसी फैसले को सीधे खारिज नहीं कर सकती, लेकिन इसे अप्रभावी बनाने के लिए इसकी नींव को पूर्वव्यापी रूप से हटा सकती हैं

ऐसा विधायी उपकरण जो पिछले कानून में दोष को दूर करता है जिसे असंवैधानिक घोषित किया गया है, न्यायिक शक्ति पर अतिक्रमण नहीं बल्कि निरसन का एक उदाहरण माना जाता है।

सामान्य कारण बनाम यूओआई एमए
1699/2019 in WP(C) No. 215/2005
बेंच – जस्टिस केएम जोसेफ, जस्टिस अजय रस्तोगी, जस्टिस अनिरुद्ध बोस, जस्टिस हृषिकेश रॉय और जस्टिस सीटी रविकुमार

सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेसिया (इच्छामृत्यु) पर दिए अपने आदेश में संशोधन किया, जल्द इस पर विस्तृत आदेश जारी किया जाएगा

2018 में कोर्ट ने नागरिकों को लिविंग विल (Living Will) का अधिकार दिया था, इसके तहत कोई व्यक्ति होश में रहते यह लिख सकता है कि गंभीर बीमारी की स्थिति में उसे लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर जबरन जिंदा न रखा जाए

सख्त प्रक्रिया के चलते लोग इस अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं, कोर्ट ने कहा है कि वह लिविंग विल पर ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट की मंजूरी जैसी अनिवार्यता को खत्म करेगा – मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट की समय सीमा भी तय की जाएगी

प्रसाद प्रधान बनाम छत्तीसगढ़ राज्य
CRA 2025 of 2022
बेंच – जस्टिस कृष्ण मुरारी और एस रवींद्र भट

भारतीय दंड संहिता, 1860 धारा 300

• [ “गंभीर और अचानक” उत्तेजना को लागू करने के लिए तर्कसंगतता का मानक ] केवल लंबे समय से चल रहा विवाद अपवाद को आकर्षित नहीं करता है।

• कोई रूढ़िवादी धारणा या सूत्र नहीं हो सकता है कि जहां मृत्यु कुछ समय के अंतराल के बाद होती है ( चोटें जो मौत का कारण बनी ) अपराध एक है गैर इरादतन मानववध का है

प्रत्येक मामले की अपनी अनूठी तथ्य स्थिति होती है, जो महत्वपूर्ण है वह चोट की प्रकृति है – क्या यह सामान्य रूप से मृत्यु की ओर ले जाने के लिए पर्याप्त है

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भारतीय दंड संहिता, 1860, धारा 302 – हत्या

अपीलकर्ताओं द्वारा हमले की प्रकृति और अभियोजन पक्ष के गवाहों की चश्मदीद गवाही की गुणवत्ता पर संदेह नहीं किया जा सकता है,

यदि परिस्थिति यह है कि अधिकांश गवाह मृतक से संबंधित थे

📑 20 JANUARY 2023

सौरव दास बनाम यूनियन ऑफ इंडिया
W.P.(C) No. 1126/2022
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस सीटी रविकुमार

चार्जशीट ‘पब्लिक डॉक्यूमेंट’ नहीं, जांच एजेंसियों को उन्हें वेबसाइटों पर अपलोड करने का निर्देश नहीं दे सकते

सिर्फ इसलिए कि FIR अपलोड की जाती हैं, चार्जशीट को वेबसाइटों पर अपलोड करने का निर्देश नहीं दिया जा सकता है।

साक्ष्य अधिनियम की धारा 74 में उल्लिखित दस्तावेजों को ही सार्वजनिक दस्तावेज कहा जा सकता है। आवश्यक सार्वजनिक दस्तावेजों के साथ चार्जशीट की प्रति साक्ष्य अधिनियम की धारा 74 के तहत सार्वजनिक दस्तावेज के दायरे में नहीं आती

◼ चार्जशीट तक मुफ्त सार्वजनिक पहुंच की मांग करने वाली जनहित याचिका को खारिज करते हुए जस्टिस एम आर शाह और सी टी रविकुमार की पीठ ने कहा कि चार्जशीट अपलोड करना दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के प्रावधानों के विपरीत होगा।

◼ इस मामले में अधिवक्ता प्रशांत भूषण का कहना था कि यह प्रत्येक सार्वजनिक प्राधिकरण का कर्तव्य है कि वह उस सूचना को स्वत: संज्ञान में लाए। अधिवक्ता भूषण ने कहा, “जनता को यह जानने का अधिकार है कि कौन आरोपी है और किसने अपराध को अंजाम दिया है।

मनुभाई सेंधाभाई भारवाड़ और अन्य बनाम तेल और प्राकृतिक गैस निगम लिमिटेड और अन्य
Civil Appeal No. __/ 2023 (Arising from SLP (Civil) No. 13885/2022)
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस एमएम सुंदरेश

‘अस्थायी अधिग्रहण’ को कई वर्षों तक जारी रखना मनमाना होगा

और इसे भारत के संविधान के अनुच्छेद 300ए के तहत गारंटीकृत संपत्ति का उपयोग करने के अधिकार का उल्लंघन कहा जा सकता है

भूमि मालिक अस्थायी भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया पर सवाल उठा सकते हैं यदि यह लंबे समय से लंबित है ,अस्थायी भूमि अधिग्रहण 20 साल तक नहीं चल सकता

📑 18 JANUARY 2023

राजाराम श्रीरामुलु नायडू (डी) बनाम मारुथचलम (डी)
Criminal Apeal 2013/ 1978
बेंच – जस्टिस बी आर गवई और जस्टिस एम एम सुंदरेश

दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 धारा 378 दोषमुक्ति के खिलाफ अपील में हस्तक्षेप का दायरा सीमित

जब तक हाईकोर्ट यह नहीं पाता कि साक्ष्य की सराहना विकृत है, तब तक वह ट्रायल कोर्ट द्वारा दर्ज दोषमुक्ति के निष्कर्ष में हस्तक्षेप नहीं कर सकता

📑 17 JANUARY 2023

श्री राम श्रीधर चिमुरकर बनाम भारत संघ
SLP(C) 21876/ 2017
बेंच – जस्टिस के एम जोसेफ और जस्टिस बी वी नागरत्ना

एक सरकारी कर्मचारी की विधवा पत्नी द्वारा अपने पति की मृत्यु के बाद गोद लिया गया बच्चा पारिवारिक पेंशन का हकदार नहीं होगा

पेंशन नियमावली में ‘दत्तक ग्रहण’ शब्द सरकारी कर्मचारी द्वारा उसके कार्यकाल के दौरान गोद लेने तक सीमित होना चाहिए. उसके जीवनकाल और उसकी मृत्यु के बाद सरकारी कर्मचारी के जीवित पति या पत्नी द्वारा गोद लेने के मामले में विस्तारित नहीं किया जाना चाहिए

ऐसा इसलिए क्योंकि प्रावधान का उद्देश्य एक बेटे को 25 वर्ष की आयु प्राप्त करने और अविवाहित/विधवा या तलाकशुदा बेटी को सहायता देना है

पीठ ने कहा कि सरकारी कर्मचारी के निधन के बाद पैदा हुए बच्चे और उसके निधन के बाद गोद लिए गए बच्चे के अधिकार पूरी तरह अलग हैं.

👉 हिंदू एडॉप्शन एंड मेंटिनेंस एक्ट (HAMA) 1956 की धारा 8 और 12 एक हिंदू महिला को अनुमति देती है. अगर महिला नाबालिग या मानसिक रूप से अस्वस्थ नहीं है तो वह एक बेटा या बेटी को गोद ले सकती है. 

👉 इस एक्ट के तहत एक हिंदू महिला अपने पति की सहमति के बिना बच्चा या बच्ची को गोद नहीं ले सकती. हालांकि हिंदू विधवा, तलाकशुदा महिला या मानसिक रूप से विक्षिप्त पति के संबंध में ऐसी कोई पूर्व शर्त लागू नहीं होती है.

जाबिर बनाम उत्तराखंड राज्य
Criminal Apeal 972 of 2013
बेंच – जस्टिस एस रवींद्र भट और पीएस नरसिम्हा

[ क्रिमिनल ट्रायल – लास्ट सीन डॉक्ट्रिन ]

“आखिरी बार देखा गया” सिद्धांत का सीमित अनुप्रयोग है,

जहां मृतक को अभियुक्त के साथ आखिरी बार देखे जाने और हत्या के समय के बीच का समय अंतराल संकीर्ण है;

अदालत को किसी अभियुक्त को केवल “आखिरी बार देखे जाने” ( last scene doctrine ) की परिस्थिति के आधार पर दोषी नहीं ठहराना चाहिए

◼ यह भी जानना जरूरी

👉 यह सिद्धांत भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 7 से अपनी प्रासंगिकता प्राप्त करता है जिसे “आगमनात्मक तर्क का सिद्धांत” कहा जाता है जिसमें यह कहा गया है कि यदि अवसर, कारण या प्रभाव से संबंधित कोई भी तथ्य उस परिस्थिति की ओर ले जाता है जिसमें वह वस्तु घटित हुई थी या इसने उस चीज़ के घटित होने का अवसर प्रदान किया है तो वे तथ्य प्रासंगिक होंगे। 

👉 और लास्ट सीन थ्योरी में भी जो व्यक्ति पीड़ित के साथ आखिरी बार मौजूद था, उसके पास अपराध करने का उचित अवसर होगा की उपधारणा ( धारा 114 ) की जाती है

📑 16 JANUARY 2023

स्टेट थ्रू सीबीआई वीएस गंगी रेड्डी
SLP (CRL) No. 9573/2022
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और सीटी रविकुमार

क्या चार्जशीट पेश करने के बाद डिफॉल्ट जमानत को रद्द किया जा सकता है ?

अगर चार्जशीट दायर करने पर विशेष और मजबूत मामला बनता है,

तो आरोपी को दी गई डिफॉल्ट जमानत रद्द की जा सकती है

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डिफॉल्ट जमानत को रद्द करने के लिए केवल चार्जशीट दाखिल करना ही काफी नहीं,

( जब चार्जशीट से विशेष कारण बनते हैं और चार्जशीट गैर-जमानती अपराध का खुलासा करती है तो सीआरपीसी की धारा 167 (2) के प्रावधान के तहत आरोपी को दी गई डिफ़ॉल्ट जमानत रद्द की जा सकती है। )

डिफ़ॉल्ट जमानत को रद्द करने के मामले पर अदालत द्वारा विचार किया जाना है

  1. जिन दोषों के लिए डिफ़ॉल्ट जमानत दी गई थी, उन्हें ठीक किया गया है।
  2. अभियुक्त द्वारा गैर-जमानती अपराध किए जाने के विस्तार के बाद दायर आरोपपत्र से विशेष और मजबूत कारण बनाए गए हैं और
  3. धारा 437(5) और धारा 439(2) में निर्धारित आधारों पर विचार करते हुए गुण-दोष के आधार पर जमानत रद्द की जा सकती है।

📑 12 JANUARY 2023

प्रकाश नयी @ सेन बनाम गोवा राज्य
Criminal Apeal 2010 of 2010
बेंच – जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस एमएम सुंदरेश

[ विकृत चित्त वाले व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य – कब अपराध नहीं ]

“मात्र अस्वस्थ मस्तिष्क अपने आप में पर्याप्त नहीं होगा – मात्र चिकित्सीय पागलपन को चित्त की अस्वस्थता नहीं कहा जा सकता”

न्यायालय की संतुष्टि के लिए यह साबित करने का भार अभियुक्त पर है कि गैर-कानूनी कार्य करते हुए वह पागल था। इस प्रकार के बोझ को प्रथम दृष्टया मामले और उसकी ओर से पेश की गई उचित सामग्री के आधार पर निर्वाह किया जाना है

पागलपन की दलील साबित करने के लिए अभियुक्त पर सबूत का बोझ संभाव्यता की प्रबलता में से एक है, यह इस कारण से है कि विकृत दिमाग के व्यक्ति से उचित संदेह से परे अपना पागलपन साबित करने की उम्मीद नहीं की जाती।

📑 5 JANUARY 2023

रोहन धुंगट बनाम गोवा राज्य और अन्य
Diary No. 29535 – 2022
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस सीटी रविकुमार

पैरोल अवधि – कैदी की समय से पहले रिहाई पर विचार करते हुए कैदी को दी गई पैरोल की अवधि को

सजा की अवधि से बाहर रखा जाना चाहिए।

◾बांबे हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस सीटी रविकुमार की पीठ ने कहा, ’14 वर्ष के वास्तविक कारावास पर विचार करने के दौरान पैरोल की अवधि शामिल करने की कैदियों की ओर से दी गई दलील को अगर स्वीकार कर लिया जाए तो कोई प्रभावशाली कैदी कई बार पैरोल हासिल कर सकता है

◾ क्योंकि इस पर कोई प्रतिबंध नहीं है और इसे कई बार प्रदान किया जा सकता है। अगर कैदियों की ओर दी गई दलील को स्वीकार कर लिया जाए तो वास्तविक कारावास का उद्देश्य ही निष्फल हो जाएगा।

◾ पैरोल हमेशा थोड़े समय एवं एक निश्चित अवधि के लिए होता है।

स्मृति देबबर्मा (दिवंगत) बनाम प्रभा रंजन देबबर्मा
Civil Apeal 878 of 2009
बेंच – जस्टिस संजीव खन्ना और जेके माहेश्वरी

वादी के पक्ष में कब्जे की डिक्री केवल इसलिए पारित नहीं कि जा सकती

क्योंकि प्रतिवादी संपत्ति में अपने अधिकार, शीर्षक और हित ( right, title and interest ) को पूरी तरह से स्थापित करने में सक्षम नहीं थे।

बचाव पक्ष की कमजोरी मुकदमे को डिक्री करने का औचित्य नहीं हो सकती है।

प्रतिवादियों को तब तक बेदखल नहीं किया जा सकता जब तक कि वादी ने सूट की संपत्ति पर एक बेहतर शीर्षक और अधिकार स्थापित नहीं किया हो।

📑 3 JANUARY 2023

के.सी. सिनेमा बनाम जम्मू और कश्मीर राज्य और अन्य और संबंधित मामले
SLP(C) No. 20784/2018
बेंच – चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस पीएस नरसिम्हा

फिल्म देखने वालों को बाहर से खाने-पीने की चीजें अंदर ले जाने से रोकने का सिनेमा हॉल का अधिकार

इसी मामले में

◾मूवी टिकट के लिए एक समान मूल्य निर्धारण करना अनुचित है क्योंकि विभिन्न सिनेमा हाल अलग-अलग सुविधाएं प्रदान करते हैं

◾ सिनेमा हॉल को दर्शकों को निशुल्क पेयजल उपलब्ध करवाना होगा

कौशल किशोर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, यूपी गृह सचिव
WP(c) 113/2016
बेंच – जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर, जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस एएस बोपन्ना, जस्टिस वी. रामासुब्रमण्यन और जस्टिस बीवी नागरत्ना

” संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत निर्धारित प्रतिबंधों के अलावा

कोई भी अतिरिक्त प्रतिबंध किसी नागरिक के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर नहीं लगाया जा सकता है।

अनुच्छेद 19(2) संपूर्ण हैं | “

◼️ सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने फैसला सुनाया कि अनुच्छेद 19(2) में नहीं पाए जाने वाले प्रतिबंध मंत्रियों, सांसदों और विधायकों पर अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत अपने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का प्रयोग करने पर नहीं लगाए जा सकते हैं।

◼️ अनुच्छेद 19 (2) में निर्धारित आधारों के अतिरिक्त मुक्त भाषण पर अधिक प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है। हालाँकि, उन्होंने यह देखा कि यदि कोई मंत्री अपनी “आधिकारिक क्षमता” में अपमानजनक टिप्पणी करता है, तो ऐसी टिप्पणियों को सरकार के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। हालांकि, अगर मंत्रियों के बयान छिटपुट टिप्पणियां हैं जो सरकार की स्थिति के साथ असंगत हैं, तो उन्हें व्यक्तिगत टिप्पणी माना जाएगा, उन्होंने स्पष्ट किया।

मंत्रिपरिषद के सदस्यों पर पीएम, सीएम का कोई अनुशासनात्मक नियंत्रण नहीं

यह सच है कि व्यवहार में, एक मजबूत प्रधान मंत्री या मुख्यमंत्री किसी भी मंत्री को मंत्रिमंडल से बाहर करने में सक्षम होगा।

लेकिन हमारे जैसे देश में जहां बहुदलीय व्यवस्था है और जहां अक्सर गठबंधन सरकारें बनती हैं, वहां प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री के लिए यह संभव नहीं है कि जब भी मंत्रिपरिषद में किसी के द्वारा बयान दिया जाए तो वह व्हिप ले ले।

सरकारें जो बहुत कम बहुमत पर बनती हैं (जिनमें से हमने काफी कुछ देखा है), कभी-कभी अलग-अलग मंत्री होते हैं जो ऐसी सरकारों के अस्तित्व को तय करने के लिए पर्याप्त मजबूत होते हैं।

यह समस्या हमारे देश के लिए अद्वितीय नहीं है।”

अनुच्छेद 19 ( भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार ) और 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा) के तहत एक मौलिक अधिकार

“राज्य या उसके साधनों के अलावा अन्य व्यक्तियों के खिलाफ भी लागू किया जा सकता है”

कुछ मौलिक अधिकार जैसे- अस्पृश्यता, तस्करी और बंधुआ मज़दूरी पर रोक लगाने वाले अधिकार स्पष्ट रूप से राज्य और अन्य व्यक्तियों दोनों के खिलाफ हैं।

सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अनुच्छेद 32 के तहत किसी भी मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए एक रिट याचिका दायर की जा सकती है,

लेकिन अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालयों का अधिकार क्षेत्र उच्चतम न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से अधिक व्यापक है।

…………………………………………………………

गुड्डन @ रूप नारायण बनाम राजस्थान राज्य
CRA 120 of 2023
बेंच – जस्टिस कृष्णा मुरारी और वी. रामासुब्रमण्यन

Code of Criminal Procedure, 1973 – Sections 437-439, 389

जमानत देते समय या सजा के निलंबन पर इतनी अत्यधिक शर्तें नहीं लगाई जा सकती

उनका अस्तित्व ही इनकार करने के समान हो जाये

इस न्यायालय ने बार-बार यह माना है कि जेल अपवाद है और जमानत देना नियम है, ऐसे परिदृश्य में जमानत पर लगाई गई शर्तें अनुचित नहीं होनी चाहिए

📑 2 JANUARY 2023

विवेक नारायण शर्मा बनाम भारत संघ
WP(C) 906 OF 2016
बेंच – जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर , जस्टिस बीआर गवई , जस्टिस एएस बोपन्ना , जस्टिस वी रामासुब्रमण्यन और जस्टिस बीवी नागरत्ना

जस्टिस अब्दुल नजीर की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संवैधानिक बेंच ने 4:1 के बहुमत से केंद्र सरकार के 2016 में 500 रुपए और 1000 रुपए के नोटों को बंद करने के फैसले को बरकरार रखा

नोटबंदी का फैसला लेते समय अपनाई गई प्रक्रिया में कोई कमी नहीं थी । इसलिए उस अधिसूचना को रद्द करने की कोई जरूरत नहीं

सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ में से केवल एक जज जस्टिस बी.वी नागरत्ता ने नोटबंदी को गैरकानूनी कहा।

जस्टिस नागरत्ता ने कहा कि केन्द्र सरकार के कहने पर सभी सीरीज़ नोट को प्रचलन से बाहर करना काफी गंभीर विषय। नोटबंदी का फैसला केन्द्र सरकार की अधिसूचना के जरिए ना होकर विधेयक के जरिए होना चाहिए था, ऐसे महत्वपूर्ण फैसलो को संसद के सामने रखना चाहिए था।

Interpretation of Statutes

न्यायालय इस नियम से भी विचलित हो सकता है कि सादे शब्दों की व्याख्या उनके सादे अर्थ के अनुसार की जानी चाहिए।

अशोक पांडे बनाम भारत संघ और अन्य
WP(C) No. 823/2022
बेंच – जस्टिस एस.के. कौल और जस्टिस A.S. Oka

भारत का संविधान, 1950 – संविधान उच्चतम न्यायालय में प्रैक्टिस करने वाले वकीलों को उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने पर रोक नहीं लगाता है

सुप्रीम कोर्ट ने इस सिद्धांत को अनुमति दी कि उपयुक्त मामलों में सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले अधिवक्ता उच्च न्यायालय में नियुक्ति पर विचार किया जा सकता है।

दीपक गाबा बनाम उत्तर प्रदेश सरकार
Criminal Appeal 2328/2022
बेंच – जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस जे के माहेश्वरी

पैसे की मांग पर महज विवाद

आईपीसी की धारा 405 के तहत आपराधिक न्यासभंग का अपराध नहीं बनाता

◾ आईपीसी की धारा 405 को आकर्षित करने के लिए निम्नलिखित (तथ्यों) को स्थापित करना होगा:

👉 अभियुक्त को संपत्ति सौंपी गई थी या संपत्ति का प्रभुत्व सौंपा गया था।

👉 आरोपी ने बेईमानी से उस संपत्ति का दुरुपयोग किया या अपने स्वयं के उपयोग के लिए उसमें बदलाव किया या उस संपत्ति का बेईमानी से उपयोग किया या निपटान किया अथवा जानबूझकर किसी अन्य व्यक्ति को ऐसा करने के लिए प्रेरित किया

👉 इस तरह के दुरुपयोग, रूपांतरण, उपयोग या निपटान कानून के किसी भी निर्देश के उल्लंघन में होना चाहिए

दीपक गाबा और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
Criminal Appeal No. 2328 of 2022
बेंच – जस्टिस संजीव खन्ना और जेके माहेश्वरी

Criminal Breach of Trust

एक कार्य न केवल बेईमानी से किया जाना चाहिए, बल्कि कानून के किसी भी निर्देश या किसी अनुबंध के उल्लंघन में या विश्वास को पूरा करने के संबंध में व्यक्त किया जाना चाहिए।

अदालत के अधिकार क्षेत्र से बाहर रहने वाले अभियुक्त को समन करना

मजिस्ट्रेट के लिए स्वयं मामले की जांच करना या किसी पुलिस अधिकारी द्वारा यह पता लगाने के लिए कि आरोपी के खिलाफ कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार है या नहीं

प्रत्यक्ष जांच करना अनिवार्य है।

जाली और झूठा दस्तावेज़

जब तक कि दस्तावेज क्रमशः आईपीसी की धारा 464 और 470 के अनुसार झूठा और जाली न हो,

आईपीसी की धारा 471 की आवश्यकता को पूरा नहीं किया जाएगा।

📑 16 DECEMBER 2022

राजाराम बनाम मध्य प्रदेश राज्य 
CRIMINAL APPEAL NO(S). 2311 OF 2022
बेंच: जस्टिस एस रवींद्र भट, जस्टिस जेबी पारदीवाला

◼ मृत्यु से पहले दिए गए बयान का वजन और उपयोगिता आस-पास की परिस्थितियों और उस विश्वसनीयता पर निर्भर करता है जो अदालत उसके सामने दिए गए सबूतों के संबंध में संलग्न करती है।

इसलिए, बयान दर्ज करने से पहले चिकित्सा प्रमाणन होना आवश्यक है या नहीं, इसे कौन रिकॉर्ड करता है आदि सभी तथ्यों पर निर्भर हैं, और अदालतों द्वारा कोई रूढ़िवादी दृष्टिकोण नहीं अपनाया जा सकता है।

◼ “मृत्युकालिक घोषणा मौखिक या लिखित रूप में हो सकती है और संचार के किसी भी पर्याप्त तरीके से चाहे शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या अन्यथा, बशर्ते कि संकेत सकारात्मक और निश्चित हो।

CISF और अन्य बनाम संतोष कुमार पांडेय
Civil Appeal No. 8671 of 2015
बेंच – न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति जेके माहेश्वरी

न्यायिक समीक्षा ( Judicial review ) गुण और पर्याप्तता या साक्ष्य की अपर्याप्तता के आधार पर “मामले के न्यायनिर्णयन” के समान नहीं

जब तक कि अदालत यह नहीं पाती कि रिकॉर्ड किए गए निष्कर्ष बिना किसी सबूत के, विकृत, या कानूनी रूप से अमान्य हैं। 

भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत उच्च न्यायालय की शक्ति प्रक्रियात्मक कानून सहित कानून की त्रुटियों को ठीक करने के लिए न्यायिक समीक्षा के अभ्यास को सक्षम बनाती है, जिसके परिणामस्वरूप अन्याय प्रकट होता है या निष्पक्षता के सिद्धांतों का उल्लंघन होता है

केरल स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड बनाम थॉमस जोसेफ अलियास थॉमस एम जे
CA 9252-9253 of 2022
बेंच – जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस जेबी पर्दीवाला

कनेक्टेड लोड से अधिक उपभोक्ताओं द्वारा बिजली की खपत

विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 126 के संदर्भ में ‘बिजली का अनधिकृत उपयोग’ होगा।

नीरज दत्ता बनाम राज्य (GNCTD)
Cr A 1669 of 2009
बेंच – जस्टिस अब्दुल नज़ीर, बी.आर. गवई, ए.एस. बोपन्ना, वी. रामासुब्रमण्यन और बी.वी. नागरत्ना

[ भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 धारा 154 ]

तथ्य यह कि एक गवाह को “पक्षद्रोही” घोषित किया गया है, इसका परिणाम उसके साक्ष्य की स्वत: अस्वीकृति नहीं होता

यहां तक ​​कि, “पक्षद्रोही गवाह” के साक्ष्य को यदि मामले के तथ्यों से पुष्टि मिलती है, तो अभियुक्त के अपराध का न्याय करते समय ध्यान में रखा जा सकता है

“पक्षद्रोही गवाह” की गवाही पर दोष सिद्ध करने के लिए कोई कानूनी रोक नहीं, यदि अन्य विश्वसनीय सबूतों द्वारा पुष्टि की गई हैं

👉 एक “पक्षद्रोही साक्षी/गवाह” को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में वर्णित किया जाता है, जो एक पार्टी के आग्रह पर, जिसके द्वारा वह बुलाया गया है, सत्य बताने या बोलने का इच्छुक नहीं है

हसमुखलाल डी. वोरा बनाम तमिलनाडु राज्य
CRA 2310 of 2022
बेंच – जस्टिस कृष्ण मुरारी और एस रवींद्र भट

एक आपराधिक शिकायत को रद्द करने के लिए “अस्पष्टीकृत असामान्य देरी”

एक बहुत ही महत्वपूर्ण कारक हो सकती है

शिकायत दर्ज करने और आपराधिक कार्यवाही शुरू करने का उद्देश्य पूरी तरह से न्याय के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए मौजूद होना चाहिए, कानून को अभियुक्तों को परेशान करने के लिए एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।

कानून, निर्दोषों की रक्षा के लिए एक ढाल के रूप में मौजूद है, न कि उन्हें धमकाने के लिए तलवार के रूप में

कानून के रक्षक और कानून के सेवक के रूप में अदालतों को हमेशा यह सुनिश्चित करना चाहिए

कि तुच्छ मामले कानून की पवित्र प्रकृति को विकृत न करें

एक आपराधिक शिकायत को केवल दुर्लभतम मामलों में ही रद्द किया जाना चाहिए, फिर भी यह उच्च न्यायालय का कर्तव्य है कि वह न्याय के गर्भपात को रोकने के लिए प्रत्येक मामले को बड़े विस्तार से देखे

📑 15 DECEMBER 2022

गोहर मोहम्मद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम व अन्य
Civil Appeal No. 9322 of 2022
बेंच – जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर और जस्टिस जेके माहेश्वरी

◼ क्या मोटर वाहन का बीमा अनिवार्य है ?

“एमवी संशोधन अधिनियम विशेष रूप से अध्याय XI की धारा 146 का अवलोकन करने पर यह स्पष्ट है कि

एक मोटर वाहन सार्वजनिक स्थान पर नहीं चल सकता है और न ही सार्वजनिक स्थान पर उपयोग करने की अनुमति दी जाती है जब तक कि बीमा न हो।

लेकिन केंद्र सरकार, राज्य सरकार, स्थानीय प्राधिकरण या किसी राज्य परिवहन उपक्रम के स्वामित्व वाले वाहनों को बीमा से छूट है, यदि वाहन का उपयोग किसी वाणिज्यिक उद्यम से जुड़े उद्देश्य के लिए नहीं किया जाता है

आर नागेंद्र यादव बनाम तेलंगाना राज्य और अन्य
CRIMINAL APPEAL NO. 2290 OF 2022
बेंच – जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर और जस्टिस जेबी पारदीवाला

दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 482 के तहत अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते वक्त उच्च न्यायालयों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उनकी निहित शक्तियों का इस्तेमाल संयम से तथा न्याय सुनिश्चित करने के लिए किया जाए।

उच्च न्यायालयों को इस बात का ध्यान रखना होगा कि उनकी निहित शक्तियों का संयम से इस्तेमाल किया जाए और केवल सीआरपीसी की धारा 482 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए न्याय सुनिश्चित किया जाए।

◾ धारा 482 के प्रावधान उच्च न्यायालयों को ऐसे आदेश पारित करने में सक्षम बनाता है जो दंड प्रक्रिया संहिता के तहत किसी भी आदेश को प्रभावी करने के लिए या किसी भी अदालत की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए या अन्यथा न्याय के उद्देश्यों को सुरक्षित करने के लिए आवश्यक हो सकते हैं

जब भी ऐसी स्थिति आती है जहां एक नागरिक गलती ( civil wrong ) को एक आपराधिक अपराध का लबादा दे दिया जाता है, तो अदालत की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए उच्च न्यायालय द्वारा आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर देना चाहिए।

यह एक संभावना है कि सिविल लेन-देन का खुलासा करने वाली शिकायत का स्वरूप आपराधिक भी हो सकता है,

लेकिन उच्च न्यायालय को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि नागरिक प्रकृति के मुद्दे को आपराधिक अपराध का आवरण नहीं दिया जाए

नीरज दत्ता बनाम राज्य (जीएनसीटीडी)
Criminal Appeal No.  1669/2009
बेंच – जस्टिस अब्दुल नज़ीर, बीआर गवई, एएस बोपन्ना, वी. रामासुब्रमण्यम और बीवी नागरत्ना

भ्रष्टाचार निवारण (पीसी) अधिनियम के तहत

दोषी ठहराने के लिए लोक सेवकों द्वारा रिश्वत मांगने का प्रत्यक्ष साक्ष्य आवश्यक नहीं है,

यह परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के माध्यम से भी साबित किया जा सकता है जब उनके खिलाफ कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं

◾ मांग और स्वीकृति को साबित करने के लिए कुछ पहलुओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए जैसे अगर कोई लोक सेवक द्वारा बिना किसी मांग के रिश्वत की पेशकश करता है और बाद में अवैध संतुष्टि को स्वीकार कर लेता है, तो यह धारा 7 के अनुसार स्वीकृति का मामला है। 

◾ यदि कोई लोक सेवक मांग करता है जिसे देने वाले द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है, तो यह प्राप्ति का मामला है। दोनों मामलों में, प्रस्ताव और मांग को अभियोजन पक्ष द्वारा एक तथ्य के रूप में साबित किया जाना चाहिए।

👉 न्यायालय ने कहा कि बिना किसी चीज की अवैध संतुष्टि की स्वीकृति या प्राप्ति इसे धारा 7 या 13(1) के तहत अपराध नहीं बनाएगी।

📑 14 DECEMBER 2022

कालीचरण बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
CrA 122 OF 2021
बेंच – जस्टिस संजय किशन कौल और अभय एस. ओका

धारा 313 सीआरपीसी के तहत एक अभियुक्त से पूछताछ करना एक खाली औपचारिकता नहीं है।

धारा 313 सीआरपीसी की आवश्यकता यह है कि आरोपी को उसके खिलाफ सबूतों में दिखाई देने वाली परिस्थितियों को स्पष्ट किया जाना चाहिए ताकि आरोपी स्पष्टीकरण दे सके 

यदि अभियुक्त को उन साक्ष्यों में उसके खिलाफ दिखाई देने वाली महत्वपूर्ण परिस्थितियों के बारे में नहीं बताया गया है, जिस पर उसकी दोषसिद्धि आधारित होने की मांग की गई है,

तो अभियुक्त अपने खिलाफ रिकॉर्ड में लाई गई उक्त परिस्थितियों को स्पष्ट करने की स्थिति में नहीं होगा।

◾ धारा 313 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 313 के अन्तर्गत जब किसी मामले में जाँच या विचारण में, इस प्रयोजन से कि अभियुक्त अपने विरुद्ध साक्ष्य में प्रकट होने वाली किन्हीं परिस्थितियों का स्वयं स्पष्टीकरण कर सके। अभियुक्त की उपधारा (1) के अधीन परीक्षा की जाती है तब उसे कोई शपथ न दिलाई जाएगी। अभियुक्त ऐसे प्रश्नों के उत्तर देने से इन्कार करने से या उनके मिथ्या उत्तर देने से दण्डनीय न हो जाएगा। अभियुक्त द्वारा दिए गए उत्तरों पर उस जांच या विचारण में विचार किया जा सकता है और किसी अन्य ऐसे अपराध की, जिसका उसके द्वारा किया जाना दर्शाने की उन उत्तरों की प्रवृत्ति हो, किसी अन्य जांच या विचारण में ऐसे उत्तरों को उसके पक्ष में या उसके विरुद्ध साक्ष्य के तौर पर रखा जा सकता है।

◾ Code of Criminal Procedure, 1973; Section 215 and 464

जब अपील अदालत को यह तय करने के लिए कहा जाता है कि क्या आरोप तय करने में चूक या आरोप में त्रुटि के कारण न्याय की कोई विफलता हुई है,

तो न्यायालय सभी प्रदर्शित दस्तावेजों, बयानों सहित मुकदमे के पूरे रिकॉर्ड की जांच करने के लिए बाध्य

📑 12 DECEMBER 2022

उत्तर प्रदेश राज्य बनाम करुणेश कुमार व अन्य
CIVIL APPEAL NOS. 8822-8823 OF 2022
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और एमएम सुंदरेश

[ Service Law ]

‘खेल शुरू होने के बाद खेल के नियम नहीं बदले जा सकते’ का सिद्धांत

चयन प्रक्रिया में बदलाव पर लागू नहीं होता

अर्थात खेल के नियमों को बदलने का सिद्धांत तब लागू नहीं होता जब बदलाव चयन प्रक्रिया में हो

लेकिन अधिसूचना जारी किए जाने के बाद और एक उम्मीदवार के आवेदन करने के बाद, ऐसा नियम नहीं लगाया जा सकता है जो उसे चयन प्रक्रिया में भाग लेने से अयोग्य ठहराता है

चांदी पुलिया बनाम पश्चिम बंगाल राज्य
SLP (Criminal) 9897 of 2022
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और सीटी रविकुमार

[ दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 धारा 227,228 ]

◾ धारा 227 Cr.PC के तहत डिस्चार्ज का चरण आरोप तय करने से पहले का चरण है (धारा 228 Cr.PC के तहत)

यदि मामले के रिकॉर्ड और उसके साथ प्रस्तुत दस्तावेजों पर विचार करने और सुनवाई के बाद इस संबंध में अभियुक्त और अभियोजन पक्ष की प्रस्तुतियाँ पर न्यायाधीश यह मानता है कि अभियुक्त के खिलाफ कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है तो वह अभियुक्त को आरोप मुक्त करेगा और ऐसा करने के अपने कारणों को रिकॉर्ड करेगा।

◾ धारा 228 Cr.PC के अनुसार केवल उसके बाद और यदि उपरोक्त विचार और सुनवाई के बाद न्यायाधीश की राय है कि यह मानने का आधार है कि अभियुक्त ने अपराध किया है, तो ट्रायल कोर्ट आरोप तय करेगा।

धारा 300 CrPC की प्रयोज्यता पर अभियुक्त की याचिका पर धारा 227 CrPC के तहत उन्मोचन के चरण में विचार किया जाना चाहिए

📑 09 DECEMBER 2022

स्टेट ऑफ वेस्ट बंगाल बनाम संदीप बिस्वास
SLP (CRL) 10029 of 2022
बेंच – जस्टिस बीआर गवई और विक्रम नाथ

हाईकोर्ट के पास भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 या दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत

किसी भी विशेष तरीके से जांच करने का निर्देश देने की शक्ति नहीं

मोहम्मद सबीर @ शब्बीर हुसैन बनाम क्षेत्रीय प्रबंधक यूपीएसआरटीसी
Civil Apeal 9070-9071 Of 2022
बेंच – जस्टिस कृष्ण मुरारी और एस रवींद्र भट

मोटर दुर्घटनाओं के कारण स्थायी विकलांगता के मामलों में मुआवजा देते समय

दावेदारों की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि पर विचार किया जाना चाहिए।

ऐसा इसलिए है क्योंकि समाज के हाशिए के वर्गों के लोग पहले से ही सामाजिक पूंजी की कमी के कारण गंभीर भेदभाव का सामना करते हैं, और नई विकलांगता ज्यादातर इस तरह के भेदभाव को कम नहीं करती।

ऐसी परिस्थितियों में न्याय के लक्ष्य को बनाए रखने के लिए, कोर्ट का यह कर्तव्य बन जाता है कि कम से कम दावेदार को उस स्थिति में बहाल करना चाहिए, जिस स्थिति में वह विकलांगता की घटना से पहले था, और ऐसा करने के लिए उदार तरीके से मुआवजा देना चाहिए।

राजवती @ रज्जो बनाम यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड
Civil Apeal 8179 of 2022
बेंच – जस्टिस कृष्ण मुरारी और एस रवींद्र भट

एक आपराधिक मुकदमे में लागू साक्ष्य के सख्त नियम

मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों में लागू नहीं किए जा सकते

⬛ इस मामले में राजस्थान उच्च न्यायालय ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण द्वारा दावेदारों को दिए गए मुआवजे को कम करते हुए, मृतक के वेतन प्रमाण पत्र और और वेतन पर्ची पर केवल इस आधार पर विचार करने से इनकार कर दिया कि इन दस्तावेजों को जारी करने वाले व्यक्ति की जांच ट्रिब्यूनल के समक्ष नहीं की गई थी।

📑 08 DECEMBER 2022

टीपी गोपालकृष्णन बनाम केरल राज्य
Criminal Appeal No. 187-188 of 2017
बेंच – जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस बीवी नागरत्ना

सीआरपीसी की धारा 300 न केवल एक ही अपराध के लिए

बल्कि एक ही तथ्य पर किसी अन्य अपराध के लिए भी एक व्यक्ति के मुकदमे पर भी रोक लगाती है |

” सीआरपीसी की धारा 300 एक बार लगाती है, जिसमें एक व्यक्ति जिस पर पहले से ही समान तथ्यों से उत्पन्न होने वाले अपराध के लिए सक्षम क्षेत्राधिकार के न्यायालय द्वारा मुकदमा चलाया जा चुका है, और या तो बरी कर दिया गया है या इस तरह के अपराध के लिए दोषी ठहराया गया है,

उसी अपराध के लिए और साथ ही किसी अन्य अपराध के लिए समान तथ्यों पर फिर से विचारित नहीं कीया जा सकता, जब तक कि इस तरह की दोषमुक्ति या दोषसिद्धि लागू रहती है। “

📑 07 DECEMBER 2022

राजस्थान राज्य बनाम गुरबचन सिंह
 Criminal Appeal 2201 OF 2011  
बेंच – जस्टिस संजीव खन्ना और सुधांशु धूलिया

सामान्य आशय क्षण के आवेग में और घटना के दौरान ही बन सकता है

सामान्य आशय आवश्यक रूप से एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है

IPC की धारा 34 को लागू करने के लिए सह-अपराधी के बीच सामान्य इरादा होना चाहिए,

जिसका अर्थ है कि समुदाय का उद्देश्य और सामान्य योजना का होना

📑 06 DECEMBER 2022

अंजलि बनाम लोकेंद्र राठौड़
Civil Appeal 9014 OF 2022
बेंच – जस्टिस कृष्ण मुरारी और बेला एम. त्रिवेदी

मोटर दुर्घटना मुआवजा दावा मामलों में मृतक की वार्षिक आय की गणना के लिए

मृतक के आयकर रिटर्न ( ITR ) पर विचार किया जा सकता है

आयकर विवरणी एक वैधानिक दस्तावेज है जिस पर मृतक की वार्षिक आय की गणना के लिए भरोसा किया जा सकता हैं

📑 05 DECEMBER 2022

सुखपाल सिंह खैरा बनाम पंजाब राज्य
Criminal Apeal No. 885/2019
बेंच – जस्टिस अब्दुल नज़ीर, बीआर गवई, एएस बोपन्ना, वी. रामासुब्रमण्यन और बीवी नागरत्ना

सीआरपीसी की धारा 319 | अपराध के दोषी प्रतीत होने वाले अन्य व्यक्तियों के विरुद्ध कार्यवाही करने की शक्ति

◾ क्या ट्रायल कोर्ट के पास सीआरपीसी की धारा 319 के तहत अतिरिक्त अभियुक्तों को समन करने की शक्ति है जब अन्य सह-अभियुक्तों के संबंध में मुकदमा समाप्त हो गया है और समन आदेश की घोषणा करने से पहले उसी तारीख को सजा का फैसला दिया गया है ?

[ दोषसिद्धि के मामले में ] इस मामले में सीआरपीसी की धारा 319 के तहत शक्ति को लागू किया जाना चाहिए और सजा के आदेश की घोषणा से पहले प्रयोग किया जाना चाहिए, जहां अभियुक्त की दोषसिद्धि का फैसला हो।

[ दोषमुक्ति के मामले में ] दोषमुक्ति का आदेश सुनाए जाने से पहले धारा 319 की शक्ति का प्रयोग किया जाना चाहिए। “समन आदेश” को सजा के मामले में सजा सुनाकर मुकदमे के निष्कर्ष से पहले होना चाहिए।

👉 यदि आदेश उसी दिन पारित किया जाता है, तो प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों की जांच करनी होगी और यदि ऐसा समन आदेश या तो बरी होने के आदेश के बाद या दोषसिद्धि के मामले में सजा सुनाए जाने के आदेश के बाद पारित किया जाता है, तो ऐसा आदेश टिकाऊ नहीं होगा।

क्रिमिनल ट्रायल आरोपी के दोषसिद्धि पर नहीं, बल्कि सजा के साथ पूरा होता है।

[ CRPC 1973 धारा 233, 235 ]

◾ एक आपराधिक मुकदमे में ट्रायल का निष्कर्ष यदि दोषसिद्धि पर समाप्त होता है, तो एक निर्णय को सभी तरह से पूर्ण तभी माना जाता है जब दोषी को सजा दी जाती है, अगर दोषी को सीआरपीसी की धारा 360 का लाभ नहीं दिया जाता है। 

◾ इसी तरह, एक मामले में जहां एक से अधिक आरोपी हैं और उनमें से एक या एक से अधिक को बरी कर दिया जाता है और अन्य को दोषी ठहराया जाता है, तो ट्रायल उन अभियुक्तों के खिलाफ पूरा हो जाएगा जिन्हें बरी कर दिया गया है और दोषी अभियुक्तों के खिलाफ सजा के साथ ट्रायल को समाप्त करना होगा।

विजयकुमार गोपीचंद रामचंदानी बनाम अमर साधुराम मूलचंदान
SLP (Crl.) No(s).9092/2022
बेंच – भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा

संज्ञेय अपराध में गिरफ्तारी से पहले 72 घंटे की अग्रिम सूचना का निर्देश गलत

👉 इस मामले में बंबई उच्च न्यायालय द्वारा इस आशय का निर्देश जारी किया गया था कि राज्य द्वारा किसी संज्ञेय अपराध से संबंधित किसी भी शिकायत के संबंध में राज्य द्वारा उसे गिरफ्तार करना आवश्यक समझे जाने की स्थिति में पहले प्रतिवादी को 72 घंटे का नोटिस दिया जाना चाहिए।

📑 03 DECEMBER 2022

सोलोमन सेल्वराज बनाम इंद्राणी भगवान सिंह
CIVIL APEAL 8885 OF 2022
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और एमएम सुंदरेश

आदेश 33 नियम 1 के तहत निर्धन के रूप में मुकदमा करने के लिए एक आवेदन को खारिज किया जा सकता है,

यदि यह पाया जाता है कि यह मुकदमा रेस जुडिकाटा द्वारा वर्जित

जब प्रथम दृष्टया यह पाया गया कि वाद किसी भी कार्रवाई के कारण का खुलासा नहीं करता है और वाद रेस ज्यूडिकाटा द्वारा वर्जित है तो यह नहीं कहा जा सकता कि ट्रायल न्यायालय ने निर्धन व्यक्तियों के रूप में वाद दायर करने के आवेदन को अस्वीकार करने में कोई त्रुटि की है

📑 02 DECEMBER 2022

प्रमोद सिंह किरार बनाम मध्य प्रदेश राज्य
Case No. CA 8934-35 of 2022
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस सीटी रविकुमार

केवल इसलिए नियुक्ति से इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि उम्मीदवार पर

आईपीसी की धारा 498A ( किसी स्त्री के पति या पति के नातेदार द्वारा उसके प्रति क्रूरता करना ) के तहत मुकदमा चलाया गया था

◾ सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति का निर्देश दिया, जिसकी उम्मीदवारी इस आधार पर खारिज कर दी गई थी कि उस पर आईपीसी की धारा 498A के तहत मुकदमा चलाया गया था।

💡 दहेज हत्या के खतरे से निपटने के लिए इस धारा को आपराधिक (संशोधन) 1983 (1983 का अधिनियम 46) द्वारा इस संहिता में पेश किया गया है।  इसी अधिनियम द्वारा एक विवाहित महिला द्वारा आत्महत्या के लिए उकसाने के संबंध में एक अनुमान लगाने के लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम में धारा 113 ए को जोड़ा गया है।  यदि विवाह की वैधता स्वयं कानूनी जांच के दायरे में है, तो अवैध विवाह के संबंध में दहेज की मांग को कानूनी रूप से मान्यता नहीं दी जाएगी।

📑 01 DECEMBER 2022

मोनिरुल इस्लाम बनाम पश्चिम बंगाल राज्य
SLP(Criminal) No. 004439 /2021
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और सुधांशु धूलिया

◾क्या अग्रिम जमानत सीमित अवधि के लिए निर्धारित की जा सकती ?

सुप्रीम कोर्ट – अग्रिम जमानत सीमित अवधि के लिए निर्धारित नहीं की जा सकती हैं

👉 खंडपीठ कलकत्ता उच्च न्यायालय के एक आदेश को चुनौती देने वाले राजनेता मोनिरुल इस्लाम द्वारा दायर एक अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसने उन्हें 2021 में अग्रिम जमानत दी थी, इसे केवल चार सप्ताह तक सीमित कर दिया था।

📑 29 NOVEMBER 2022

बी आर के आठथन बनाम सन ग्रुप
CrA 2080­-2083 of 2022
बेंच – जस्टिस सूर्यकांत और जेके माहेश्वरी

[ Code of Criminal Procedure, 1973 – Section 190,200 ]

असाधारण परिस्थितियों में दूसरे परिवाद की अनुरक्षणीयता

इस बात पर निर्भर करेगी कि पहली बार किए गए परिवाद को किस तरह से खारिज किया गया था

◾ इस मामले में शिकायतकर्ता ने आरोपी के खिलाफ धारा 499 और 500 आईपीसी आदि के तहत अपराध का आरोप लगाते हुए मजिस्ट्रेट के समक्ष परिवाद दर्ज किया था । इसे मजिस्ट्रेट ने इस आधार पर खारिज कर दिया कि कोई प्रथम दृष्टया मामला नहीं है क्योंकि यह धारा 499 के चौथे अपवाद में आता है।

◾ बर्खास्तगी के इस आदेश को चुनौती देते हुए, शिकायतकर्ता ने मद्रास उच्च न्यायालय के समक्ष एक आपराधिक पुनरीक्षण दायर किया लेकिन उसे वापस ले लिया गया।

◾ बाद में उसने मजिस्ट्रेट के सामने दूसरा परिवाद दर्ज किया जिसमें वही बातें थीं जो उसने पहले परिवाद में की थी

◾ इस परिवाद में, उन्होंने कहा कि उन्होंने “मद्रास उच्च न्यायालय की माननीय मदुरै पीठ के आदेश के अनुसार” दूसरा परिवाद दर्ज किया है, जाहिर तौर पर मजिस्ट्रेट ने इस परिवाद का संज्ञान लिया और आरोपी को तलब किया।

👉 आरोपी ने सम्मन आदेश को उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी, जिसने परिवाद को खारिज कर दिया।

📑 28 NOVEMBER 2022

रमेश चंद्र गुप्ता बनाम यूपी राज्य
SLP(Crl.) 39 of 2022
बेंच – जस्टिस अजय रस्तोगी और सीटी रविकुमार

Code of Criminal Procedure, 1973; section 482

आपराधिक कार्यवाही को रद्द किया जा सकता है ,

जब जिस शिकायत के आधार पर FIR / परिवाद दर्ज की गई थी, उसमें अभियुक्तों के किसी भी कृत्य या अपराध में उनकी भागीदारी का खुलासा नहीं किया गया हो।

📑 24 NOVEMBER 2022

वी पी सिंह बनाम पंजाब राज्य
Crl.A. No. 2103/2010 II-B
बेंच – जस्टिस एस के कौल और जस्टिस ए एस ओका

अनुशासनहीनता करने पर की गई वैध अनुशासनात्मक कार्यवाही से आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला नहीं बनता

कॉलेज में कक्षा के दौरान में किसी छात्र द्वारा अनुशासनहीनता करने पर उसके विरुद्ध प्रोफेसर और कॉलेज प्रशासन द्वारा की गई वैध अनुशासनात्मक कार्यवाही को आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं कहा जा सकता

और प्रोफेसर या कॉलेज प्रबंधन को भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

📑 22 NOVEMBER 2022

कर्नाटक पावर ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम जेएसडब्ल्यू एनर्जी लिमिटेड
Civil Appeal 8714 of 2022
बेंच – जस्टिस केएम जोसेफ, अनिरुद्ध बोस और हृषिकेश रॉय

Indian Contract Act, 1872

एक संविदा को तभी संपन्न माना जा सकता है, जब सभी पक्ष संविदा की सभी आवश्यक शर्तों के अनुरूप हों

दूसरे शब्दों में,

◾यदि आवश्यक शर्तों वाले प्रस्तावों को स्वीकार कर लिया गया है एवं स्वीकृति की सूचना दी गई है

◾और यदि भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 2 में अन्य शर्तों का अनुपालन किया जाता है, अर्थात, विचार किया जाता है

◾और संविदा कानून की धारा 10 के अर्थ के भीतर कानून में लागू करने योग्य है,

तो यह एक संविदा के निर्माण की ओर ले जाएगा

📑 21 NOVEMBER 2022

रामचंद्र बराठी @सतीश शर्मा वीके बनाम तेलंगाना राज्य
SLP(Crl) 10356/2022
बेंच – जस्टिस बीआर गवई और विक्रम नाथ

उच्च न्यायालय सर्वोच्च न्यायालय के अधीनस्थ न्यायालय नहीं

लेकिन जब उच्च न्यायालय इस न्यायालय ( सर्वोच्च न्यायालय ) के निर्णयों से निपटता है, जो भारत के संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत सभी के लिए बाध्यकारी हैं,

तो यह अपेक्षा की जाती है कि निर्णयों को उचित सम्मान के साथ निपटाया जाना चाहिए

◾”स्टेयर डिसीसिस का सिद्धांत – भारत का संविधान अनुच्छेद 141

अदालतें अपने फैसलों को निर्देशित करने के लिए पिछले, समान कानूनी मुद्दों का उल्लेख करती हैं। ऐसे पिछले फैसले जिन्हें अदालतें संदर्भित करती हैं, उन्हें “मिसाल” के रूप में जाना जाता है। मिसालें कानूनी सिद्धांत या नियम हैं जो अदालतों द्वारा दिए गए फैसलों द्वारा बनाए गए हैं। ऐसे निर्णय न्यायाधीशों के लिए भविष्य में समान कानूनी मामलों/मुद्दों पर निर्णय लेने के लिए एक प्राधिकरण या उदाहरण बन जाते हैं।

उदाहरण के लिए, यदि सर्वोच्च न्यायालय कोई निर्णय पारित करता है और यह एक मिसाल बन जाता है, तो स्टेयर डिसिसिस के सिद्धांत के अनुसार, निचली अदालतों को इस तरह के फैसले का पालन करना चाहिए। इसी सिद्धांत का उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 141 में किया गया है

📑 18 NOVEMBER 2022

भोज राज गर्ग बनाम गोयल एजुकेशनल एंड वेलफेयर सोसाइटी
SLP(C) 19654/2022
बेंच – जस्टिस केएम जोसेफ और हृषिकेश रॉय

सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908;  आदेश XXI – निष्पादन कार्यवाही

निष्पादन न्यायालय को फाइलिंग की तारीख से छह महीने के भीतर निष्पादन की कार्यवाही का निपटान करना चाहिए

जब वह मामले का निपटान करने में असमर्थ है, तो लिखित में कारणों को दर्ज करने के लिए बाध्य

◾ निष्पादन के संबंध में नियमों को डिक्री पर लागू किया जाता है। राहत डिक्री के निष्पादन के बाद मिलता है। सभी कार्यवाही में डिक्री का निष्पादन एक आवश्यक चरण है। प्रक्रिया को सावधानी से किया जाना चाहिए ताकि प्रभावित व्यक्ति के लिए उचित राहत प्रदान की जा सके और प्रक्रिया को कार्यवाही को प्रभावी और तेज बनाना चाहिए। सिविल प्रक्रिया संहिता का आदेश XXI, डिक्री और आदेशों के निष्पादन से संबंधित है।

मध्य प्रदेश राज्य बनाम मैसर्स एसईडब्ल्यू कंस्ट्रक्शन लिमिटेड और ओआरएस
Civil Appeal No. 8571 of 2022
बेंच – जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस पीएस नरसिम्हा

संविदात्मक मामलों में ‘विवेक’ का कोई स्थान नहीं है जब तक कि यह स्पष्ट रूप से अनुबंध ( Contract ) में शामिल न हो

न्यायालय का कर्तव्य है कि वह अनुबंध की व्याख्या करते हुए पक्षों के वास्तविक और सही अर्थ को समझे और अनुबंध से उत्पन्न होने वाले अधिकारों को लागू करे

अनुबंध के पक्षकारों के अधिकार और कर्तव्य अनुबंध के संदर्भ में ही बने रहते हैं या नष्ट हो जाते हैं।

यहां तक ​​कि अगर अनुबंध के लिए एक पक्ष एक सरकारी प्राधिकरण है, तो अनुबंध को प्रशासित करने वाले अधिकारियों में निहित विवेक के लिए कोई जगह नहीं है। जब तक कि निश्चित रूप से, पार्टियों ने स्पष्ट रूप से इसे अनुबंध के एक हिस्से के रूप में शामिल किया है।”

📑 17 NOVEMBER 2022

सोमाई बनाम छत्तीसगढ़ राज्य
[Criminal Appeal No. 497/2022]
बेंच – जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस अभय एस ओका

Rape Case – पुलिस द्वारा जब्त कपड़ों को फोरेंसिक प्रयोगशाला में भेजने में विफलता

एक बार जब अदालत यौन हमले के एक उत्तरजीवी के बयान पर विश्वास कर लेती है, तो यह भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 376 के तहत दंडनीय अपराध स्थापित करने के लिए पर्याप्त है

और पुलिस द्वारा जब्त किए गए सामानों को फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला में भेजने में विफलता इसे प्रभावित नहीं करेगी

पवन कुमार गोयल बनाम यूपी राज्य और अन्य
Special Leave Petition (Crim.) No. 1697 of 2020
बेंच – जस्टिस कृष्ण मुरारी और जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी

नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 142 के तहत अपराध का संज्ञान लेने के लिए निर्धारित सीमा अवधि समाप्त हो जाने के बाद,

चेक बाउंस की शिकायत दर्ज करने के बाद “अतिरिक्त अभियुक्तों को” आरोपी के रूप में आरोपित नहीं किया जा सकता है

एक्स बनाम कर्नाटक राज्य
CRA 1981 of 2022
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और हिमा कोहली

◼️ Code Of Criminal Procedure, 1973 Section 439 – जमानत के संबंध में उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय की विशेष शक्तियाँ।

सीआरपीसी की धारा 439 के तहत जमानत याचिका पर विचार करते हुए “कस्टोडियल ट्रायल” ( हिरासत में सुनवाई ) की आवश्यकता” प्रासंगिक नहीं है।

अग्रिम जमानत के आवेदन पर विचार करते समय इसकी कुछ प्रासंगिकता हो सकती है।”

📑 14 NOVEMBER 2022

विनय प्रकाश सिंह बनाम समीर गहलौत
MISCELLANEOUS APPLICATION NO.1902 OF 2022
बेंच – जस्टिस के एम जोसेफ और जस्टिस हृषिकेश रॉय

धारा 428 सीआरपीसी का लाभ तभी लिया जा सकता है,

जब जांच, पूछताछ या ट्रायल के दौरान ‘एक ही मामले’ में दोषी को हिरासत में लिया गया हो

◾ जहां तक सीआरपीसी की धारा 428 का संबंध है, सीआरपीसी की धारा 428 को लागू करने के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता यह है –

👉 एक दोषसिद्धि होनी चाहिए।

👉 सजा के बाद कारावास की सजा होनी चाहिए।

👉 यह एक अवधि के लिए होना चाहिए और जुर्माने के भुगतान में चूक होने पर कारावास नहीं होना चाहिए।

यदि ये आवश्यकताएं मौजूद हैं, तो सीआरपीसी की धारा 428 के लाभकारी प्रावधानों को लागू करने के लिए अवसर खुल जाता है।

▶ धारा 428 में अभियुक्त द्वारा भोगी गयी विरोध की अवधि का कारावास के दण्डादेश के विरूद्ध मुजरा किये जाने का उपबन्ध किया गया है । जिसके अनुसार जिस मामले में अभियुक्त को दोषसिद्ध पर कारावास से दण्डादिष्ट किया जाता है , उसी मामले के अन्वेषण , जांच अथवा विचारण के दौरान एवं दोषसिद्धि की तिथि से पूर्व उसके द्वारा भोगी गयी निरोध ( Detention ) की अवधि का , दोषसिद्धि किये जाने पर अधिरोपित कारावास की अवधि के विरूद्ध मुजरा किया जायेगा किन्तु इसमें जुर्माने के संदाय में व्यतिक्रम के लिए कारावास की अवधि का मुजरा नहीं किया जायेगा ।

सिरीकोंडा माधव राव बनाम एन हेमलता
SLP(C) 14882-14883/2022
बेंच – जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस जेके माहेश्वरी

एक बार एक दस्तावेज को साक्ष्य के रूप में स्वीकार कर लेने के बाद, इस तरह के प्रवेश को मुकदमे या कार्यवाही के किसी भी स्तर पर इस आधार पर कि उपकरण पर विधिवत मुहर ( स्टाम्प की पर्याप्तता ) नहीं लगाई गई है, प्रश्न में नहीं उठाया जा सकता है

इसके बाद, पक्षकारों या यहां तक ​​कि अदालत के पास आदेश या मुद्दे की फिर से जांच करने का अधिकार नहीं है।

स्टाम्प की पर्याप्तता के आधार पर किसी दस्तावेज़ की स्वीकार्यता के रूप में आपत्ति तब उठानी पड़ती है जब दस्तावेज़ को साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

📑 11 NOVEMBER 2022

इस्तकार बनाम यूपी राज्य
CRA 2034 of 2022
बेंच – जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस सुधांशु धूलिया

सीआरपीसी के आठवें अध्याय के प्रावधान केवल निवारक प्रकृति के हैं,इन्हें सजा के साधन के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए

बॉन्ड/सिक्योरिटी की अत्यधिक और मनमानी राशि की मांग करना अस्वीकार्य है क्योंकि यह संहिता के अध्याय VIII की भावना का अपमान

👉 सीआरपीसी का अध्याय VIII, जो धारा 106 से लेकर धारा 124 तक है, मजिस्ट्रेट को किसी व्यक्ति विशेष से शांति बनाए रखने या अच्छा व्यवहार बनाए रखने के लिए सिक्योरिटी लेने का अधिकार देता है।

भूरी बाई बनाम मध्य प्रदेश राज्य
CRIMINAL APPEAL NO.1972 of 2022 (Arising out of SLP(Crl.) No.9508/2022]
बेंच – जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और सुधांशु धूलिया

जमानत देने से पहले आरोपी की ओर से किसी भी कथित अनुशासनहीनता के लिए जमानत रद्द करने का आदेश नहीं दिया जा सकता

जमानत रद्द करने की शक्तियों को आरोपी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही के रूप में नहीं लिया जा सकता है।

धारा 439 (2) सीआरपीसी की परिकल्पना केवल ऐसे मामलों में की जाती है, जहां आरोपी की स्वतंत्रता आपराधिक मामले के उचित परीक्षण की आवश्यकताओं का प्रतिकार करने वाली हो

📑 10 NOVEMBER 2022

जैन पी जोस बनाम संतोष
SLP (CRL) 5241/ 2016
बेंच – जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस जे के माहेश्वरी

धारा 139 के तहत अनुमान में ये अनुमान भी शामिल है कि कानूनी रूप से लागू करने योग्य ऋण या देयता ( Debt Or Liability ) मौजूद है।

हालांकि, एनआई अधिनियम की धारा 139 के तहत अनुमान खंडन योग्य है और यह अभियुक्त के लिए एक बचाव उठाने के लिए खुला है जिसमें कानूनी रूप से लागू ऋण या देयता के अस्तित्व को चुनौती दी जा सकती है

◾परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 139 का विवरण : – जब तक कि अन्यथा साबित न कर दिया जाये, यह उपधारणा की जायेगी कि चैक के धारक ने वह चैक धारा 138 में निर्दिष्ट किसी ऋण अथवा अन्य दायित्व के भागतः या पूर्णतः उन्मोचन के लिए प्राप्त किया है ।

हरियाणा राज्य बनाम दया नंद
SLP(Crl) 10687/2022
बेंच – जस्टिस संजय किशन कौल और अभय एस. ओक

न्यायिक समीक्षा ( Judicial Review ) की शक्ति का प्रयोग करते हुए, एक उच्च न्यायालय

स्वयं क्षमा की शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकता है।

◼️ इस मामले में, एक हत्या के मामले में दोषी 12 साल और 9 महीने की वास्तविक सजा और 14 साल और 6 महीने की सजा काट चुका था जब उसने समय से पहले रिहाई की मांग की थी।

◼️अधिकारियों ने इस मुद्दे को लंबित रखा जिसके कारण उन्होंने रिट याचिका दायर करके पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

👉 उच्च न्यायालय ने छूट के अनुरोध को इस आधार पर स्वीकार कर लिया कि यह नीति द्वारा कवर किया गया है।

📑 09 NOVEMBER 2022

नारायण मेडिकल कॉलेज बनाम आंध्र प्रदेश राज्य
SLP(C) 2969­2970 of 2021
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस सुधांशु धूलिया

शिक्षा लाभ कमाने का व्यवसाय नहीं है और ट्यूशन फीस हमेशा वहन करने योग्य होनी चाहिए

सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल कॉलेजों में ट्यूशन फीस बढ़ाकर 24 लाख रुपये प्रति वर्ष करने के राज्य सरकार के फैसले को रद्द करने के आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा 

गुरदेव सिंह बनाम हरविंदर सिंह
SLP(C) 19018/2022
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस एमएम सुंदरेश

Code of Civil Procedure, 1908 – Order VII Rule 11

CPC के आदेश 7 नियम 11 के तहत केवल इस आधार पर एक वाद खारिज नहीं किया जा सकता है कि

‘वादी मुकदमे में किसी भी राहत का हकदार नहीं’

◾आदेश 7 नियम 11 के अन्तर्गत 6 आधारों पर वादपत्र को नामंजूर किया जा सकता है

( i ) जहाँ की वाद हेतुक प्रकट नहीं होता ।

( ii ) जहाँ दावाकृत अनुतोष का मूल्यांकन कम किया गया है । और न्यायालय द्वारा अपेक्षित समय के अन्दर वादी मूल्यांकन ठीक करने में विफल रहता है ।

( iii ) जहाँ वाद पत्र में अपर्याप्त स्टाम्प शुल्क लगा है और अपेक्षित स्टाम्प शुल्क को वादी न्यायालय द्वारा अपेक्षित समय के अन्दर देने में असफल रहा है ।

( iv ) जहाँ वाद पत्र के कथन से प्रतीत होता है कि वाद किसी विधि द्वारा वर्जित है ।

( v ) जहाँ वाद दो प्रतियों में दाखिल नहीं किया गया है ।

( vi ) जहाँ वादी आदेश 7 नियम 9 के उपबन्धों का अनुपालन करने में असफल रहता है ।

रवि नंबूथिरी बनाम के ए बैजू
सीए 8261 – 2022 का 8262
बेंच – जस्टिस एस. अब्दुल नज़ीर और जस्टिस वी. रामसुब्रमण्यम

विरोध-प्रदर्शन नागरिक समाज के हाथों में एक उपकरण (Tool) है, जैसे हड़ताल कामगारों के हाथों में एक हथियार है।

और पुलिस कार्रवाई सरकार के हाथ का एक उपकरण

वी.एस. रामकृष्णन बनाम पी.एम. मुहम्मद अली
Civil Apeal 8050­-8051 OF 2022
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस एमएम सुंदरेश

Specific Relief Act, 1963 – Specific Performance Suit

विशिष्ट प्रदर्शन के लिए वाद में वादी की ओर से तत्परता और इच्छा पर और कोई विशिष्ट निष्कर्ष देने से पहले

न्यायालय द्वारा एक विशिष्ट मुद्दा तैयार किया जाना चाहिए,पार्टियों को नोटिस में रखा जाना चाहिए।

मुद्दे को तैयार करने का उद्देश्य यह है कि वाद के पक्षकार उस पर विशिष्ट साक्ष्य का नेतृत्व कर सकें।

इस तरह का निष्कर्ष विद्वान ट्रायल कोर्ट द्वारा वादी को नोटिस में डाले बिना और वादी की ओर से तत्परता और इच्छा पर एक विशिष्ट मुद्दा तैयार किए बिना नहीं दिया जा सकता था।

सुमेर निगम बनाम विजय अनंत गंगन और अन्य
Civil appeal no.  7774 of 2022
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस एमएम सुंदरेश

बेदखली की डिक्री की तारीख से, किरायेदार उसी दर पर परिसर के उपयोग और कब्जे के लिए मेस्ने लाभ या मुआवजे का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी है।

जिस पर मकान मालिक परिसर को किराये पर देने और किराएदार द्वारा परिसर खाली करने पर किराया अर्जित करने में सक्षम होता।

📑 07 NOVEMBER 2022

जनहित अभियान बनाम भारत संघ
WP(C)NO.55/2019
बेंच – भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) यूयू ललित के साथ न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी, न्यायमूर्ति एस रवींद्र भट, न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला

संविधान पीठ ने आज 3:2 बहुमत के साथ 103वें संशोधन की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा, जो अगड़ी जातियों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) को 10 प्रतिशत आरक्षण देता है।

◼️जस्टिस बेला त्रिवेदी ने भी इस फैसले पर सहमति जताई है। उन्होंने कहा कि मैं जस्टिस माहेश्वरी के निष्कर्ष से सहमत हूं। एससी/एसटी/ओबीसी को पहले से आरक्षण मिला हुआ है। उसे सामान्य वर्ग के साथ शामिल नहीं किया जा सकता है। संविधान निर्माताओं ने आरक्षण सीमित समय के लिए रखने की बात कही थी लेकिन 75 साल बाद भी यह जारी है।

◼️50 प्रतिशत से ऊपर आरक्षण गलत: जस्टिस रविन्द्र भट
आर्थिक आधार पर आरक्षण फैसला देते हुए जस्टिस रविन्द्र भट ने असहमति जताई है। रविन्द्र भट ने कहा कि आबादी का एक बड़ा हिस्सा SC/ST/OBC का है। उनमें बहुत से लोग गरीब हैं। इसलिए, 103वां संशोधन गलत है। जस्टिस एस रविंद्र भट ने 50 प्रतिशत से ऊपर आरक्षण देने को भी गलत माना है।

राहुल बनाम दिल्ली राज्य गृह मंत्रालय और अन्य
Criminal Appeal No. 611/2022
बेंच – CJI यू यू ललित, जस्टिस एस रवींद्र भट और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी

यह सच हो सकता है कि यदि जघन्य अपराध में शामिल अभियुक्तों को दंडित नहीं किया जाता है या बरी कर दिया जाता है, तो सामान्य रूप से समाज और विशेष रूप से पीड़ित के परिवार के लिए एक प्रकार की पीड़ा और निराशा हो सकती है,

लेकिन ‘कानून’ न्यायालय को केवल नैतिक दोषसिद्धि के आधार पर या केवल संदेह के आधार पर अभियुक्त को दंडित करने की अनुमति नहीं देता है।

किसी भी दोषसिद्धि को केवल दिए गए निर्णय पर अभियोग या निंदा की आशंका पर आधारित नहीं होना चाहिए।

किसी भी प्रकार के बाहरी नैतिक दबावों से प्रभावित हुए बिना प्रत्येक मामले को न्यायालयों द्वारा कड़ाई से योग्यता और कानून के अनुसार तय किया जाना चाहिए।

👉 सुप्रीम कोर्ट ने 19 साल की लड़की के बलात्कार और हत्या के लिए ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट द्वारा मौत की सजा पाने वाले तीन लोगों को बरी किया- सुप्रीम कोर्ट ने जांच और ट्रायल में चूक बताई – आरोपी की कोई जांच नहीं की- आरोपी गवाहों द्वारा ट्रायल के दौरान शिनाख्त नहीं की गई- कई गवाहों का एक्जामिनेशन नहीं हुआ। बरामदगी साबित नहीं हुई

रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड बनाम विजयन ए (सेबी के अधिकृत प्रतिनिधि)
CONMT.PET.(C) No 570/2022
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस एमएम सुंदरेश

रिव्यू याचिका में स्थगन आवेदन के लंबित रहने को कोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं करने का आधार नहीं बनाया जा सकता

📑 02 NOVEMBER 2022

महाराष्ट्र राज्य बनाम मारोटी
Criminal Appeal No.1874 of 2022 (Arising out of Special Leave Petition (Crl.) No.718
बेंच – जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस सीटी रविकुमार

नाबालिगों के यौन उत्पीड़न की पुलिस को रिपोर्ट न करना यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पोक्सो) अधिनियम के तहत एक गंभीर अपराध

पोक्सो अधिनियम के तहत अपराध के कमीशन की शीघ्र और उचित रिपोर्टिंग अत्यंत महत्वपूर्ण है और हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि किसी भी अपराध के होने के बारे में पता चलने के बाद भी, अपराध के संबंध में रिपोर्टिंग न करना एक गंभीर अपराध

अन्यथा अधिनियम का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा

◾ पोक्सो अधिनियम के तहत प्रासंगिक प्रावधानों का हवाला देते हुए, अदालत ने कहा कि कानून अपराध की रिपोर्ट करने में विफल रहने पर एक साल तक की जेल की सजा का प्रावधान करता है।

👉 इस मामले में महाराष्ट्र के एक डॉक्टर ने एक छात्रावास में नाबालिग छात्राओं के साथ यौन शोषण की जानकारी होने के बावजूद उचित प्राधिकरण को सूचित नहीं किया था, जिसके लिए पुलिस ने उस पर पॉक्सो का मामला दर्ज किया था. हाईकोर्ट द्वारा डॉक्टर के ख़िलाफ़ मामले को रद्द करने के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी.

📑 01 NOVEMBER 2022

एक्स बनाम एम महेंद्र रेड्डी
CONTEMPT PETITION (C) NO.555 OF 2022 IN SPECIAL LEAVE PETITION (CRL.) NO.5073 OF 2011
बेंच – सीजेआई यूयू ललित और जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी

Code of Criminal Procedure, 1973 Section 164

सीआरपीसी की धारा 164 के तहत दिए गए बलात्कार पीड़िता के बयान का खुलासा

किसी भी व्यक्ति (आरोपी सहित) को तब तक नही किया जाना चाहिए जब तक कि चार्ज-शीट / अंतिम रिपोर्ट दायर नहीं की जाती

नवीन बनाम हरियाणा राज्य और अन्य
Special Leave Petition (Crl.) No.3746 of 2022
बेंच: जस्टिस अजय रस्तोगी और सी.टी. रवि कुमार

सीआरपीसी की धारा 319 के तहत शक्ति एक विवेकाधीन और एक असाधारण शक्ति

इसका प्रयोग वहां नहीं किया जाना चाहिए जहां “मजिस्ट्रेट या सत्र न्यायाधीश की राय” है कि कोई अन्य व्यक्ति भी उस अपराध को करने का दोषी हो सकता है। 

इसका प्रयोग संयम से और केवल उन मामलों किया जाना है जहां मामले की परिस्थितियां इतनी वारंट हैं कि किसी व्यक्ति के खिलाफ अदालत के सामने पेश किए गए सबूतों से मजबूत और पुख्ता सबूत मिलते हैं |

ऐसी शक्ति का प्रयोग आकस्मिक और लापरवाह तरीके से नहीं किया जाना चाहिए

मो. आबिद बनाम रवि नरेश
SLP(Crl) 5444/2022
बेन्च – जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जेबी पारदीवाला

एक बार दीवानी न्यायालय द्वारा मामले को जब्त कर लिया गया है, तो उसके पश्चात सीआरपीसी की धारा 145 , 146 के तहत कार्यवाही को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता

शीर्षक या कब्जे के संबंध में पक्षों के परस्पर अधिकार अंततः सिविल कोर्ट द्वारा निर्धारित किए जाने हैं

◾धारा 145 सीआरपीसी कार्यकारी मजिस्ट्रेट के समक्ष कार्यवाही से संबंधित है जहां भूमि या पानी से संबंधित विवाद से शांति भंग होने की संभावना है।

◾धारा 146 सीआरपीसी विवाद की विषय वस्तु की कुर्की करने और रिसीवर नियुक्त करने की शक्ति के बारे में है।

📑 31 OCTOBER 2022

झारखंड राज्य बनाम शैलेंद्र कुमार राय @ पांडव राय
Criminal Appeal No 1441 of 2022
बेंच – जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और हेमा कोहली

टू-फिंगर टेस्ट पर रोक

यह पितृसत्तात्मक ( patriarchal ) मानसिकता पर आधारित है कि सैक्चुली एक्टिव महिला का रेप नहीं किया जा सकता

“टू-फिंगर टेस्ट” या प्री वेजाइनम टेस्ट नहीं किया जाना चाहिए, इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है और न ही बलात्कार के आरोपों को साबित करता है और न ही खारिज

इसके बजाय यह उन महिलाओं को फिर से पीड़ित और फिर से आघात पहुँचाता है, जिनका यौन उत्पीड़न किया गया हो, यह उनकी गरिमा का अपमान

इस आशय का कोई नियम नहीं है कि मृत्यु से पहले की घोषणा तब अस्वीकार्य होती है जब उसे मजिस्ट्रेट के बजाय पुलिस अधिकारी द्वारा दर्ज किया जाता है

यदि संभव हो तो मृत्यु से पहले की घोषणा को आदर्श रूप से मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज किया जाना चाहिए, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता है कि मृत्यु से पहले की घोषणाओं को पुलिस कर्मी दर्ज किया गया है, इसलिए वह अस्वीकार्य हैं

प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के बाद पुलिस द्वारा दर्ज की गई मृत्युकालीन घोषणा स्वीकार्य है या नहीं, इस मुद्दे पर निर्णय लिया जाना है

प्रवर्तन निदेशालय बनाम पद्मनाभन किशोर
SLP (CRL) No. 2668/ 2022
बेंच – सीजेआई यूयू ललित और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी

‘रिश्वत देने वाला’ एक पार्टी है जो ‘अपराध की आय’ से जुड़ी है

PMLA ( PREVENTION OF MONEY-LAUNDERING ACT, 2002 ) के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है

जब तक धन रिश्वत देने वाले के हाथ में है, और जब तक यह अपेक्षित इरादे से प्रभावित नहीं होता है और वास्तव में रिश्वत के रूप में सौंपा नहीं जाता है, यह निश्चित रूप से बेदाग धन होगा। यदि धन इस तरह के इरादे के बिना सौंपा गया है, यह मात्र सुपुर्दगी होगा।

यदि इसके बाद लोक सेवक द्वारा इसे विनियोजित किया जाता है तो ये दुरुपयोग या उसकी प्रजाति का होगा, लेकिन निश्चित रूप से रिश्वत का नहीं,

इसलिए महत्वपूर्ण हिस्सा रिश्वत के रूप में राशि सौंपने का अपेक्षित इरादा है और आम तौर पर ऐसा इरादा आवश्यक रूप से पूर्ववर्ती होना चाहिए या राशि सौंपने से पहले होना चाहिए।

◼️ सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास उच्च न्यायालय के उस फैसले को रद्द कर दिया जिसमें एक ‘रिश्वत देने वाले’ के खिलाफ शुरू की गई पीएमएलए कार्यवाही को रद्द कर दिया गया था।

📑 20 OCTOBER 2022

हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम निर्मल कौर @ निम्मो और अन्य
CRIMINAL APPEAL NO. 956 OF 2012
बेंच – जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस सीटी रविकुमार

Narcotic Drugs and Psychotropic Substances Act, 1985

एक बार जब एक रासायनिक परीक्षक यह स्थापित कर लेता है कि जब्त ‘पोस्त का चूरा’

‘मॉर्फिन’ और ‘मेकोनिक एसिड’ की सामग्री के लिए एक पॉजिटिव टेस्टिंग का संकेत देता है,

तो NDPS ACT धारा 15 के अन्तरगर्त अपराध का गठन करने के लिए किसी अन्य परीक्षण की आवश्यकता नहीं 

📑 19 OCTOBER 2022

एस नलिनी जयंती बनाम एम रामसुब्बा रेड्डी
Transfer Petition(s)(Criminal) No(s). 655/2022
बेन्च – जस्टिस अभय एस. ओक

नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत एक शिकायत को आरोपी  की सुविधा के अनुसार स्थानांतरित नहीं किया जा सकता

एस रामचंद्र राव बनाम एस नागभूषण राव
बेंच – जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस अनिरुद्ध बोस

◾ रेस ज्यूडिकाटा का सिद्धांत न केवल अलग-अलग कार्यवाही में बल्कि उसी कार्यवाही के बाद के चरण में भी आकर्षित होता है।

◾ एक बाध्यकारी निर्णय को हल्के ढंग से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है, यहां तक कि एक ही मुद्दे के संबंध में कोई ‘गलत निर्णय’ भी एक ही मुकदमेबाजी के पक्षकारों पर बाध्यकारी रहता है, यदि सक्षम अधिकार क्षेत्र के न्यायालय द्वारा प्रदान किया जाता है।

इस तरह के बाध्यकारी निर्णय को ‘पर इनक्यूरियम’ सिद्धांत पर भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है क्योंकि यह सिद्धांत मिसालों पर लागू होता है, न कि रेस ज्यूडिकाटा के सिद्धांत पर

मणिपुर राज्य बनाम बी अब्दुल हनान और एनरी SLP (CRL) 2420 / 2022
बेंच – जस्टिस अजय रस्तोगी और सीटी रविकुमार

कानून के तहत प्रक्रिया का पालन किए बिना व्यक्तिगत स्वतंत्रता “अस्थायी रूप” से भी नहीं छीनी जा सकती

व्यक्तिगत स्वतंत्रता और व्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार किसी भी व्यक्ति का सबसे प्रिय एवं पोषित अधिकार

संविधान का अनुच्छेद 21 घोषित करता है कि किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा, सिर्फ कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के सिवाय

बंदी द्वारा अनुरोधित दस्तावेजों की आपूर्ति से इनकार या हिरासत में लेने वाले प्राधिकारी द्वारा भरोसा किए गए दस्तावेजों की अस्पष्ट या धुंधली प्रतियों की आपूर्ति

संविधान के अनुच्छेद 22(5) का उल्लंघन

◾ संविधान का अनुच्छेद 22(5) हिरासत में लिए गए व्यक्ति को दो अधिकार प्रदान करता है,

पहला, उन आधारों के बारे में सूचित करने का अधिकार जिन पर हिरासत का आदेश दिया गया है और

दूसरा, उन्हें जल्द से जल्द हिरासत के आदेश के खिलाफ एक प्रतिनिधित्व देने का मौका दिया जाना चाहिए।

👉 प्रतिनिधित्व करने के अधिकार का तात्पर्य है कि बंदी के पास सभी जानकारी होनी चाहिए जो उसे एक प्रभावी प्रतिनिधित्व करने में सक्षम बनाती है। इसमें कोई संदेह नहीं है, यह अधिकार खंड (6) द्वारा दिए गए अधिकार या विशेषाधिकार के अधीन है।

📑 18 OCTOBER 2022

बीएसईएस राजधानी पावर लिमिटेड बनाम दिल्ली विद्युत नियामक आयोग
Civil Appeal No(s). 4324 of 2015
बेंच – जस्टिस एस अब्दुल नजीर और कृष्ण मुरारी 

सीपीसी की धारा 100 के तहत, अपील तभी दायर की जा सकती है जब मामले में ‘कानून का एक महत्वपूर्ण प्रश्न’ शामिल हो, जैसा कि अपीलीय अदालत द्वारा तैयार किया जा सकता है।

जब यह निर्धारित करने के लिए कि क्या उठाया गया कानून का सवाल पर्याप्त है,

यह देखना होगा कि क्या यह पार्टियों के अधिकारों को सीधे और काफी हद तक प्रभावित करता है।

शब्द और वाक्यांश – अपील

अपील के तहत आदेश में किसी भी संभावित त्रुटि (त्रुटियों) को सुधारने के लिए एक उच्च न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालय के निर्णय की न्यायिक परीक्षा है। कानून इस तथ्य की मान्यता में अपील का उपाय प्रदान करता है कि न्यायिक स्तरों पर काम करने वाले भी गलतियाँ कर सकते हैं

📑 17 OCTOBER 2022

LII-C केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर बनाम वहीद उर रहमान पारा
SLP (CRL) No. 9572/2022
बेंच – जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस अभय श्रीनिवास ओका

जमानत के आदेश कुरकुरा, छोटा संक्षिप्त और स्पष्ट होने चाहिए,

जो दो चार पेज से अधिक नहीं होना चाहिए

जमानत के मामले में अन्य पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करने की जरूरत नहीं है

📑 16 OCTOBER 2022

पुलिस निरीक्षक बनाम लाली @ मणिकंदन और अन्य आदि के माध्यम से राज्य
CRIMINAL APPEAL NOS. 1750-1751 OF 2022
बेंच – जस्टिस एमआर शाह  एवं जस्टिस कृष्णा मुरारी

केवल इसलिए कि मूल शिकायतकर्ता की जांच नहीं की गई है, एक प्रत्यक्षदर्शी के बयान को खारिज करने का आधार नहीं हो सकता

शिकायतकर्ता का परीक्षण न होना चश्मदीदों के बयान को खारिज करने का आधार नहीं

एकमात्र चश्मदीद गवाह के बयान के आधार पर सजा हो सकती है, अगर उक्त गवाह भरोसेमंद और/या विश्वसनीय पाया जाता है

📑 14 OCTOBER 2022

कपिल कुमार बनाम राज कुमार
CIVIL APPEAL NO.  5854 OF 2022
बेंच – Justice MR Shah and Justice Krishna Murari

जब तक नीचे के न्यायालयों द्वारा दर्ज समवर्ती निष्कर्ष विकृत नहीं पाए जाते,

तब तक सीपीसी की धारा 100 के तहत शक्तियों के प्रयोग में उच्च न्यायालय द्वारा हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए

📑 13 OCTOBER 2022

बंगाल सचिवालय सहकारी भूमि बंधक बैंक और हाउसिंग सोसाइटी लिमिटेड बनाम आलोक कुमार और अन्य
बेंच – मुख्य न्यायाधीश यूयू ललित, न्यायमूर्ति एस रवींद्र भट और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला

संविधान का 97 वां संशोधन अधिनियम, भाग IX बी, 2011 स्थानीय सहकारी समितियों पर लागू नहीं,

यह केंद्र शासित प्रदेशों के भीतर बहु-राज्य समितियों और समितियों पर लागू होता है

ऐशत शिफा बनाम कर्नाटक राज्य और अन्य जुड़े मामलों के साथ
बेंच – न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता और न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया

एक धार्मिक समुदाय को अपना धार्मिक चिन्ह पहनने की अनुमति देना धर्मनिरपेक्षता के विपरीत होगा

न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता ने हिजाब मामले में फैसला सुनाते हुए कर्नाटक उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ दायर सभी अपीलों को खारिज कर दिया। जिसमे यह माना था कि इस्लामी आस्था में हिजाब एक आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं है। कोर्ट ने यह भी माना कि स्कूल वर्दी का निर्धारण एक उचित प्रतिबंध है, संवैधानिक रूप से अनुमेय है।

दूसरी ओर, न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया ने कहा कि लड़कियों को स्कूल के गेट में प्रवेश करने से पहले हिजाब उतारने के लिए कहना उनकी निजता पर हमला, उनकी गरिमा पर हमला है और अंततः उन्हें धर्मनिरपेक्ष शिक्षा से वंचित करना है।

एक प्री-यूनिवर्सिटी स्कूली छात्रा को अपने स्कूल के गेट पर हिजाब उतारने के लिए कहना उसकी निजता और गरिमा पर ‘आक्रमण’ है। उन्होंने कहा कि संवैधानिक योजना के तहत, हिजाब पहनना केवल ‘पसंद का मामला’ होना चाहिए।

एक बालिका को शिक्षा प्राप्त करने में जिन बाधाओं और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, वह एक बालक की तुलना में कई गुना अधिक होती है। उन्होंने कहा, ‘‘वे (बालिकाएं) हमारी आशा हैं, हमारा भविष्य हैं, लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि एक बालिका के लिए अपने भाई की तुलना में शिक्षा प्राप्त करना कहीं अधिक कठिन है।’’

👉 उच्चतम न्यायालय ने कर्नाटक के शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पहनने पर लगा प्रतिबंध हटाने से इनकार करने वाले कर्नाटक उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर खंडित फैसला सुनाया और इस संवेदनशील मामले को प्रधान न्यायाधीश के पास भेज दिया, ताकि एक वृहद पीठ का गठन किया जा सके।

राज श्री अग्रवाल बनाम सुधीर मोहन और अन्य
Civil Appeal No. 7266 of 2022
बेंच: जस्टिस एमआर शाह और कृष्ण मुरारी

अनुच्छेद 227 के तहत याचिका सिर्फ इसलिए खारिज नहीं की जा सकती क्योंकि धारा 115 सीपीसी में रिवीज़न का उपाय उपलब्ध

सुनवाई करने और सुनवाई योग्य होने के बीच अंतर और भेद है

भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत उपलब्ध उपाय संविधान के तहत एक संवैधानिक उपाय है जिसे हटाया नहीं जा सकता है।

👉 किसी दिए गए मामले में न्यायालय भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकता जब न्यायालय की राय है कि पीड़ित पक्ष के पास सीपीसी के तहत एक और प्रभावकारी उपाय उपलब्ध है।

सुब्रमण्य बनाम कर्नाटक राज्य
CRIMINAL APPEAL NO. 242 OF 2022
बेंच – मुख्य न्यायाधीश उदय उमेश ललित और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला

किसी आरोपी का खुद का आचरण हत्या जैसे गंभीर अपराध के लिए उसे दोषी ठहराने का आधार नहीं

एक आरोपी का आचरण साक्ष्य अधिनियम की धारा 8 के तहत एक प्रासंगिक तथ्य हो सकता है, लेकिन उसे दोषी ठहराने या उसे दोषी ठहराने का आधार नहीं हो सकता है और वह भी हत्या जैसे गंभीर अपराध के लिए

📑 12 OCTOBER 2022

मारियानो एंटो ब्रूनो बनाम पुलिस निरीक्षक
CRIMINAL APPEAL NO. 1628 OF 2022:
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और कृष्णा मुरारी

आईपीसी की धारा 306 के तहत अभियुक्तों के कृत्य दोषसिद्धि के लिए घटना के निकट होने चाहिए

आरोपी की ओर से आत्महत्या के समय के करीब सकारात्मक कार्रवाई, जिसने मृतक को आत्महत्या के लिए प्रेरित किया या मजबूर किया,

भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत दोषसिद्धि के लिए स्थापित की जानी चाहिए।

केवल उत्पीड़न के आरोप पर बिना किसी सकारात्मक कार्रवाई के आरोपी की ओर से घटना के समय के करीब, जिसने व्यक्ति को आत्महत्या करने के लिए प्रेरित किया या या मजबूर किया,

धारा 306 आईपीसी के संदर्भ में दोषसिद्धि टिकाऊ नहीं

महेश गोविंदजी त्रिवेदी बनाम बकुल मगनलाल व्यास ।
CIVIL APPEAL NO. 7203 OF 2022
बेंच – जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और अनिरुद्ध बोस

Code of Civil Procedure, 1908 Order VIII Rule 6A

विचाराधीन ‘प्रतिदावे’ ( Counter Claim ) को केवल इसलिए विचार से बाहर नहीं किया जा सकता , क्योंकि यह लिखित कथन दाखिल करने के बाद लंबे समय के बाद प्रस्तुत किया गया था

देर से दायर प्रतिदावे को रिकॉर्ड पर लेने के लिए कोई रोक नहीं, जो वास्तव में मुद्दों को तय करने से पहले दायर किया गया था

इस मामले में, लिखित कथन दाखिल करने के लगभग 13 साल बाद विचाराधीन प्रति-दावा दायर किया गया था

📑 11 OCTOBER 2022

दशरथभाई त्रिकंबाई पटेल बनाम हितेश महेंद्रभाई पटेल और अन्य
Criminal Appeal No. 1497 of 2022
बेंच – जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस हेमा कोहली

जब ऋण का आंशिक भुगतान चेक के आहरण के बाद किया जाता है, लेकिन चेक को भुनाने से पहले, ऐसे भुगतान को अधिनियम की धारा 56 के तहत चेक पर पृष्ठांकित किया जाना चाहिए।

आंशिक भुगतान को पृष्ठांकित किए बिना चेक को नकदीकरण के लिए प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है। बिना समर्थन वाला चेक प्रस्तुत करने पर अनादरित हो जाता है, तो धारा 138 के तहत अपराध को आकर्षित नहीं किया जाएगा

क्योंकि चेक नकदीकरण के समय कानूनी रूप से लागू करने योग्य ऋण का प्रतिनिधित्व नहीं करता

📑 10 OCTOBER 2022

योगेश जैन बनाम सुमेश चड्ढा
CRIMINAL APPEAL No(s). 1760-1761 OF 2022
बेंच – जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर और जस्टिस जेबी पारदीवाला

◾ Negotiable Instruments Act, 1881 Section 118,138,139

एक बार चेक जारी होने के बाद और अनादरित होने पर एक वैधानिक नोटिस जारी किया जाता है,

यह आरोपी के लिए NI ACT की धारा 118 और 139 के जवाब के तहत उपलब्ध कानूनी धारणा को खत्म करता है

◾ Code of Criminal Procedure, 1973; Section 482 – The Negotiable Instruments Act, 1881; Section 138,139

प्रश्नगत चेक एक समयबाधित ऋण के लिए जारी किया गया था या नहीं, यह प्रथम दृष्टया साक्ष्य का मामला है

इसका निर्धारण धारा 482 सीआरपीसी के तहत एक याचिका में नहीं किया जा सकता

ललनकुमार सिंह बनाम महाराष्ट्र राज्य
Criminal Apeal 1757/ 2022
बेंच – जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस सीटी रविकुमार

Code of Criminal Procedure, 1973; Section 204


प्रक्रिया जारी करने के आदेश को रद्द किया जा सकता है , यदि इस निष्कर्ष पर पहुंचते हुए कि अभियुक्त के विरुद्ध प्रथम दृष्टया मामला है, और कोई कारण नहीं दिया गया है, तो आदेश रद्द किए जाने योग्य

मजिस्ट्रेट के लिए यह आवश्यक है कि वह मामले में कार्यवाही के लिए पर्याप्त आधार मौजूद है या नहीं, इस बारे में अपने विवेक का प्रयोग करें।

एम एस मदनगोपाल बनाम के ललिता
Criminal Apeal 1759 OF 2022
बेन्च – जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर और जस्टिस जेबी पारदीवाला

IPC की धारा 294 के तहत अपराध को साबित करने के लिए केवल अश्लील शब्द बोलना पर्याप्त नहीं ,

बल्कि यह स्थापित करने के लिए एक और सबूत होना चाहिए कि ‘ यह दूसरों की नाराज़गी के लिए था , जिसकी मामले में कमी है ।

धारा 294 ( b ) आईपीसी के तहत अश्लीलता का परीक्षण यह है कि क्या अश्लीलता के रूप में आरोपित मामले की प्रवृत्ति उन लोगों को भ्रष्ट करने की है जिनके दिमाग ऐसे अनैतिक प्रभावों के लिए खुले हैं ।

📑 30 SEPTEMBER 2022

मुकेश सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
SPECIAL LEAVE PETITION (CRIMINAL) Diary No(s). 8905/2022; 30-09-2022
बेंच – जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस सीटी रविकुमार

Code of Criminal Procedure, 1973 Section 309

गवाह का मुख्य परीक्षण (Chief- Examination) और प्रति परीक्षण या जिरह (Cross- Examination) एक ही दिन या अगले दिन दर्ज किया जाना चाहिए।

कानून का मैंडेट स्वयं यह निर्धारित करता है कि जिरह के बाद मुख्य परीक्षण को या तो उसी दिन या अगले दिन दर्ज किया जाना है।

अभियोजन पक्ष के गवाह के मुख्य परीक्षण /प्रति परीक्षण को रिकॉर्ड करने में स्थगन का कोई आधार नहीं होना चाहिए”

महाराष्ट्र राज्य और अन्य बनाम सुश्री माधुरी मारुति विधाते
CIVIL APPEAL NO. 6938 OF 2022
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस कृष्ण मुरारी 

एक विवाहित बेटी को उसकी मृत मां पर ‘आश्रित’ नहीं कहा जा सकता है,

इसलिए, अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति की हकदार नहीं

अगर किसी विवाहित बेटी को अनुकंपा के आधार पर नियुक्त किया जाता है, तो यह अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति के उद्देश्य के विपरीत होगा।

मुनिकृष्णा @ कृष्णा बनाम स्टेट बाय यूआईसूर पीएस
Criminal Appeal 1597-1600 OF 2022
बेंच – CJI उदय उमेश ललित, जस्टिस एस रवींद्र भट और सुधांशु धूलिया

क्या पुलिस के सामने किए गए स्वीकारोक्ति के वीडियो के आधार पर दोषसिद्धि दर्ज की जा सकती है?

पुलिस के सामने बने “स्वीकारोक्ति का वीडियो” साक्ष्य में अस्वीकार्य

सीआरपीसी की धारा 161 के तहत एक आरोपी द्वारा पुलिस को दिया गया बयान सबूत के तौर पर स्वीकार्य नहीं है।

संविधान के अनुच्छेद 20(3) के तहत किसी आरोपी को अपने खिलाफ गवाह बनने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है और साक्ष्य अधिनियम की धारा 25 के तहत पुलिस को दिया गया इकबालिया बयान सबूत के तौर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

👉 सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक हत्या के मामले में समवर्ती दोषियों को अलग रखा और कहा कि पुलिस के सामने किए गए कबूलनामे का वीडियो सबूत के रूप में अस्वीकार्य है।

मुनिकृष्णा @ कृष्णा बनाम राज्य यूआईसूर पीएस द्वारा
CRRIMINAL APEAL 1597-1600 of 2022
बेंच – CJI उदय उमेश ललित, जस्टिस एस रवींद्र भट और सुधांशु धूलिया

परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर विचार करते हुए अपने मामले को उचित संदेह से परे साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष पर बहुत भारी कर्तव्य

परिस्थितिजन्य साक्ष्य के मामले में, साक्ष्य की पूरी श्रृंखला पूरी होनी चाहिए और साक्ष्य की श्रृंखला की जांच के बाद,

जो निष्कर्ष निकलता है, वह अभियुक्त की दोषीता की ओर इशारा करती होनी चाहिए, किसी अन्य निष्कर्ष पर नहीं जाना चाहिए

📑 29 SEPTEMBER 2022

जियासी राम और अन्य बनाम आईसीआईसीआई लोम्बार्ड जनरल इंश्योरेंस कंपनी और अन्य CIVIL APPEAL NOs. 7025-7026 OF 2022 [@ SPECIAL LEAVE PETITION (C) Nos. 20035-20036 OF 2019] बेंच – जस्टिस रवींद्र भट और जस्टिस सुधांशु धूलिया

[ Motor Accident Claim ]

किसी अविवाहित की मृत्यु के मामले में आश्रितों की उम्र के बजाय “मृतक की उम्र ” गुणक का आधार है।

एक्स बनाम प्रमुख सचिव, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, दिल्ली एनसीटी 
Civil Appeal No. 5802 of 2022 arising out of S.L.P. (C) No. 12612 of 2022
बेंच – जस्टिस डॉ धनंजय वाई चंद्रचूड़, जस्टिस ए एस बोपन्ना, जस्टिस जे बी पारदीवाला

किसी महिला की वैवाहिक स्थिति को उसे अनचाहे गर्भ गिराने के अधिकार से वंचित करने का आधार नहीं बनाया जा सकता है। एकल और अविवाहित महिलाओं को भी गर्भावस्था के 24 सप्ताह में उक्त कानून के तहत गर्भपात का अधिकार है।
मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी एक्ट में 2021 का संशोधन विवाहित और अविवाहित महिलाओं के बीच भेदभाव नहीं करता है

किसी महिला को 20 हफ्ते के ज्यादा के गर्भ को गिराने से मना इस आधार पर करना कि वह अविवाहित है, यह संविधान के अनुच्‍छेद 14 का उल्‍लंघन होगा

एमटीपी एक्ट के प्रावधानओं की व्याख्या करते हुए कोर्ट ने अपना यह फैसला सुनाया है. एमटीपी एक्ट के मुताबिक सिर्फ बलात्कार पीड़ित, नाबालिग या फिर उन महिलाओं को 24 हफ्ते तक अबॉर्शन की इजाजत है जो मानसिक रूप से बीमार हो. कानून के मुताबिक सहमति से बने संबंध से ठहरे गर्भ को सिर्फ 20 हफ्ते तक गिराया जा सकता है.

किसी महिला को किसी भी अवांछित गर्भावस्था को जारी रखने के लिए मजबूर करना महिला की शारीरिक अखंडता का उल्लंघन करता है, उसके मानसिक आघात को बढ़ाता है और गर्भावस्था से होने वाले तत्काल सामाजिक, वित्तीय और अन्य परिणामों के कारण महिला के मानसिक स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव डालता है।

यह धारणा कि केवल विवाहित महिलाएं ही संभोग में लिप्त होती हैं, और इसके परिणामस्वरूप, कानून का लाभ केवल उन्हें ही मिलना चाहिए।  विवाहित और अविवाहित महिलाओं के बीच यह कृत्रिम भेद संवैधानिक रूप से टिकाऊ नहीं है।  कानून में लाभ एकल और विवाहित महिलाओं दोनों को समान रूप से मिलते हैं।

डाक्टर द्वारा पुलिस को दी जाने वाली जानकारी में गर्भपात की मांग करने वाली नाबालिग लड़की की पहचान का खुलासा करने की आवश्यकता नहीं

एक पंजीकृत चिकित्सक को पॉक्सो एक्ट की धारा 19 के तहत दी गई जानकारी में नाबालिग की पहचान और अन्य व्यक्तिगत विवरण का खुलासा करने से छूट दी गई है।

पॉक्सो अधिनियम, 2012 की धारा 19

◼️ बच्चे सहित किसी भी व्यक्ति के लिए पुलिस से संपर्क करना अनिवार्य बनाती है, यदि उक्त व्यक्ति को इस बात की आशंका है कि अधिनियम के तहत अपराध किए जाने की संभावना है या उसे यह जानकारी है कि ऐसा एक कृत्य किया गया है।

◼️ यह जानकारी विशेष किशोर इकाई या स्थानीय पुलिस को देना आवश्यक है। यदि कोई व्यक्ति अपराध की रिपोर्ट करने में विफल रहता है तो उसे पॉक्सो अधिनियम की धारा 21 के तहत अधिकतम “छह महीने” की कैद या जुर्माना या दोनों से दंडित किया जा सकता है।

📑 28 SEPTEMBER 2022

सुखबीर देवी और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य
Civil Appeal 10834/2010
बेंच – जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस सीटी रविकुमार

[ CPC 1908 ] क्या लिमिटेशन के मुद्दे को सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश XIV , नियम 2 ( 2 ) के तहत प्रारंभिक मुद्दे के रूप में निर्धारित किया जा सकता है ?

एक मामले में जहां लिमिटेशन के सवाल का फैसला स्वीकार किए गए तथ्यों के आधार पर किया जा सकता है , तो इसे सिविल प्रक्रिया संहिता ( सीपीसी ) के आदेश XIV , नियम 2 ( 2 ) ( बी ) के तहत ‘ प्रारंभिक मुद्दे ‘ के रूप में तय किया जा सकता है ।

[ Limitation Act , 1963 ; Article 136 ] अनुच्छेद 136 तभी लागू होता है जब किसी डिक्री ( अनिवार्य निषेधाज्ञा देने वाली डिक्री के अलावा ) या किसी सिविल कोर्ट के आदेश के निष्पादन के लिए आवेदन दायर किया जाना हो ।

अंजू गर्ग और अन्य बनाम  दीपक कुमार गर्ग
[Criminal Appeal No. 1693 of 2022 arising out of S.L.P. (Crl.) No. 10353 of 2018]
बेंच – जस्टिस दिनेश माहेश्वरी एवं जस्टिस एम. त्रिवेदी

[ CRPC 1973 SEC 125 ]

कानून के तहत कानूनी रूप से अनुमेय आधारों को छोड़कर, पत्नी और नाबालिग बच्चों को शारीरिक श्रम के माध्यम से कमाई करके भी वित्तीय सहायता प्रदान करना पति का पवित्र कर्तव्य है।

धारा 125 CRPC के तहत कार्यवाही एक सारांश प्रकृति की है, इसका उद्देश्य बेसहारा पत्नियों और बच्चों को सक्षम बनाना है, चाहे वे वैध हों या नाजायज, त्वरित तरीके से भरण-पोषण प्राप्त करने के लिए।

धारा 125 की कल्पना एक महिला की पीड़ा और वित्तीय पीड़ा को दूर करने के लिए की गई थी, जिसे वैवाहिक घर छोड़ने की आवश्यकता होती है, ताकि सक्षम करने के लिए कुछ उपयुक्त व्यवस्था की जा सके

दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 सामाजिक न्याय का एक उपाय, इसे विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाया गया है। यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 39 द्वारा प्रबलित अनुच्छेद 15(3) के संवैधानिक दायरे में भी आता है। 

धारा 125 पत्नियों, बच्चों और माता-पिता के भरण-पोषण से संबंधित है जबकि संविधान का अनुच्छेद 15 (3) राज्य को महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान करने की अनुमति देता है।


📑 24 SEPTEMBER 2022

मोरेशर यादराव महाजन बनाम व्यंकटेश सीताराम भेदी (डी)
CIVIL APPEAL NOS. 5755-5756 OF 2011
बेंच – जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस सीटी रविकुमार

[ सिविल प्रक्रिया संहिता, 1973; आदेश I नियम 9 ]

एक “आवश्यक पक्ष” ( necessary party ) एक ऐसा व्यक्ति है जिसे एक पार्टी के रूप में शामिल होना चाहिए था और जिसकी अनुपस्थिति में अदालत द्वारा कोई भी प्रभावी डिक्री पारित नहीं की जा सकती थी। 

यदि किसी “आवश्यक पक्ष” की पैरवी नहीं की जाती है, तो वाद स्वयं ही खारिज हो जाता है  

👉 एक आवश्यक पक्ष कौन होगा इसे दोहरे परीक्षण से संतुष्ट करना होगा –

◾पहला यह है कि कार्यवाही में शामिल विवादों के संबंध में ऐसे पक्ष के खिलाफ कुछ राहत का अधिकार होना चाहिए। 

◾दूसरा यह है कि ऐसी पार्टी की अनुपस्थिति में कोई प्रभावी फरमान पारित नहीं किया जा सकता है

📑 23 SEPTEMBER 2022

अमीनुद्दीन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
CRIMINAL APPEAL NO. …….. OF 2022
बेन्च – जस्टिस दिनेश माहेश्वरी, जस्टिस कृष्ण मुरारी

[ हत्या का अपराध ]

◾एक बार आरोपी को जमानत देने का आधार समाप्त हो गया है तो ,

जमानत देने का आदेश कायम नहीं रह सकता

◾केवल “रिकॉर्ड का अवलोकन करने” और “मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर” एक तर्कसंगत आदेश न्यायिक उद्देश्य को पूरा नहीं करता

यह खुले न्याय का एक मौलिक आधार है, जिसके लिए हमारी न्यायिक प्रणाली प्रतिबद्ध है, जो कारक न्यायाधीश के दिमाग में अस्वीकृति या जमानत देने के लिए पारित आदेश में दर्ज हैं

इस धारणा पर आधारित हो कि न्याय न केवल किया जाना चाहिए, बल्कि स्पष्ट रूप से और निस्संदेह रूप से होता हुआ दिखना चाहिए। तर्कसंगत निर्णय देने का न्यायाधीशों का कर्तव्य इस प्रतिबद्धता के केंद्र में है।

जिगर @ जिमी प्रवीणचंद्र अदतिया बनाम। गुजरात राज्य
[Criminal Appeal No. 1656 of 2022 arising out of S.L.P. (Crl.) No. 7696 of 2021]
बेंच – जस्टिस अजय रस्तोगी , जस्टिस अभय एस. ओके

डिफॉल्ट जमानत देने से आरोप पत्र दाखिल करने के बाद “ठोस आधार पर” याचिकाकर्ताओं की पुन: गिरफ्तारी को नहीं रोका जा सकता है।

इसके बाद, आरोपी के पास विकल्प – हमेशा नियमित जमानत के लिए आवेदन करे

Default Bail – अदालत में आरोप पत्र दायर नहीं किया गया है और आरोपी जमानत देने के लिए तैयार है, तो आरोपी डिफ़ॉल्ट जमानत/बाध्यकारी जमानत/सांविधिक जमानत के एक अक्षम्य अधिकार का हकदार है।

यह अधिकार मृत्यु, आजीवन कारावास और कम से कम 10 वर्ष के कारावास और किसी अन्य अपराध के लिए 60 दिनों की हिरासत के बाद दंडनीय मामलों में 90 दिनों की हिरासत के बाद प्राप्त होता है।

डिफ़ॉल्ट जमानत के तहत रिहा किए गए प्रत्येक व्यक्ति को सीआरपीसी के अध्याय XXXIII के तहत रिहा माना जाएगा।

Regular Bail- दंड प्रक्रिया संहिता की धारा- 437 और धारा 439 के तहत आवेदन। नियमित जमानत उस व्यक्ति को दी जाती है जो पहले से ही किसी अपराध के लिए पुलिस हिरासत में है या जब उसके खिलाफ ऐसा करने का आरोप है।

जमानत या नियमित जमानत से तात्पर्य नकद, बांड, या संपत्ति से है जो एक गिरफ्तार व्यक्ति अदालत को यह सुनिश्चित करने के लिए देता है कि वह जब भी आवश्यक हो, अदालत में पेश होगा

जिगर @ जिमी प्रवीणचंद्र अदतिया बनाम गुजरात राज्य
CRA 1656 of 2022
बेंच – जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस अभय एस ओका

Code of Criminal Procedure, 1973; Section 167(2)

न्यायालय के समक्ष या तो शारीरिक रूप से या वर्चुअल अभियुक्त को पेश करने में विफलता और उसे यह सूचित करने में विफलता कि लोक अभियोजक द्वारा जांच के लिए समय बढ़ाने के लिए प्रस्तुत आवेदन पर न्यायालय द्वारा विचार किया जा रहा है

यह घोर अवैधता है, जो अनुच्छेद 21 के तहत अभियुक्त के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करती है

📑 22 SEPTEMBER 2022

चंद्रभान (मृतक) बनाम सरस्वती
CIVIL APPEAL NO. OF 2022 [ARISING OUT OF S.L.P.(C) NO.8736 OF 2016]
बेंच – जस्टिस इंदिरा बनर्जी, जस्टिस जे.के.  माहेश्वरी

“अपील का अधिकार स्वचालित नहीं है – अपील का अधिकार क़ानून द्वारा प्रदान किया जाता है”

◾ जब क़ानून अपील का सीमित अधिकार प्रदान करता है तो केवल उन मामलों तक सीमित होता है जिनमें कानून के पर्याप्त प्रश्न शामिल होते हैं।

प्रथम अपीलीय न्यायालय द्वारा प्राप्त तथ्यात्मक निष्कर्षों पर अपील में बैठने के लिए सर्वोच्च न्यायालय खुला नहीं है।

◾ एक बार जब उच्च न्यायालय में कार्यवाही को धारा 100 सीपीसी के तहत दूसरी अपील के रूप में माना जाता है, तो उक्त धारा में निर्धारित प्रतिबंध लागू होंगे। उच्च न्यायालय को मामले को दूसरी अपील के रूप में देखना चाहिए और यह पता लगाना चाहिए  कि क्या कानून का एक महत्वपूर्ण प्रश्न विचार के लिए उठता है। 

जब तक कानून का कोई बड़ा सवाल नहीं, तब तक उच्च न्यायालय के पास दूसरी अपील पर विचार करने और गुण-दोष पर विचार करने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं

📑 19 SEPTEMBER 2022

राजू @राजेंद्र प्रसाद बनाम राजस्थान राज्य
CRIMINAL APPEAL NO. 1559 OF 2022
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस कृष्ण मुरारी

परिस्थितिजन्य साक्ष्य के मामले में, परिस्थितियों को संचयी रूप से एक श्रृंखला बनानी चाहिए, ताकि कोई बच न सके।

यह निष्कर्ष कि सभी मानवीय संभावनाओं के भीतर अपराध अभियुक्त द्वारा किया गया था और कोई नहीं

दोषसिद्धि बनाए रखने के लिए परिस्थितिजन्य साक्ष्य पूर्ण होना चाहिए और अभियुक्त के अपराध की तुलना में किसी अन्य परिकल्पना की व्याख्या करने में असमर्थ होना चाहिए

ऐसे साक्ष्य न केवल होने चाहिए बल्कि आरोपी के अपराध के अनुरूप होना चाहिए , लेकिन उसकी बेगुनाही के साथ असंगत होना चाहिए।

परिस्थितिजन्य साक्ष्य किसे कहते हैं ?

परिस्थितिजन्य साक्ष्य:-जब किसी तथ्य को साबित करने के लिए प्रत्यक्ष साक्ष्य उपलब्ध नहीं होता है तो ऐसी अवस्था में कुछ परिस्थितियों का सहारा लिया जाता है। यह परिस्थितियां घटना के इर्द गिर्द घूमने वाले तथ्य या सबूत होती हैं जिनका अवलोकन करने से यह पता चलता है कि कोई घटना वास्तव में घटी है, इसी को ‘परिस्थितिजन्य साक्ष्य या सुसंगत तथ्यों का साक्ष्य’ कहते हैं।

परिस्थिति जन्य साक्ष्य यद्यपि प्रत्यक्ष साक्ष्य या मूल साक्ष्य नहीं होता, किन्तु यह अनुश्रुत साक्ष्य से अधिक महत्वपूर्ण होता है। पेवी के शब्दों में, साक्षी झूठ बोल सकते हैं लेकिन परिस्थितियां नहीं।

त्रिमूर्ति सुगंध बनाम दिल्ली और अन्य
CIVIL APPEAL NO. 8486 OF 2011
बेंच – जस्टिस इंदिरा बनर्जी, हेमंत गुप्ता, सूर्यकांत, एमएम सुंदरेश और सुधांशु धूलिया की संविधान पीठ

शीर्ष अदालत की एक बड़ी बेंच द्वारा दिए गए फैसले का एक छोटी बेंच के फैसले पर बल होगा,

भले ही बड़ी बेंच में बहुमत की राय देने वाले न्यायाधीशों की संख्या कम या उसके बराबर हो।

अर्थात संविधान पीठ में बड़ी बेंच का फैसला ही मान्य होगा चाहे, इसी मामले में छोटी संविधान पीठ ने बहुमत या सर्वसम्मति से ही फैसला क्यों न दिया हो.

यानी जजों के अधिक बहुमत के बावजूद बड़ी बेंच का फैसला ही मान्य होगा

👉 उदाहरण के लिए 7 जजों के पीठ का 4:3 बहुमत के साथ दिया गया निर्णय

👉 सर्वसम्मति से यानी बहुमत के 5-जजों के पीठ के फैसले पर प्रबल और प्रभावी होगा

In Re: Framing Guidelines … vs Unknown
SUO MOTU WRIT PETITION (CRL.) NO.1 OF 2022
बेंच – सीजेआई उदय उमेश ललित, जस्टिस एस रवींद्र भाटी, जस्टिस सुधांशु धूलिया

सामान्य नियम यह है कि हत्या के अपराध में आजीवन कारावास की सजा दी जाएगी लेकिन अदालत उस नियम से हट सकती है और मौत की सजा तभी दे सकती है जब ऐसा करने के विशेष कारण हों। मौत की सजा देने से पहले ऐसे कारणों को लिखित रूप में दर्ज किया जाना चाहिए

🔘 धारा 302 दण्ड संहिता के अन्तर्गत हत्या के अपराध में दण्डित किये जाने के प्रश्न पर विचार करते हुए अदालत को

▶ अपराध के साथ-साथ अपराधी से संबंधित हर प्रासंगिक परिस्थिति का ध्यान रखना चाहिए।

▶यदि न्यायालय पाता है, लेकिन अन्यथा नहीं, कि अपराध एक असाधारण रूप से भ्रष्ट और जघन्य प्रकृति का है और इसके डिजाइन और इसके निष्पादन के तरीके के कारण, बड़े पैमाने पर समाज के लिए गंभीर खतरे का स्रोत है, तो अदालत मौत की सजा दे सकती है।

▶ हत्या के लिए सामान्य सजा आजीवन कारावास है, इसलिए सजा के सवाल पर अभियुक्त को सुनना महत्वपूर्ण है। यदि कानून दंड संहिता की धारा 303 के रूप में मौत की अनिवार्य सजा प्रदान करता है, तो न तो धारा 235(2) और न ही धारा 354(3)दंड प्रक्रिया संहिता के लागू होने की संभावना है। यदि अदालत के पास मौत की सजा देने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, तो सजा के सवाल पर अभियुक्त को सुनना व्यर्थ है और मौत की सजा को लागू करने के कारणों को बताना अतिश्योक्तिपूर्ण हो जाता है”

📑 16 SEPTEMBER 2022

सुधामयी पटनायक बनाम बिभु प्रसाद साहू
CIVIL APPEAL 6370 OF 2022
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और कृष्णा मुरारी

[ Plaintiffs Are The Domius Litis ] CPC 1908

जब तक अदालत स्वत: संज्ञान लेकर आदेश 1 नियम 10 सीपीसी के अनुसार प्रभावी डिक्री या उचित न्यायनिर्णयन के लिए वाद में पक्षकार नहीं होने वाले किसी अन्य व्यक्ति को शामिल करने का निर्देश नहीं देती,

तब तक किसी को भी वादी की इच्छा के विरुद्ध प्रतिवादी के रूप में अभियोग चलाने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।

एसपी मणि और मोहन डेयरी बनाम डॉ स्नेहलता एलंगोवन
CRIMINAL APPEAL NO.1586 OF 2022
बेंच – जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जे.बी. परदीवाला

जब अभियुक्त किसी कंपनी का प्रबंध निदेशक या संयुक्त प्रबंध निदेशक हो,

शिकायत में यह कहना आवश्यक नहीं है कि वह कंपनी का प्रभारी है और कंपनी के व्यवसाय के संचालन के लिए कंपनी के प्रति उत्तरदायी है।

ऐसा इसलिए है क्योंकि “निदेशक” शब्द के लिए उपसर्ग “प्रबंधन” यह स्पष्ट करता है कि निदेशक कंपनी के व्यवसाय के संचालन के लिए कंपनी का प्रभारी और जिम्मेदार था।

कंपनी का एक निदेशक या एक अधिकारी जिसने चेक पर हस्ताक्षर किए हैं, अनादर के मामले में खुद को उत्तरदायी बनाता है।

किसी कंपनी के अन्य अधिकारियों को एनआई अधिनियम की धारा 141 की उप-धारा (2) के तहत शिकायत में औसत करके ही उत्तरदायी बनाया जा सकता है,

कंपनी में उनकी स्थिति और कर्तव्य, और चेक के मुद्दे और अनादर के संबंध में उनकी भूमिका, सहमति, मिलीभगत या लापरवाही का खुलासा करना।

▶ धारा 138 एक ऐसे व्यक्ति पर कारावास या जुर्माना या दोनों के साथ दंडनीय आपराधिक दायित्व का प्रावधान करती है, जो किसी ऋण या देयता को पूरी तरह से या आंशिक रूप से भुगतान करने के लिए चेक जारी करता है और चेक प्रस्तुत करने पर बैंक द्वारा अनादरित किया जाता है।

▶ धारा 141 कंपनी के मामले में ऐसे प्रत्येक व्यक्ति के लिए आपराधिक दायित्व का विस्तार करती है जो अपराध के समय कंपनी के व्यवसाय के संचालन के लिए प्रभारी था और जिम्मेदार था। अधिनियम की धारा 141 में निहित एक प्रावधान के अनुसार, ऐसा व्यक्ति धारा 138 के तहत अपराध के लिए दोषी ठहराया जा सकता है और तदनुसार दंडित किया जा सकता है।”

📑 15 SEPTEMBER 2022

फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया बनाम राजीव कॉलेज ऑफ फार्मेसी
CIVIL APPEAL NO. 6681 OF 2022
बेंच – जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस पमिदिघंतम श्री नरसिम्हा

शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने का अधिकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1) (g)  के तहत गारंटीकृत ‘मौलिक अधिकार’

इस तरह के अधिकार पर उचित प्रतिबंध हो सकते हैं लेकिन ऐसा प्रतिबंध केवल सक्षम विधायिका द्वारा अधिनियमित कानून द्वारा ही लगाया जा सकता है

▶ शिक्षण संस्थानों की स्थापना के संबंध में, संविधान के तीन अनुच्छेद चलन में आते हैं।

अनुच्छेद 19(1)(g) सभी नागरिकों को किसी भी पेशे का अभ्यास करने या कोई व्यवसाय, व्यापार या व्यवसाय करने का अधिकार देता है; यह अधिकार उन प्रतिबंधों के अधीन है जिन्हें अनुच्छेद 19(6) के तहत रखा जा सकता है।

अनुच्छेद 26 प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय को धार्मिक उद्देश्यों के लिए एक संस्था स्थापित करने और बनाए रखने का अधिकार देता है, जिसमें एक शैक्षणिक संस्थान शामिल होगा।

इसलिए अनुच्छेद 19(1)(g) और अनुच्छेद 26, सभी नागरिकों और धार्मिक संप्रदायों को शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और रखरखाव का अधिकार प्रदान करते हैं….”

पंजाब राज्य बनाम जसबीर सिंह
बेंच – जस्टिस संजय किशन कौल, जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस विक्रम नाथ

धारा 340/195 सीआरपीसी के तहत आरोपी को प्रारंभिक जांच और सुनवाई का अवसर क्या अनिवार्य ?

▶ सीआरपीसी की धारा 340 में प्रारंभिक जांच और सीआरपीसी की धारा 195 के तहत शिकायत किए जाने से पहले आरोपी को सुनवाई का अवसर देने का अधिकार नहीं है।

सीआरपीसी की धारा 340(1) के तहत प्रारंभिक जांच का उद्देश्य यह पता लगाना नहीं था कि कोई व्यक्ति दोषी है या नहीं, बल्कि केवल यह तय करना है कि अपराध की जांच करना न्याय के हित में उचित था या नहीं।

▶ न्यायालय धारा 195(1)(बी) में निर्दिष्ट किसी अपराध के किए जाने के संबंध में शिकायत करने के लिए बाध्य नहीं है, क्योंकि यह धारा शब्दों से निर्धारित होती है कि “न्यायालय की राय है कि यह न्याय के हित में समीचीन है।”

इससे पता चलता है कि इस तरह का रास्ता तभी अपनाया जाएगा जब न्याय के हित की आवश्यकता होगी और हर मामले में नहीं।

👉 शिकायत दर्ज करने से पहले, न्यायालय प्रारंभिक जांच कर सकता है और इस आशय का निष्कर्ष दर्ज कर सकता है कि न्याय के हित में यह समीचीन है कि धारा 195 (i) (बी) में निर्दिष्ट किसी भी अपराध की जांच की जानी चाहिए। 

📑 14 SEPTEMBER 2022

कंचन कुमार बनाम बिहार राज्य 
CRIMINAL APPEAL NO. 1562 OF 2022
बेंच – जस्टिस डॉ. चंद्रचूड़, जस्टिस सुश्री कोहली, जस्टिस पामिडीघंटम श्री नरसिम्हा

Section 228 in The Code Of Criminal Procedure, 1973

‘आरोप तय करते समय’ ( At the framing of the charges ) रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के प्रमाणक मूल्य ( Probative value ) पर विचार नहीं किया जा सकता है,

लेकिन ‘आरोप तय करने से पहले’ अदालत को अपने न्यायिक दिमाग को रिकॉर्ड में रखी गई सामग्री पर लागू करना चाहिए और संतुष्ट होना चाहिए कि आरोपी द्वारा अपराध करना संभव था।

📑 13 SEPTEMBER 2022

रमन (मृत) एल.आर.एस. द्वारा. बनाम आर. नटराजन
CIVIL APPEAL NO. 6554 OF 2022
बेंच – जस्टिस ए एस बोपन्ना, जस्टिस वी. रामसुब्रमण्यम

Section 12 in The Specific Relief Act, 1963

कोई भी न्यायालय किसी तीसरे पक्ष के साथ एक समझौते में प्रवेश करने और ऐसे तीसरे पक्ष के खिलाफ विशिष्ट अनुतोष मांगने के लिए मजबूर करने वाले व्यक्ति के खिलाफ “विशिष्ट प्रदर्शन” की राहत नहीं दे सकता

अर्थात प्रतिवादी को किसी तीसरे पक्ष के साथ समझौता करने के लिए मजबूर करके उसके खिलाफ विशिष्ट अनुतोष नहीं दिया जा सकता

📑 12 SEPTEMBER 2022

मोहम्मद लतीफ माग्रे बनाम केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर और अन्य।
CIVIL APPEAL NO. 6544 OF 2022
बेंच – जस्टिस  सूर्यकांत और जस्टिस जेबी पारदीवाला

एक बार दफनाए जाने के बाद, एक शरीर को परेशान नहीं किया जाना चाहिए।

संविधान के तहत गरिमा और निष्पक्ष व्यवहार अनुच्छेद 21 का अधिकार न केवल एक जीवित व्यक्ति को बल्कि उसकी मृत्यु के बाद उसके शरीर को भी उपलब्ध

अपनी परंपरा, संस्कृति और धर्म के अधीन रहते हुए अगर वह जीवित होते तो सम्मान और सम्मान के हकदार होते ।

न्यायालय ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि भारत में सीआरपीसी की धारा 176 (3) के अलावा कोई अन्य कानून नहीं है, भारत संघ को निर्देश दिया कि वह इस विषय पर उचित कानून बनाने पर विचार कर सकता है।

उत्खनन का अनुरोध दो व्यापक श्रेणियों में आता है: “सार्वजनिक हित और व्यक्तिगत कारण।”

उत्खनन के लिए वैध अधिकार धारा 176(3) , सीआरपीसी , 1973 में निहित है। इस गतिविधि की अनुमति अपराध का पता लगाने और ऐसी अन्य दबाव वाली स्थितियों के उद्देश्य से है।

जब भी हत्या, आपराधिक गर्भपात, मौत का विवादित कारण, जहर आदि जैसे बेईमानी से खेलने का संदेह हो, तो पोस्टमार्टम परीक्षा के उद्देश्य से उत्खनन किया जा सकता है।

📑 09 SEPTEMBER 2022

विश्वनाथ प्रताप सिंह बनाम भारत निर्वाचन आयोग
SLP (C) 13013/2022
बेंच – जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस सुधांशु धूलिया

चुनाव लड़ने का अधिकार न तो ‘मौलिक अधिकार’ है और न ही ‘सामान्य कानून’

ये ‘क़ानून द्वारा प्रदत्त अधिकार’

कोई व्यक्ति यह दावा नहीं कर सकता है कि उसे चुनाव लड़ने का अधिकार है। जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के साथ चुनाव आचरण नियम, 1961 में भी नामांकन फॉर्म भरते समय उम्मीदवार के नाम को प्रस्तावित करने की व्यवस्था है।

अदालत ने कहा कि कोई व्यक्ति इस शर्त को अपने मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं बता सकता।

केतन कांतिलाल सेठ बनाम. गुजरात राज्य और अन्य
Transfer Petition (Criminal) Nos. 333348/2021
बेंच – जस्टिस जेके माहेश्वरी

क्या चार राज्यों में विभिन्न विचारण न्यायालयों के समक्ष लंबित आपराधिक मामलों को एक राज्य में एक विचारण न्यायालय में स्थानांतरित किया जा सकता है?

सीआरपीसी की धारा 406 के अंतर्निहित आशय

धारा 406 मामलों को स्थानांतरित करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की शक्ति से संबंधित है। निष्पक्ष सुनवाई के लिए और न्याय के अंत को सुरक्षित करने के लिए न्यायालय इस तरह की शक्ति का प्रयोग कर सकता है। 

धारा 406 की भाषा में निहित रूप से न्यायालय के विवेक पर मामलों के हस्तांतरण को छोड़ दिया गया है । यदि न्यायालय संतुष्ट है कि न्याय के हित में या न्याय के अंत को सुरक्षित करने के लिए मामलों को स्थानांतरित करना अनिवार्य है, तो वह ऐसा कर सकता है।

📑 08 SEPTEMBER 2022

हरियाणा राज्य बनाम आनंद किंडू
Criminal Appeal No. 1797-1798/2010
बेंच – जस्टिस संजय किशन कौल, जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस विक्रम नाथ

विशिष्ट मामलों में “मौत की सजा” के विकल्प के तौर पर 14 साल से अधिक की “निश्चित अवधि की सजा” दी जा सकती है

लेकिन “निश्चित अवधि की सजा” केवल हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी जा सकती है, न कि ट्रायल कोर्ट द्वारा

👉 उद्देश्य – एक निश्चित अवधि की सजा देने से दोषी के लिए सजा काटने के बाद समाज में फिर से एकीकृत होने की संभावना पैदा होती है। यह न्याय के लिए पीड़ितों की गुहार के बीच एक नाजुक संतुलन

👉 यदि कोई परिस्थिति अभियुक्त के पक्ष में है जैसे कि –

▶अपराध करने के इरादे की कमी,
▶ सुधार की संभावना,
▶ आरोपी की कम उम्र,
▶ आरोपी का समाज के लिए खतरा नहीं होना,
▶ कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड आदि,

आरोपी मृत्युदंड से बच सकता है

📑 07 SEPTEMBER 2022

शिव कुमार बनाम मध्य प्रदेश राज्य
CRIMINAL APPEAL NO._1503 OF 2022
बेंच – जस्टिस केएम जोसेफ और जस्टिस हृषिकेश रॉय

चोरी के सामान का प्रारंभिक कब्जा अवैध नहीं हो सकता है, लेकिन इसे इस ज्ञान के साथ बनाए रखना कि यह एक चोरी की संपत्ति थी, इसे भारतीय दंड संहिता की धारा 411 के तहत दोषी बनाता है।

अर्थात केवल चोरी के सामान को अपने पास रखना एक आपराधिक अपराध बनाने के लिए पर्याप्त नहीं, अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि आरोपी को यह जानकारी थी कि यह चोरी की संपत्ति थी। 

भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 411 के तहत एक आरोपी के खुलासे के बयान को दूसरे आरोपी को चोरी का सामान प्राप्त करने की जानकारी होने के सबूत के तौर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

अपराध के लिए मुख्य घटक ‘मेन्स री’ है, यह स्थापित करने के लिए कि एक व्यक्ति चोरी की संपत्ति से निपट रहा है, व्यक्ति का “विश्वास” कारक तारकीय आयात है।

भारतीय दंड संहिता की धारा 411 के अनुसार, जो भी कोई किसी चुराई हुई संपत्ति को विश्‍वास पूर्वक जानते हुए कि वह चोरी की संपत्ति है, बेईमानी से प्राप्त करता या बरकरार रखता है, तो उसे किसी एक अवधि के लिए कारावास जिसे तीन वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है, या आर्थिक दंड, या दोनों से दंडित किया जाएगा।

📑 06 SEPTEMBER 2022

इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम सुडेरा रियल्टी प्राइवेट लिमिटेड
CA 6199 of 2022
बेंच – जस्टिस केएम जोसेफ और पीएस नरसिम्हा

Transfer of Property Act , 1882 ; Section 111 ( a )

पट्टे की अवधि समाप्त होने के बाद भी जिस किरायेदार के पास संपत्ति है, वह मकान मालिक को मेस्ने मुनाफे ( mesne profits ) का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी होगा

जी एन आर बाबू @ एस एन बाबू बनाम डॉ बी सी मुथप्पा
CA 6228/2022
बेंच – जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस अभय एस ओक

आदेश IX नियम 13 सीपीसी के तहत आवेदन दायर किए बिना भी

प्रतिवादी एक पक्षीय आदेश की वैधता को अपील में चुनौती दे सकता है

📑 02 SEPTEMBER 2022

मध्य प्रदेश राज्य बनाम नंदू @ नंदुआ
CRIMINAL APPEAL NO. 1356 OF 2022
बेंच – जस्टिस एमआर शाह, जस्टिस कृष्णा मुरारी

यदि किसी आरोपी को आईपीसी की धारा 302 के तहत दंडनीय अपराध के लिए दोषी ठहराया जाता है, तो आजीवन कारावास से कम की कोई सजा नहीं हो सकती है 

आईपीसी की धारा 302 के तहत हत्या की सजा मौत या आजीवन कारावास और जुर्माना हैं

धारा 302 के तहत दंडनीय अपराध के लिए आजीवन कारावास से कम कोई भी सजा आईपीसी की धारा 302 के विपरीत होगी

▶ इस मामले में  मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय जबलपुर खंडपीठ ने

भारतीय दंड संहिता की धारा 147 , 148 , 323 और 302/34 के तहत दंडनीय अपराध के लिए दोषी ठहराया और उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई। .आक्षेपित निर्णय और आदेश द्वारा, उच्च न्यायालय ने धारा 147 , 148 , 323 और 302/34 के तहत अपराध के लिए अभियुक्त की दोषसिद्धि को बरकरार रखा । लेकिन आईपीसी के निजी बचाव के अधिकार का लाभ देकर, उच्च न्यायालय ने उसके बाद सजा में हस्तक्षेप किया और उसे पहले से ही उसके द्वारा की गई सजा को कम कर दिया।  – (सात साल और दस महीने) की सजा को कम करने में बहुत गंभीर त्रुटि की है।

जगन सिंह एंड कंपनी बनाम लुधियाना इंप्रूवमेंट ट्रस्ट
CIVIL APEAL NO 371 OF 2022
बेंच – जस्टिस संजय किशन कौल,जस्टिस एस रवींद्र भट और जस्टिस एमएम सुंदरेश

▶ आदेश XXI नियम 90 (3) सीपीसी

बेची गई संपत्ति की कुर्की में कमी या दोष, बिक्री को रद्द करने का आधार नहीं

कोई बिक्री तब तक रद्द नहीं की जा सकती जब तक कि न्यायालय संतुष्ट है कि बिक्री को पूरा करने या संचालित करने में अनियमितता या धोखाधड़ी के कारण आवेदक को पर्याप्त क्षति हुई है

▶ भारत का संविधान, 1950; अनुच्छेद 300ए

संपत्ति का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है, फिर भी यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 300A के तहत एक संवैधानिक अधिकार है। इस प्रकार, किसी व्यक्ति को संपत्ति के अधिकारों से केवल उसी तरीके से वंचित किया जा सकता है जिस तरीके से कानून जानता है।

📑 01 SEPTEMBER 2022

जीवन बीमा निगम बनाम संजीव बिल्डर्स प्राइवेट लिमिटेड
CIVIL APPEAL NO. 5909 OF 2022
बेंच – जस्टिस अनिरुद्ध बोस, जस्टिस जेबी परदीवाला

CPC 1908 ORDER 6 RULE 17

जहां ​​अभिवचनों में संशोधन की अनुमति देने के न्यायालय के अधिकार क्षेत्र का संबंध है, इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती है कि यह उन मामलों में भी संशोधन की अनुमति देने के लिए पर्याप्त है जहां ऐसे संशोधन आवेदन दाखिल करने में पर्याप्त देरी हुई है। 

संशोधन की अनुमति देने का प्रमुख उद्देश्य मुकदमेबाजी को कम करना है, इसलिए, यदि मामले के तथ्य अनुमति देते हैं, तो अदालत हमेशा देरी और देरी के बावजूद आवेदनों को अनुमति देने के लिए खुला है। 

जहां परिसीमा के कारण राहत रोक दी जाती है, एक संशोधन की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए लेकिन ऐसे मामलों में विवेकाधिकार मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है। 

संशोधन को अनुमति देने या न करने की अनुमति देने का अधिकार क्षेत्र विवेकाधीन है, उसी का प्रयोग उन तथ्यों और परिस्थितियों के विवेकपूर्ण मूल्यांकन पर करना होगा जिनमें संशोधन की मांग की गई है। 

यदि किसी संशोधन को प्रदान करने से वास्तव में न्याय के अंतिम उद्देश्य में मदद मिलती है और आगे मुकदमेबाजी से बचा जाता है तो इसकी अनुमति दी जानी चाहिए।

📑 26 AUGUST 2022

मुनुवा @ सतीश बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
CRIMINAL APPEAL NOS. 2224-2225 OF 2010
बेंच – जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस पामिघनतम श्री नरसिम्हा

दो मृत्यु-पूर्व घोषणाओं की स्थिति में, न्यायालय उस एक को स्वीकार कर सकता है जिसे समय से पहले दर्ज किया गया है,

और बाद की घोषणा द्वारा प्रथम मृत्युकालीन घोषणा की पुष्टि केवल विवेक का नियम है।

दोषसिद्धि निर्विवाद रूप से मृत्युकालिक घोषणा पर आधारित हो सकती है। लेकिन, इससे पहले कि इस पर कार्रवाई की जा सके, इसे स्वेच्छा से और सच्चाई से प्रस्तुत किया जाना चाहिए। उस पर पूर्ण निर्भरता रखने के लिए अंतिम घोषणा में संगति प्रासंगिक कारक है।

परवेज परवाज़ बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
CRIMINAL APPEAL NO.1343 OF 2022
बेंच – सीजीआई एनवी रमना, जस्टिस हिमा कोहली, जस्टिस सीटी रविकुमार

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 196 में प्रयुक्त शब्द “कोई न्यायालय संज्ञान नहीं लेगा” (No court shall take cognizance”) और उक्त प्रावधान के तहत बनाए गई ‘परिणामी रोक’ निस्संदेह यह दिखाएगा कि रोक ‘कोर्ट द्वारा संज्ञान लेने के खिलाफ है। ‘

दूसरे शब्दों में, यह अपराध के पंजीकरण या पुलिस एजेंसी द्वारा अन्वेषण या धारा 173 सीआरपीसी के तहत विचार के अनुसार अन्वेषण पूरी होने पर पुलिस द्वारा रिपोर्ट प्रस्तुत करने के खिलाफ कोई रोक नहीं बनाता

📑 25 AUGUST 2022

कट्टा सुजाता रेड्डी बनाम मेसर्स सिद्दामसेट्टी इंफ्रा प्रोजेक्ट्स
CIVIL APPEAL NO. 5822 OF 2022
बेंच – CJI एनवी रमना, जस्टिस कृष्ण मुरारी, जस्टिस हिमा कोहली

Specific Relief Act 1963 [ Sec 10 , Sec 16 ]

▶ विशिष्ट अनुतोष अधिनियम 1963 की धारा 10 में संशोधन के आलोक में , अनुबंध के विशिष्ट प्रदर्शन को प्रदान करने का अधिकार क्षेत्र अब ‘विवेकाधीन नहीं’,

न्यायालयों के लिए ऐसी राहत देना अनिवार्य है, जब तक कि  मामला वैधानिक रूप से तैयार किए गए अपवाद के दायरे में नहीं आता

▶ विशिष्ट अनुतोष अधिनियम की धारा 16 (सी) केवल तभी लागू होगी जब क्रेता अनुबंध के खंड 3 के तहत निर्धारित ‘तीन महीने’ की अवधि के भीतर अनुबंध को पूरा करने के लिए तैयार और इच्छुक था।  उपरोक्त निष्कर्ष इस तथ्य से भी बल मिलता है कि विशिष्ट प्रदर्शन केवल तभी दिया जा सकता है जब धारा 16 (बी) के संदर्भ में अनुबंध की आवश्यक शर्तों का उल्लंघन नहीं किया जाता है ।

यदि क्रेता अनुबंध के अपने हिस्से को निर्धारित समय के भीतर करने के लिए तैयार या इच्छुक नहीं था तो तदनुसार पूरे अनुबंध के लिए विशिष्ट अनुतोष प्रदान नहीं किया जा सकता है।

कट्टा सुजाता रेड्डी बनाम सिद्दामसेट्टी इंफ्रा प्रोजेक्ट्स प्रा लिमिटेड
CA 5822 -5824 OF 2022
बेंच – सीजेआई एनवी रमना जस्टिस कृष्णा मुरारी और जस्टिस हिमा कोहली

विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम 2018 का संशोधन संभावित

यह उन लेनदेन पर लागू नहीं हो सकता है, जो इसके लागू होने [1.10.2018] से पहले हुए थे

2018 का संशोधन एक प्रक्रियात्मक अधिनियम नहीं था, बल्कि इसके काम करने के लिए मूल सिद्धांत थे, इसलिए यह संभावित

📑 24 AUGUST 2022

पुष्पेंद्र कुमार सिन्हा बनाम झारखंड राज्य
CRIMINAL APPEAL NO.1333 OF 2022
बेंच – सीजीआई एन.वी. रमना, जस्टिस जेके. माहेश्वरी, जस्टिस हिमा कोहली

[ आपराधिक षड्यंत्र के अपराध की सामग्री ] IPC 1860.SEC 120 A

▶ यह उन व्यक्तियों के बीच एक समझौता होना चाहिए जिन पर साजिश करने का आरोप लगाया गया है और उक्त समझौता एक अवैध कार्य करने के लिए या अवैध तरीके से एक कार्य करने के लिए होना चाहिए। यह अपने आप में अवैध नहीं हो सकता

दूसरे शब्दों में, आपराधिक षड्यंत्र का सार एक अवैध कार्य करने के लिए एक समझौता है और इस तरह के समझौते को या तो प्रत्यक्ष साक्ष्य या परिस्थितिजन्य साक्ष्य या दोनों द्वारा साबित किया जा सकता है और यह सामान्य अनुभव की बात है आपराधिक षड्यंत्र को साबित करने के लिए प्रत्यक्ष सबूत शायद ही कभी उपलब्ध होते हैं

👉 तदनुसार, घटना से पहले और बाद में साबित हुई परिस्थितियों को अभियुक्त की मिलीभगत के बारे में निर्णय लेने के लिए विचार करना होगा।

👉 यहां तक ​​कि, अगर कुछ कृत्य किए गए साबित होते हैं, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि वे आरोपी व्यक्तियों के बीच किए गए एक समझौते के अनुसरण में प्रतिबद्ध थे, जो कथित षड्यंत्र के पक्ष थे।

👉 ऐसी सिद्ध परिस्थितियों से दोष के संबंध में निष्कर्ष तभी निकाला जा सकता है जब ऐसी परिस्थितियाँ किसी अन्य उचित स्पष्टीकरण में असमर्थ हों।

अर्थात आपराधिक षड्यंत्र के अपराध को केवल संदेह और अनुमान या अनुमान पर स्थापित नहीं माना जा सकता है जो ठोस और स्वीकार्य साक्ष्य द्वारा समर्थित नहीं हैं।

📑 23 AUGUST 2022

My Palace Mutually Aided Cooperative Society vs B. Mahesh
Civil Appeal No. 5784 Of 2022
बेंच – सीजेआई एनवी रमना, जस्टिस कृष्णा मुरारी और हेमा कोहली

सीपीसी की धारा 151 तभी लागू हो सकती है जब कानून के मौजूदा प्रावधानों के अनुसार कोई ‘वैकल्पिक उपाय’ उपलब्ध न हो ।

इस तरह की अंतर्निहित शक्ति वैधानिक निषेधों को ओवरराइड नहीं कर सकती है या ऐसे उपाय नहीं बना सकती है जिन पर संहिता के तहत विचार नहीं किया गया हो

धारा 151 को नए सूट , अपील , रिवीजन या रिव्यू दाखिल करने के विकल्प के रूप में लागू नहीं किया जा सकता है ।

[ Code of Civil Procedure, 1908 Section 96-100 ]

एक व्यक्ति जो किसी निर्णय से प्रभावित है लेकिन वाद का पक्षकार नहीं है, वह न्यायालय की अनुमति से अपील कर सकता है।

लेकिन किसी तीसरे पक्ष द्वारा अपील दायर करने के लिए अनिवार्य शर्त यह है कि वह उस फैसले और डिक्री के कारण प्रभावित हुआ हो जिसे लागू करने की मांग की गई है। 

तारक दास मुखर्जी और अन्य। बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
CRIMINAL  APPEAL  NO.  1400    OF 2022
बेंच – जस्टिस अजय रस्तोगी , जस्टिस अभय सिंह ओका

‘एक ही आरोप पर एक ही आरोपी के खिलाफ एक ही व्यक्ति द्वारा कई FIR दर्ज करना’ कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग के अलावा कुछ नहीं

यदि एक ही व्यक्ति द्वारा एक ही आरोपी के खिलाफ कई प्रथम सूचना रिपोर्ट को तथ्यों और आरोपों के एक ही सेट के संबंध में दर्ज करने की अनुमति दी जाती है, तो इसके परिणामस्वरूप आरोपी एक ही कथित अपराध के लिए कई आपराधिक कार्यवाही में फंस जाएगा। 

एक ही मुखबिर के कहने पर तथ्यों और आरोपों के एक ही सेट पर इस तरह की लगातार प्राथमिकी दर्ज करने का कार्य संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 की जांच के दायरे में नहीं

📑 18 AUGUST 2022

एस. मधुसूदन रेड्डी बनाम वी. नारायण रेड्डी 
CIVIL APPEALS NO. 5503-04 OF 2022
बेंच – सीजीआई एनवी रामना, जस्टिस हिमा कोहली, जस्टिस कृष्ण मुरारी

धारा 114 सीपीसी पुनर्विलोकन की शक्ति का प्रयोग करने के लिए कोई शर्त नहीं रखती है और न ही यह धारा न्यायालय को किसी निर्णय का पुनर्विलोकन करने की अपनी शक्ति का प्रयोग करने से रोकती है।

पहले के आदेश का पुनर्विलोकन तब तक नहीं किया जा सकता जब तक कि अदालत संतुष्ट न हो कि आदेश के चेहरे पर प्रकट होने वाली भौतिक त्रुटि से न्याय का गर्भपात हुआ हो या उसकी सुदृढ़ता को कम कर दे

हालाँकि, आदेश 47 नियम 1 CPC में निर्धारित आधार पर ही न्यायालय द्वारा किसी आदेश का पुनर्विलोकन किया जा सकता है।

लेकिन उक्त शक्ति को एक अंतर्निहित शक्ति ( inherent power ) के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता है और न ही पुनर्विलोकन की शक्ति का प्रयोग करने की आड़ में अपीलीय शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है।

पुनर्विलोकन कार्यवाही अपील के माध्यम से नहीं होती है और इसे आदेश 47 नियम 1 सीपीसी के दायरे और दायरे तक ही सीमित रखा जाना चाहिए।

बेनजीर हीना बनाम यूनियन ऑफ इंडिया
बेंच – जस्टिस संजय किशन कौल और एमएम सुंदरेश

[तलाक-ए-हसन] 

मुसलमानों द्वारा तलाक के लिए तलाक-ए-हसन का उपयोग करने की प्रथा, जिसमें एक मुस्लिम पुरुष अपनी पत्नी को महीने में एक बार तीन महीने के लिए “तलाक” शब्द कहकर तलाक दे सकता है, वह प्रथम दृष्टया अनुचित नहीं। 

कोर्ट ने आगे कहा है कि मामले का इस्तेमाल एजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

अदालत एक मुस्लिम महिला द्वारा “तलाक ए हसन” के जरिए तलाक की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें कहा गया था कि यह महिलाओं के खिलाफ भेदभावपूर्ण है।

यह ट्रिपल तलाक नहीं है। आपके पास ‘खुला’ तलाक के जरिए तलाक का विकल्प भी है। अगर दो लोग एक साथ नहीं रह सकते हैं, तो हम शादी के टूटने पर तलाक दे रहे हैं। अदालत के हस्तक्षेप के बिना भी आप आपसी सहमति से तलाक दे सकते हैं बस मेहर का ध्यान रखना होगा। मुबारक जो सहमति से अनुमेय है।

👉 तलाक-ए-हसन क्या है ?

तलाक-ए-हसन तलाक का एक रूप है जिसके द्वारा एक मुस्लिम व्यक्ति तीन महीने की अवधि में हर महीने एक बार तलाक का उच्चारण करके अपनी पत्नी को तलाक दे सकता है।

📑 16 AUGUST 2022

माखन सिंह बनाम हरियाणा राज्य
CRIMINAL APPEAL NO. 1290 OF 2010
बेंच – जस्टिस बीआर एवं जस्टिस पामिघनतम श्री नरसिम्हा

[ मृत्युकालीन घोषणा ]

“मृत्यु से पहले की घोषणा दोषसिद्धि दर्ज करने का एकमात्र आधार हो सकती है, यदि यह पाया जाता है विश्वसनीय और भरोसेमंद, तो किसी पुष्टि की आवश्यकता नहीं ” लेकिन

👉 न्यायालय को यह जांचना आवश्यक है कि क्या मृत्युकालीन घोषणा सत्य और विश्वसनीय है; क्या यह किसी व्यक्ति द्वारा ऐसे समय में दर्ज किया गया है जब मृतक घोषणा करने के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ था, क्या यह किसी शिक्षण/दबाव/प्रेरणा के तहत किया गया है। 

👉 यदि एक से अधिक मृत्युकालीन घोषणाएं हैं और उनके बीच विसंगतियां हैं, तो मजिस्ट्रेट जैसे उच्च अधिकारी द्वारा दर्ज किए गए मृत्यु-पूर्व घोषणापत्र पर भरोसा किया जा सकता है। लेकिन इस शर्त के साथ है कि कोई भी परिस्थिति इसकी सत्यता के बारे में संदेह को जन्म न दे। 

👉 यदि ऐसी परिस्थितियाँ हैं जिनमें घोषणा स्वेच्छा से नहीं की गई है और किसी अन्य साक्ष्य द्वारा समर्थित नहीं है, तो न्यायालय को एक व्यक्तिगत मामले के तथ्यों की बहुत सावधानी से जांच करने और यह निर्णय लेने की आवश्यकता है कि कौन सी घोषणा भरोसे के लायक है

एचएस दीक्षित बनाम मेट्रोपोली ओवरसीज लिमिटेड
SLP 2177/2022
बेंच – जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस विक्रम नाथ

[ सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 आदेश VII नियम 11 ]

वादपत्र की अस्वीकृति के लिए आवेदन पर विचार करते समय अदालत द्वारा केवल ‘वादपत्र में अभिकथन’ की जांच की जानी है,

किसी अन्य बाहरी कारक पर विचार नहीं किया जा सकता है।

ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स बनाम प्रबोध कुमार तिवारी
Criminal Appeal No 1260 of 2022
बेंच – जस्टिस धनंजय वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एएस बोपन्ना

चेक पर हस्ताक्षर करने पर जो धारणा उत्पन्न होती है, उसका खंडन केवल हस्तलेखन विशेषज्ञ की रिपोर्ट से नहीं किया जा सकता

एक चेक पर हस्ताक्षर करने वाले को तब तक उत्तरदायी माना जाता है जब तक कि ड्रॉअर इस धारणा का खंडन करने के लिए सबूत नहीं देता है कि चेक किसी ऋण के भुगतान या देयता के निर्वहन के लिए जारी किया गया है।

📑 11 AUGUST 2022

जे. वेधासिंह बनाम आर.एम. गोविंदानी
CRIMINAL APPEAL NO. OF 2022 ARISING OUT OF SLP (CRL.) NO.2864 OF 2019
बेंच – जस्टिस अब्दुल नजीर और जे.के. माहेश्वरी

धारा 300(1) सीआरपीसी संविधान के अनुच्छेद 20(2) से अधिक व्यापक [ भारत के संविधान के अनुच्छेद 20 (2) और धारा 300 (1) सीआरपीसी में प्रयुक्त भाषा के बीच अंतर ]

▶ अनुच्छेद 20(2) कहता है – किसी भी व्यक्ति पर एक ही अपराध के लिए एक से अधिक बार मुकदमा नहीं चलाया जाएगा और न ही दंडित किया जाएगा।

▶” दूसरी ओर, धारा 300(1) सीआरपीसी में कहा गया है – एक बार दोषसिद्ध या बरी किए गए व्यक्ति पर उसी अपराध के लिए विचारण नहीं किया जाना।

(1) एक व्यक्ति जिस पर किसी अपराध के लिए सक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय द्वारा एक बार विचारण किया गया हो और ऐसे अपराध के लिए सिद्धदोष या दोषमुक्त किया गया हो, जबकि ऐसी दोषसिद्धि या दोषमुक्ति लागू रहती है , उसी अपराध के लिए फिर से विचारण के लिए उत्तरदायी नहीं होगा , न ही उन्हीं तथ्यों पर किसी अन्य अपराध के लिए जिसके लिए धारा 221  की उपधारा (1) के तहत उसके खिलाफ किए गए आरोप से अलग आरोप लगाया जा सकता है , या जिसके लिए वह उसके उप-धारा (2) के तहत दोषी ठहराया गया हो सकता है।”

◼️ इस प्रकार, यह देखा जा सकता है कि धारा 300(1) सीआरपीसी संविधान के अनुच्छेद 20(2) से अधिक व्यापक है । 

👉 जबकि संविधान के अनुच्छेद 20 (2) में केवल यह कहा गया है कि “किसी भी व्यक्ति पर एक ही अपराध के लिए एक से अधिक बार मुकदमा और दंडित नहीं किया जाएगा”, 

👉 धारा 300 (1) सीआरपीसी में कहा गया है कि किसी पर भी एक ही अपराध के लिए मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है और न ही एक अलग अपराध के लिए लेकिन एक ही तथ्य पर दोषी ठहराया जा सकता है।

राम निवास बनाम हरियाणा राज्य
CRIMINAL APPEAL NO. 25 OF 2012
बेंच – जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस पामिघनतम श्री नरसिम्हा

परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर दोषसिद्धि

संदेह कितना ही मजबूत क्यों न हो, युक्तियुक्त संदेह से परे प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता। किसी आरोपी को संदेह के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता, चाहे वह कितना भी मजबूत क्यों न हो। एक आरोपी को तब तक निर्दोष माना जाता है जब तक कि वह एक उचित संदेह से परे दोषी साबित न हो जाए।

ऐसे मामलों में जहां सबूत एक परिस्थितिजन्य प्रकृति के हैं, जिन परिस्थितियों से अपराध का निष्कर्ष निकाला जाना है, उन्हें पहली बार में पूरी तरह से स्थापित किया जाना चाहिए, और इस तरह स्थापित सभी तथ्य केवल सुसंगत होने चाहिए

🔘 किसी आरोपी के खिलाफ मामला पूरी तरह से स्थापित होने से पहले निम्नलिखित शर्तों को पूरा किया जाना चाहिए

▶ जिन परिस्थितियों से अपराध का निष्कर्ष निकाला जाना है, उन्हें पूरी तरह से स्थापित किया जाना चाहिए।

▶ इस प्रकार स्थापित तथ्य केवल अभियुक्त के दोष की परिकल्पना के अनुरूप होने चाहिए, अर्थात उन्हें किसी अन्य परिकल्पना पर व्याख्या योग्य नहीं होना चाहिए सिवाय इसके कि अभियुक्त दोषी है,

▶ परिस्थितियाँ ऐसी होनी चाहिए एक निर्णायक प्रकृति और प्रवृत्ति,

▶ उन्हें साबित होने वाली एक को छोड़कर हर संभव परिकल्पना को बाहर करना चाहिए

📑 08 AUGUST 2022

वर्षा गर्ग बनाम मध्य प्रदेश राज्य
CRA 1021/ 2022
बेंच – जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एएस बोपन्ना

धारा 311 ट्रायल कोर्ट को न्यायसंगत निर्णय पर पहुंचने के लिए गवाहों को समन करने का अधिकार देता है

धारा 311 सीआरपीसी के तहत एक आवेदन को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता है कि इससे अभियोजन पक्ष के मामले की खामियों को भरने में मदद मिलेगी।

जहां भी अदालत को लगता है कि मामले के न्यायसंगत निर्णय के लिए कोई सबूत आवश्यक है वहां अदालत अभियोजन साक्ष्य को बंद करने के लिए बाध्य नहीं है, वहां शक्ति का प्रयोग किया जाना चाहिए

इस शक्ति का प्रयोग सीआरपीसी के तहत किसी भी जांच, ट्रायल या अन्य कार्यवाही के किसी भी चरण में किया जा सकता है।

धारा 311 के बाद के भाग में कहा गया है कि अदालत ऐसे किसी भी व्यक्ति को “समन” करेगी और जांच करेगी या वापस बुलाएगी और फिर से जांच करेगी अगर मामले के न्यायसंगत निर्णय के लिए न्यायालय को आवश्यक प्रतीत होता है। धारा 311 में व्यापक शब्दों में न्यायालय पर सत्य की खोज में सहायता के लिए क़ानून के इरादे को प्राप्त करने के लिए एक शक्ति है।

📑 05 AUGUST 2022

XYZ बनाम मध्य प्रदेश राज्य
Criminal Appeal No 1184 of 2022
बेंच – जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस जेबी पारदीवाला

एक न्यायिक मजिस्ट्रेट का कर्तव्य है कि वह दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 156 (3) के तहत पुलिस जांच का आदेश दे, जब शिकायत प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध को दर्शाती हो और तथ्य पुलिस जांच की आवश्यकता को इंगित करते हों।

हालांकि सीआरपीसी की धारा 156(3) में “सकते हैं” ( May ) शब्द का इस्तेमाल किया गया है, जो पुलिस जांच का आदेश देने के लिए मजिस्ट्रेट को विवेक देता है, कोर्ट ने कहा कि इस तरह के विवेक का इस्तेमाल विवेकपूर्ण तरीके से किया जाना चाहिए।

कोटक महिंद्रा बैंक लिमिटेड बनाम केव प्रेसिजन पार्ट्स प्राइवेट
CIVIL APPEAL NO. 2176 OF 2020
बेंच – जस्टिस इंदिरा बनर्जी, जस्टिस जे.के. माहेश्वरी

▶ एक आवेदन या अपील दायर करने में देरी की क्षमा के लिए पूर्ववर्ती शर्त, पर्याप्त कारण का अस्तित्व है। विलंब के लिए दिया गया स्पष्टीकरण “पर्याप्त कारण” होगा या नहीं, यह प्रत्येक ‘मामले के तथ्यों पर’ निर्भर करेगा।

परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 5 में किसी आवेदन की बात नहीं है। 

यह धारा अदालत को किसी आवेदन या अपील को स्वीकार करने में सक्षम बनाती है यदि आवेदक या अपीलकर्ता, जैसा भी मामला हो, अदालत को संतुष्ट करता है कि उसके पास निर्धारित समय के भीतर आवेदन नहीं करने और/या अपील करने के लिए पर्याप्त कारण था। 

एक ‘औपचारिक आवेदन’ के अभाव में भी न्यायालय/अधिकरण विलंब को माफ करने के लिए अपने विवेक का प्रयोग कर सकता है।

▶ लिमिटेशन एक्ट की धारा 18 उस पक्ष द्वारा हस्ताक्षरित दायित्व की लिखित रूप में एक अभिस्वीकृति की बात करती है जिसके खिलाफ ऐसी संपत्ति या अधिकार का दावा किया गया है। 

भले ही अभिस्वीकृति युक्त लेखन अदिनांकित है, उस समय का साक्ष्य दिया जा सकता है जब उस पर हस्ताक्षर किए गए थे। 

स्पष्टीकरण स्पष्ट करता है कि एक अभिस्वीकृति पर्याप्त हो सकती है, भले ही यह भुगतान करने, वितरित करने, प्रदर्शन करने या आनंद लेने के लिए अनुमति देने से इनकार करने के साथ हो या सेट करने के दावे के साथ जोड़ा गया हो, या किसी व्यक्ति को संबोधित किया गया हो

📑 04 AUGUST 2022

जय प्रकाश तिवारी बनाम मध्य प्रदेश राज्य
Criminal Apeal 704 OF 2018
बेंच – सीजेआई एनवी रमना, जस्टिस कृष्णा मुरारी और हेमा कोहली

◾Criminal Trial – Related Witness
एक करीबी रिश्तेदार को स्वचालित रूप से “इच्छुक” गवाह के रूप में चित्रित नहीं किया जा सकता है। संबंधित गवाहों के बयानों की भी अधिक सावधानी से जांच करने की आवश्यकता है।

जय प्रकाश तिवारी बनाम मध्य प्रदेश राज्य
Criminal Appeal No. 704 of 2018
कोरम – सीजेआई न्यायमूर्ति एन. वी. रमना और न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी और न्यायमूर्ति हिमा कोहली

धारा 313 सीआरपीसी एक आरोपी को अपनी बेगुनाही साबित करने का एक मूल्यवान अधिकार प्रदान करती है जिसे संवैधानिक अधिकार से परे माना जा सकता है, यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष सुनवाई का संवैधानिक अधिकार है।

संहिता की धारा 313 का उद्देश्य अदालत और आरोपी के बीच सीधा संवाद स्थापित करना है। जो अभियुक्त को मुकदमे के दौरान उसके खिलाफ सामने आई प्रतिकूल परिस्थितियों को समझाने का एक उचित अवसर प्रदान करती है

एक उचित अवसर में सभी प्रतिकूल साक्ष्यों को प्रश्नों के रूप में प्रस्तुत करना शामिल है ताकि अभियुक्त को अपना बचाव व्यक्त करने और अपना स्पष्टीकरण देने का अवसर दिया जा सके।

होन्नैया टीएच बनाम कर्नाटक राज्य
Criminal Appeal No 1147 of 2022
बेंच – जस्टिस चंद्रचूड़ एवं जस्टिस जेबी पारदीवाला

CRPC की धारा 397(2) में ” अंतर्वती आदेश” ( interlocutory order ) शब्द का इस्तेमाल प्रतिबंधित अर्थों में किया गया है, न कि किसी व्यापक या कलात्मक अर्थ में।

यह केवल विशुद्ध रूप से अंतरिम या अस्थायी प्रकृति के आदेशों को दर्शाता है जो पार्टियों के महत्वपूर्ण अधिकारों या देनदारियों को तय या स्पर्श नहीं करते हैं।

कोई भी आदेश जो अभियुक्त के अधिकार को काफी हद तक प्रभावित करता है, या पार्टियों के कुछ अधिकारों को तय करता है, उसे ‘अंतर्वती आदेश’ ( interlocutory order ) नहीं कहा जा सकता है।

ताकि उस आदेश के खिलाफ उच्च न्यायालय में पुनरीक्षण पर रोक लगाई जा सके, क्योंकि यह उसी उद्देश्य के खिलाफ होगा जिसने 1973 की संहिता की धारा 397 में इस विशेष प्रावधान को सम्मिलित करने का आधार बनाया था।

👉 उदाहरण के लिए गवाहों को समन करने, मामलों को स्थगित करने, जमानत के लिए आदेश पारित करने, रिपोर्ट मांगने और लंबित कार्यवाही की सहायता के लिए ऐसे अन्य कदम, निस्संदेह इंटरलोक्यूटरी ऑर्डर के बराबर हो सकते हैं, जिसके खिलाफ धारा 397 (2) के तहत कोई संशोधन नहीं होगा।

👉 लेकिन ऐसे आदेश जो क्षणभंगुर हैं और जो अभियुक्त के अधिकारों या मुकदमे के किसी विशेष पहलू को प्रभावित करते हैं, उन्हें इंटरलोक्यूटरी ऑर्डर नहीं कहा जा सकता है।

📑 02 AUGUST 2022

नूर मोहम्मद बनाम खुर्रम पाशा
SLP (CRL) 2872/ 2022
बेंच – जस्टिस उदय उमेश ललित, जस्टिस एस रवींद्र भट और जस्टिस सुधांशु धूलिया

[ चेक बाउंस के मामले ] नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 की धारा 143A के उल्लिखित प्रावधानों तहत ‘अंतरिम मुआवजा’ जमा करने में आरोपी की विफलता

उसे शिकायतकर्ता के गवाहों से जिरह के अधिकार से अक्षम नहीं कर सकती

यदि अधिनियम की धारा 143ए के अनुसार अंतरिम मुआवजे के आदेश का पालन नहीं किया जाता है, तो उक्त धारा 143ए की उप-धारा 5 के अनुसार राशि की वसूली की जा सकती है जैसे कि CRPC की धारा 421 के तहत जुर्माना लगाया गया हो।,

लेकिन किसी अभियुक्त को गवाह से जिरह करने के उसके अधिकार से वंचित करना न्यायालय की क्षमता के भीतर नहीं होगा

▶ क्या था मामला

इस मामले में (चेक बाउंस शिकायत) ट्रायल कोर्ट द्वारा एक आदेश पारित किया गया था जिसमें आरोपी को 60 दिनों के भीतर अधिनियम की धारा 143 ए के तहत अंतरिम मुआवजे के रूप में चेक राशि का 20% जमा करने का निर्देश दिया गया था। चूंकि आरोपी ने लंबी अवधि के बाद भी उक्त राशि जमा नहीं की, इसलिए अधिनियम की धारा 145(2) के तहत आरोपी की ओर से शिकायतकर्ता से जिरह करने की अनुमति मांगने वाला एक आवेदन खारिज कर दिया गया। इसके बाद उसे धारा 138 एनआई एक्ट के तहत दोषी पाया गया।

दौवरम निर्मलकर बनाम छत्तीसगढ़ राज्य
CRA 1124/2022
बेंच – जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी

[ हत्या का ट्रायल ” निरंतर उकसावे का सिद्धांत” ]

धारा 300 आईपीसी के अपवाद 1 के उद्देश्य के लिए, “पिछले उकसावे के कृत्यों या शब्दों के आलोक में”

अंतिम उकसावे पर विचार किया जाना चाहिए, जो इतना गंभीर हो कि आरोपी आत्म-नियंत्रण खो दे।

▶ यह सिद्धांत तत्काल या अंतिम उकसावे के कृत्य, शब्दों या हावभाव की आवश्यकता को समाप्त नहीं करता है।

▶ इसके अलावा यह बचाव उपलब्ध नहीं होगा यदि किसी विचार या योजना का सबूत है क्योंकि वे सोचे समझे और पूर्व नियोजित तैयारी को प्रतिबिंबित करते हैं।

सिद्धार्थ मुकेश भंडारी बनाम गुजरात सरकार
CRA 1044-1046/2022
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस बीवी नागरत्न

[ दंड प्रक्रिया संहिता, 1973, धारा 482 – भारत का संविधान, 1950, अनुच्छेद 226 ]

आपराधिक कार्यवाही के संबंध में आगे की जांच पर रोक पर

हाईकोर्ट धारा 482 सीआरपीसी के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए जांच पर या कोई अंतरिम राहत पर केवल दुर्लभतम से दुर्लभतम मामलों में ही रोक लगा सकता है

आपराधिक कार्यवाही की जांच करने के लिए जांच अधिकारी का अधिकार होता है, इसलिए आपराधिक कार्यवाही के संबंध में आगे की जांच पर रोक हटा दी जाती है

📑 01 AUGUST 2022

सुनीता पलिता बनाम पंचमी स्टोन क्वारी
SLP (CRL) 10396/ 2019
बेंच – जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस जेके माहेश्वरी

[ नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 ; धारा 141 ]

▶ एक आरोपी कंपनी के सभी निदेशकों को एक बयान के आधार पर आरोपित करना कि वे कंपनी संचालन के प्रभारी और जिम्मेदार हैं, बिना किसी और चीज के, एनआई अधिनियम की धारा 141 की आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता है

शिकायत में उक्त कथन को प्रमाणित करने के लिए विशेष अभिकथन किया जाना चाहिए, कि ऐसा निदेशक प्रभारी था और कंपनी या कंपनी के व्यवसाय का संचालन के लिए जिम्मेदार था

केवल उनके पदनाम के कारण उन निदेशकों को एनआई अधिनियम के तहत आपराधिक कार्यवाही में घसीटना न्याय का मखौल उड़ाना होगा, जो चेक जारी करने या उसके अनादर से जुड़े भी नहीं हो सकते हैं, जैसे कि निदेशक (कार्मिक), निदेशक (मानव संसाधन विकास) ) आदि।

▶ जब अभियुक्त किसी कंपनी का प्रबंध निदेशक या संयुक्त प्रबंध निदेशक होता है, तो शिकायत में यह बताने की आवश्यकता नहीं होती है कि वह कंपनी का प्रभारी है, और कंपनी के व्यवसाय के संचालन के लिए जिम्मेदार है

📑 29 JULY 2022

दक्साबेन बनाम गुजरात राज्य
SLP (CRL) No. 1132-1155/ 2022
बेंच – जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस वी रामासुब्रमण्यम

[ IPC 1860 SEC 306 आत्महत्या के लिए उकसाना ]

आत्महत्या के लिए उकसाने का “एक अप्रत्यक्ष कार्य”( indirect work ) भी आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध होगा

[ CRPC 1973 SEC 482 ]

“हत्या, बलात्कार, सेंधमारी, डकैती और यहां तक ​​कि आत्महत्या करने के लिए उकसाने जैसे अपराध न तो निजी हैं और न ही सिविल प्रकृति के”

उन्हें अपराधी और शिकायतकर्ता या पीड़ित के बीच समझौते के आधार पर धारा 482 सीआरपीसी के तहत रद्द नहीं किया जा सकता

📑 28 JULY 2022

अकेला ललिता बनाम श्री कोंडा हनुमंत राव
CA 6325-6326/2015
बेंच – जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस कृष्ण मुरारी

अदालत को कोई भी राहत ( relief ) या अनुदान ( Grant ) नहीं देना चाहिए जिसके लिए कोई दलील/प्रार्थना नहीं की गयी

यदि कोई अदालत प्रतिवादी को ऐसी राहत का विरोध करने के अवसर से वंचित कर ऐसी राहत पर विचार करता है या अनुदान देता है जिसके लिए कोई प्रार्थना या निवेदन नहीं किया गया था, तो यह न्याय का पतन होगा।

राजस्थान राज्य बनाम किस्तूर राम
CrA 2119 OF 2010
बेंच – जस्टिस बीआर गवई और पीएस नरसिम्हा

◾न्यायेतर स्वीकारोक्ति ( Extra Judicial Confession ) साक्ष्य का एक कमजोर टुकड़ा है और जब तक कुछ पुष्टि नहीं होती, केवल न्यायेतर स्वीकारोक्ति के आधार पर दोषसिद्धि कायम नहीं रह सकती

[ भारत का संविधान, 1950 अनुच्छेद 136 ]

आपराधिक अपील –

◾दोषमुक्ति के विरुद्ध अपील में हस्तक्षेप की गुंजाइश बहुत सीमित होती है। जब तक यह नहीं पाया जाता है कि कोर्ट द्वारा लिया गया विचार असंभव या विकृत है, बरी के निष्कर्ष में हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं है।

◾समान रूप से यदि दो विचार संभव हैं, तो बरी करने के आदेश को रद्द करने की अनुमति नहीं है, केवल इसलिए कि अपीलीय न्यायालय दोषसिद्धि के तरीके को अधिक संभावित मानता है।

◾हस्तक्षेप तभी उचित होगा जब लिया गया दृष्टिकोण बिल्कुल भी संभव न हो

📑 27 JULY 2022

आरडी जैन एंड कंपनी बनाम कैपिटल फर्स्ट लिमिटेड
Civil Apeal 175/ 2022
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस बीवी नागरत्ना

CRPC 1973 धारा 11, 12, 15, 16, 17, 19 और 35

न्यायिक शक्ति के प्रयोग में एडिशनल चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट ( ADD CMM ) को

चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट ( CMM ) के अधीनस्थ नहीं कहा जा सकता

जहां तक सीआरपीसी के तहत प्रयोग की जाने वाली शक्तियों का संबंध है, एडिशनल चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट, चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के बराबर

इसके अलावा चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के पास प्रशासनिक शक्तियां भी हो सकती हैं।

श्रीमती अकेला ललिता बनाम श्री कोंडा हनुमंत राव और अन्य
Civil Appeal No. 6325-6326 of 2015
बेंच: जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और कृष्ण मुरारी

कोई भी मां, बच्चे के बायोलॉजिकल पिता की मौत के बाद उसकी इकलौती लीगल और नैचुरल गार्जियन होती है। उसे अपने बच्चे का सरनेम तय करने का पूरा अधिकार

🔘 सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचार के लिए मुद्दे

▶ क्या मां, जो जैविक पिता की मृत्यु के बाद बच्चे की एकमात्र प्राकृतिक/कानूनी अभिभावक है, बच्चे का उपनाम ( सरनेम ) तय कर सकती है।

“बच्चे की नैसर्गिक अभिभावक उसकी मां होती है. इस स्थिति में बच्चे के पिता के न होने पर उसका सरनेम तय करने का अधिकार सिर्फ उसकी मां को है और 

▶क्या वह उसे अपने दूसरे पति का उपनाम दे सकती है जिससे वह अपने पहले पति की मृत्यु के बाद पुनर्विवाह करती है

जैविक पिता की मृत्यु के बाद बच्चे की एकमात्र प्राकृतिक/कानूनी अभिभावक मां ही है एवं उसका उपनाम तय कर सकती है। वह उसे अपने दूसरे पति का उपनाम भी दे सकती है जिससे वह अपने पहले पति की मृत्यु के बाद पुनर्विवाह करती है

▶क्या वह बच्चे को अपने पति को गोद लेने के लिए दे सकती है ?

उसे बच्चे को गोद लेने के लिए छोड़ने का भी अधिकार

▶क्या उच्च न्यायालय के पास अपीलकर्ता को बच्चे का उपनाम बदलने का निर्देश देने की शक्ति है ?

पीठ ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया है जिसमें एक मां को अपने बच्चे का उपनाम बदलने और अपने नए पति का नाम केवल ‘सौतेले पिता’ के रूप में रिकॉर्ड में दिखाने का निर्देश दिया था।

इस तरह का निर्देश लगभग ”क्रूर और इस बात से बेखबर है कि यह बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य और आत्मसम्मान को कैसे प्रभावित करेगा ?”

📑 26 JULY 2022

गुलाम हसन बेग बनाम मोहम्मद मकबूल माग्रे
SLP (CRL) 4599/2021
बेंच – जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस अभय एस ओक और जस्टिस जेबी पारदीवाला

एक ट्रायल कोर्ट केवल पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर आरोपी को हत्या के आरोपों से मुक्त नहीं कर सकता है,

जिसमें मौत का कारण “कार्डियो रेस्पिरेटरी फेल्योर” बताया गया है।

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट, अपने आप में, ठोस सबूत नहीं बनाती है। अदालत में डॉक्टर का बयान ही वास्तविक सबूत है।

◾पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इस्तेमाल केवल धारा 157 के तहत उसके बयान की पुष्टि के लिए, या धारा 159 के तहत उसकी स्मृति को ताज़ा करने के लिए,

◾या साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 145 के तहत गवाह बॉक्स में उसके बयान का खंडन करने के लिए किया जा सकता है।

इसी मामले में अदालत ने स्पष्ट किया

अदालत की सहायता के लिए एक विशेषज्ञ के रूप में बुलाया गया एक “चिकित्सा गवाह” “तथ्य का गवाह” नहीं है, चिकित्सा अधिकारी द्वारा दिए गए साक्ष्य वास्तव में जांच में पाए गए लक्षणों के आधार पर दिए गए “एक सलाहकार चरित्र” के हैं।

विशेषज्ञ गवाह से यह अपेक्षा की जाती है कि वह डेटा सहित सभी सामग्रियों को अदालत के सामने रखे, जिसने उसे निष्कर्ष पर आने के लिए प्रेरित किया और विज्ञान की शर्तों को समझाते हुए मामले के तकनीकी पहलू पर अदालत को अवगत कराया

ताकि अदालत विशेषज्ञ विशेषज्ञों की राय को ध्यान में रखते हुए उन सामग्रियों पर अपना निर्णय ले सकता है

क्योंकि एक बार विशेषज्ञों की राय स्वीकार कर ली जाती है तो यह चिकित्सा अधिकारी की नहीं बल्कि “अदालत की राय” है

📑 21 JULY 2022

एक्स बनाम प्रधान सचिव, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग
SLP No 12612/2022
बेंच – जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एएस बोपन्ना

महिला को इसलिए मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट 1971 की सुविधा से वंचित नहीं रखा जा सकता क्योंकि वो “अविवाहित” है

संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक महिला को प्रजनन पसंद का अधिकार उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक अविभाज्य हिस्सा है। उसे शारीरिक अखंडता का पवित्र अधिकार है।

सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट (Medical Termination Of Pregnancy Act) में विस्तार करते हुए 24 सप्ताह की गर्भवती अविवाहित महिला को गर्भपात (Abortaion) करने की अनुमति दे दी. महिला लिव इन रिलेशनशिप (Live In Relation) में अपने पार्टनर के साथ रहती थी और दोनों के बीच सहमति से संबंध बनाने के कारण वह गर्भवती हई थी. 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी 2021 में जो बदलाव किया गया है उसके तहत एक्ट में महिला और उसके पार्टनर शब्द का इस्तेमाल किया गया है. वहां पार्टनर शब्द का इस्तेमाल है न कि पति शब्द का. ऐसे में एक्ट के दायरे में अविवाहित महिला भी कवर होती है. 

खासगी (देवी अहिल्याबाई होल्कर चैरिटीज) ट्रस्ट, इंदौर और अन्य बनाम विपिन धानायाईतकर और अन्य।
SLP (Civil) No. 12133 of 2020
बेन्च – जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस अभय एस ओक और जस्टिस सीटी रविकुमार

ट्रस्ट संपत्ति को तब तक ट्रांसफर नहीं किया जा सकता जब तक वह ट्रस्ट या उसके लाभार्थियों के लाभ के लिए न हो

इसके अतिरिक्त ट्रस्ट की संपत्ति बिना सक्षम प्राधिकारी/कोर्ट की अनुमति के स्थानांतरित नहीं की जा सकती

📑 18 JULY 2022

एनसीवी ऐश्वर्या बनाम एएस सरवना कार्तिक शा
CA 4894/2022
बेंच – जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर और जस्टिस जेके माहेश्वरी

[ CPC 1908 SEC 24 ]

वैवाहिक मामलों में जहां भी अदालतों को कार्यवाही के स्थानांतरण की याचिका पर विचार करने के लिए कहा जाता है,

▶ तो अदालतों को इन तत्वों पर विचार करना होगा

दोनों पक्षों की आर्थिक सुदृढ़ता,
जीवनसाथी का सामाजिक स्तर और उनका व्यवहार पैटर्न,
शादी से पहले और उसके बाद उनके जीवन स्तर और
दोनों पक्षों की अपनी आजीविका चलाने की परिस्थितियाँ और जिनके सुरक्षात्मक छत्र के नीचे वे जीवन के लिए अपना भरण-पोषण चाह रहे हैं।

▶ इसी मामले में अदालत ने यह भी कहा

“जब दो या दो से अधिक मुकदमे एक ही पक्ष के बीच अलग-अलग न्यायालयों में लंबित हैं, जो तथ्य और कानून के सामान्य प्रश्न उठाते हैं, और जब मामलों के निर्णय अन्योन्याश्रित होते हैं, तो यह वांछनीय है कि उन पर एक ही जज द्वारा एक साथ विचार किया जाना चाहिए, ताकि एक ही मुद्दों और फैसलों के टकराव के ट्रायल में बहुलता से बचा जा सके।”

XXXX बनाम कंचेरला दुर्गा प्रसाद
Miscellaneous Application No. 875 in SLP (CRL) No. 3211 of 2022
बेंच – जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एमएम सुंदरेश

[ Display of Name Of Victim ]

“भूल जाने का अधिकार” और ‘”इरेज़र का अधिकार”

“निजता का अधिकार ( right to privacy )” सुप्रीम कोर्ट ने यौन उत्पीड़न के केस में पीड़‍िता का ब्योरा वेबसाइट से हटाने का आदेश दिया

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ’भूलने के अधिकार’ को निजता के अधिकार के एक पहलू के रूप में स्वीकार किया है. शीर्ष अदालत ने यौन अपराध के एक मामले में सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के व्यक्तिगत विवरण को छिपाने का आदेश दिया. दरअसल, यौन अपराध की शिकार महिला ने सुप्रीम कोर्ट से विवरण छिपाने की मांग की थी. उसने कहा था कि मुकदमे से जुड़ा विवरण सार्वजनिक होने पर उसे शर्मिंदगी और सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ेगा

🔘 यह भी जानना जरूरी है

▶भूल जाने का अधिकार, हालांकि संविधान में कहीं भी उल्लिखित नहीं है, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निहित जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से आता है। निर्णयों की अधिकता ने इस पहलू पर कानून के विकास को प्रेरित किया है।

▶ निजता का अधिकार: पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ मामले, 2017 (न्यायाधीश जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली 9 जजों की संविधान पीठ ) में निजता के अधिकार को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मौलिक अधिकार घोषित किया गया था।

▶ निजता का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के आंतरिक हिस्से के रूप में और संविधान के भाग III द्वारा गारंटीकृत स्वतंत्रता के एक हिस्से के रूप में संरक्षित है।

📑 14 JULY 2022

अंसार मोहम्मद बनाम राजस्थान राज्य और अन्य
CRIMINAL APPEAL NO.962 OF 2022 (@ SLP(CRL.) No.5326 OF 2022)
बेंच – जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस विक्रम नाथ

[ भारतीय दंड संहिता 1860 – धारा 376 (2) (एन) ]

अगर कोई लड़की किसी व्यक्ति के साथ अपनी इच्छा से रह रही है और इस दौरान दोनों के बीच शारीरिक संबंध बनते हैं.

लेकिन जब संबंध टूट जाता है तो फिर युवक के खिलाफ रेप का मामला दर्ज नहीं किया जा सकता है

अर्थात रिश्ते की विफलता आईपीसी की धारा 376 ( 2 ) ( एन ) के तहत अपराध के लिए प्राथमिकी दर्ज करने का आधार नहीं हो सकती

धनंजय राय @ गुड्डू राय बनाम बिहार राज्य
केस नंबर – CRA 803/2017| 14
बेंच – जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस एमएम सुंदरेश

दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 374 की उप-धारा (2) के तहत एक आरोपी द्वारा दायर दोषसिद्धि के खिलाफ पहले से स्वीकृत अपील को न्यायालय द्वारा इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता है कि “आरोपी फरार है”

“आरोपी का फरार होना” दोषसिद्धि के खिलाफ अपील को खारिज करने का कोई आधार नहीं

▶ मामले का सारांश

इस मामले में पटना उच्च न्यायालय ने दोषसिद्धि के खिलाफ दायर एक अपील को इस आधार पर खारिज कर दिया कि अपीलकर्ता आरोपी फरार है |

सुप्रीम कोर्ट ने अपील की अनुमति देते हुए कहा अपीलकर्ता के फरार होने और न्याय प्रशासन को धता बताने की निर्मम कार्रवाई को लेकर खंडपीठ द्वारा व्यक्त की गई पीड़ा को अच्छी तरह समझा जा सकता है। लेकिन यह दोषसिद्धि के खिलाफ अपील खारिज करने का कोई आधार नहीं, जिसे पहले ही गैर-अभियोजन के लिए बिना गुण-दोष के अंतिम सुनवाई के वास्ते स्वीकार कर लिया गया था।

इसलिए, आक्षेपित निर्णय को निरस्त कर दिया गया और अपील को गुणदोष के आधार पर विचार के लिए हाईकोर्ट के पास वापस भेजा गया।

शाहजा @ शाहजन इस्माइल मो. शेख बनाम महाराष्ट्र राज्य
केस नंबर – CrA 739 OF 2017
बेंच – जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जेबी पारदीवाला

Indian Evidence Act 1872 SEC 27

केवल इसलिए कि हथियार की खोज आरोपी के कहने पर हुई थी,

इसका मतलब यह नहीं लगाया जा सकता कि उसने इसे छुपाया या इस्तेमाल किया था

केवल खोज की व्याख्या उस व्यक्ति द्वारा छुपाने वाले के रूप में पर्याप्त नहीं जिसने हथियार की खोज की थी। वह किसी अन्य स्रोत से भी उस स्थान पर उस हथियार के अस्तित्व का ज्ञान प्राप्त कर सकता है।
उसने किसी को हथियार छुपाते हुए भी देखा होगा

◾धारा 27 के लागू होने के लिए आवश्यक शर्तें मोटे तौर पर –

(1) अभियुक्त से प्राप्त जानकारी के परिणाम में तथ्य की खोज;

(2) इस तरह के तथ्य की खोज का साक्ष्य दिया जाना है;

(3) जब आरोपी ने सूचना दी तो उसे पुलिस हिरासत में होना चाहिए और

(4) उसके द्वारा खोजे गए तथ्य से स्पष्ट रूप से संबंधित इतनी जानकारी स्वीकार्य है

हिमांशु कुमार और अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य और अन्य
Writ Petition (Criminal) No. 103/ 2009
बेंच – जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस जेबी पारदीवाला

भारतीय दंड संहिता की धारा 211 में ‘ मिथ्या आरोप’ की अभिव्यक्ति प्रारंभिक आरोप को संदर्भित करती है जो आपराधिक जांच
को गति प्रदान करती है, न कि आपराधिक ट्रायल के दौरान जोड़े गए झूठे सबूत या झूठे बयानों को।

आपराधिक कानून को गति देने के इरादे और उद्देश्य से दिया गया बयान प्रावधान के तहत ‘आरोप’ का गठन करेगा

धारा 211 का विवरण

▶ भारतीय दंड संहिता की धारा 211 के अनुसार, जो भी कोई किसी व्यक्ति को यह जानते हुए कि उस व्यक्ति के विरुद्ध ऐसी कार्यवाही या आरोप के लिए कोई न्यायसंगत या विधिपूर्ण आधार नहीं है क्षति कारित करने के आशय से उस व्यक्ति के विरुद्ध कोई अपराधिक कार्यवाही संस्थित करेगा या करवाएगा या उस व्यक्ति पर झूठा आरोप लगाएगा कि उसने अपराध किया है,

▶ तो उसे किसी एक अवधि के लिए कारावास की सजा जिसे दो वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है या आर्थिक दण्ड या दोनों से दण्डित किया जाएगा;

▶ तथा यदि ऐसी अपराधिक कार्यवाही मॄत्यु दण्ड, आजीवन कारावास या सात वर्ष या उससे अधिक के कारावास से दण्डनीय अपराध के झूठे आरोप पर संस्थित की जाए, तो उसे किसी एक अवधि के लिए कारावास की सजा जिसे सात वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है से दण्डनीय होगा और साथ ही आर्थिक दण्ड के लिए भी उत्तरदायी होगा।

📑 12 JULY 2022

एशियन होटल्स (नॉर्थ) लिमिटेड बनाम आलोक कुमार लोढ़ा
मामला संख्या – CIVIL APPEAL NOS. 3703-3750 OF 2022
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस बीवी नागरत्ना

( CPC 1908 आदेश I नियम 10 )

यह सिद्धांत कि वादी “डोमिनिस लिटिस” यानी “वाद
का मास्टर” है, केवल उस मामले में लागू होगा जहां प्रतिवादी के रूप में जोड़े जाने वाले पक्ष आवश्यक
या उचित पक्ष हैं।

वादी को प्रतिवादी के रूप में किसी भी पक्ष में शामिल होने की अनुमति नहीं दी जा सकती है, जो आवश्यक नहीं हो सकता है

( CPC 1908 आदेश VI नियम 17 )

वादपत्र में संशोधन करने की अनुमति देने से “वाद की प्रकृति” (nature of the suit) बदलने की संभावना है तो उस मामले में न्यायालय, वादी को संशोधन की अनुमति नहीं दे सकता

संयुक्त राष्ट्र कृष्णमूर्ति बनाम एएम कृष्णमूर्ति 
CA 4703 OF 2022
बेंच – जस्टिस इंदिरा बनर्जी और हृषिकेश रॉय

Specific Relief Act 1963

यदि उल्लंघन के तुरंत बाद मुकदमा दायर नहीं किया गया तो विशिष्ट प्रदर्शन की राहत से इनकार किया जा सकता है

तथ्य यह कि परिसीमा तीन साल है इसका मतलब यह नहीं है कि क्रेता मुकदमा दायर करने और विशिष्ट प्रदर्शन प्राप्त करने के लिए एक या दो साल तक इंतजार कर सकता है

इंद्रेश कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
केस नंबर – CRIMINAL APPEAL NO. 938 OF 2022
बेंच – न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी और न्यायमूर्ति वी रामसुब्रमण्यम

दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 161 के तहत “पुलिस को दिए गए बयान” साक्ष्य में स्वीकार्य नहीं हो सकते हैं,

लेकिन गंभीर अपराध के मामले में जमानत देने के आवेदन में यह निर्धारित करने के लिए प्रासंगिक हैं कि जमानत के दौरान आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं

इस मामले में बलात्कार और हत्या के आरोपी व्यक्ति को जमानत देते समय, उच्च न्यायालय ने सीआरपीसी की धारा 164/161 के तहत गवाहों के बयानों सहित रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्रियों की अनदेखी की थी।

📑 11 JULY 2022

सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम केंद्रीय जांच ब्यूरो
केस नंबर – MA 1849 OF 2021
बेंच – जस्टिस संजय किशन कौल और एमएम सुंदरेश

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 436A किसी “विशेष प्रावधान के अभाव में” विशेष अधिनियमों ( special acts ) पर भी लागू

इस प्रावधान के अनिवार्य अनुपालन की आवश्यकता है और इस प्रकृति के मामले में जमानत आवेदन की भी आवश्यकता नहीं है

उदाहरण के लिए , एनडीपीएस अधिनियम की धारा 37 के तहत प्रदान की गई कठोरता ऐसे मामले में आड़े नहीं आएगी जब हम किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता से निपट रहे हैं

🔘 [ अधिकतम अवधि जिसके लिए विचाराधीन कैदी निरुद्ध किया जा सकता है धारा 436A के अनुसार ]

◾ जहां किसी व्यक्ति ने इस संहिता के तहत किसी भी कानून के तहत अन्वेषण, जांच या विचारण की अवधि के दौरान (ऐसा अपराध नहीं जिसके लिए मृत्यु दण्ड को उस विधि के तहत दंड में से एक के रूप में निर्दिष्ट किया गया है) हिरासत में लिया गया है,

◾उस विधि के तहत उस अपराध के लिए निर्दिष्ट कारावास की अधिकतम अवधि के आधे तक ज्यादा अवधि, उसे न्यायालय द्वारा अपने व्यक्तिगत बॉन्ड पर जमानत के साथ या बिना रिहा किया जाएगा।

In Re : Perry Kansagra – Alleged Contemnor
Suo – Motu Contempt Petition ( Civil ) No. 3 of 2021.
बेंच – जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस पीएस नरसिम्हा

[ न्यायालय के समक्ष झूठा बयान ]

जो व्यक्ति न्यायालय के समक्ष झूठा बयान देता है और न्यायालय को धोखा देने का प्रयास करता है

वह “न्यायालय की अवमानना ​​का दोषी”

ऐसी परिस्थितियों में, न्यायालय के पास न केवल अंतर्निहित शक्ति है, बल्कि यह अपने कर्तव्य में विफल होगा यदि कथित अवमाननाकारी ​​को न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग करने के लिए अवमानना ​​क्षेत्राधिकार के तहत डील नहीं किया जाता है

मोहम्मद अली बनाम वी जया
Civil Appeal No. 4113 of 2022 with Civil Appeal No. 4114 of 2022
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस बीवी नागरत्ना

जब प्रतिवादी के लिए “अपील” के माध्यम से वैधानिक वैकल्पिक उपाय उपलब्ध हो

तो उच्च न्यायालय भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत रिट याचिका या पुनरीक्षण आवेदन पर विचार नहीं कर सकता है।

ग्रेगरी पतराओ बनाम मैंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड
CA 4105-4107/2022
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस बीवी नागरत्ना

भारत का संविधान

उच्च न्यायालयों द्वारा इस शीर्ष न्यायलय के बाध्यकारी दृष्टांतों का पालन नहीं करना ‘संविधान के अनुच्छेद 141’ के विपरीत

पूर्व निर्णीत फैसले पर विचारोपरांत उसके पृथक फैसले हाईकोर्ट High Court पर बाध्यकारी होते हैं।

◾एक बाद का निर्णय, जिसमें पहले के फैसलों पर विचार किया गया और इस न्यायालय द्वारा इतर फैसला दिया गया, इस कोर्ट का बाद का निर्णय हाईकोर्ट पर बाध्यकारी था

◾हाईकोर्ट द्वारा इस कोर्ट के बाध्यकारी उदाहरणों का पालन नहीं करना भारत के संविधान का अनुच्छेद 141 के विपरीत है।

आर एम सुंदरम @ मीनाक्षीसुंदरम बनाम श्री कायरोहानासामी और नीलायादाक्षी अम्मन मंदिर
CA 3964-3965 of 2009
बेंच – जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस संजीव खन्ना

▶ [ सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908, धारा 11 – रेस ज्यूडिकाटा ]

“रेस ज्यूडिकाटा के लिए एक प्रार्थना को सफल और स्थापित करने के लिए, प्रार्थना करने वाले पक्ष को

अपीलीय निर्णय सहित पारित किए गए अभिवचनों और निर्णयों की एक प्रति को रिकॉर्ड में रखना चाहिए, जो अंतिम रूप प्राप्त कर चुका है”

▶ [ आदेश 2 नियम 2 सीपीसी ]

तकनीकी कारणों से पूर्व वाद खारिज होने पर रेस ज्युइडिकेटा का सिद्धांत नहीं लागू होता

आशा रानी गुप्ता बनाम विनीत कुमार
CA No. 4682 of 2022
बेंच – जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस अनिरुद्ध बोस

कोई प्रतिवादी सिर्फ मकान मालिक-किरायेदार/पट्टादाता- पट्टेदार के रिश्ते को नकारकर किराए/नुकसान की राशि जमा किए बिना

वाद के लंबित रहने के दौरान संपत्ति का आनंद नहीं ले सकता

वादी और प्रतिवादी के बीच मकान मालिक और किरायेदार के रिश्ते को अस्वीकार करने के प्रस्ताव के संदर्भ में, इस तरह का एक इनकार

सरलीकृत किरायेदार को उपयोग और व्यवसाय के लिए देय किराया / नुकसान जमा करने के दायित्व से मुक्त नहीं कर सकता है, जब तक कि वह दिखा सकता है इस तरह के भुगतान को वैध और वास्तविक तरीके से किया है।”

📑 06 JULY 2022

मेसर्स मार्टिन एंड हैरिस प्राइवेट लिमिटेड बनाम राजेंद्र मेहता
केस नंबर – CIVIL APPEAL NOS. 4646­47 OF 2022
बेंच – न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी और न्यायमूर्ति जेके माहेश्वरी

अगर किरायेदार के बेदखली आदेश पर रोक लगाई जाती है तो मकान मालिक, किरायेदार से मध्यवर्ती लाभ (Mesne Profits) का हकदार

बेदखली का फरमान पारित करने के बाद किरायेदारी समाप्त हो जाती है और उक्त तिथि से मकान मालिक को परिसर के उपयोग से वंचित होने के मुआवजे या मध्यवर्ती लाभ का हकदार होता है।”

एक बार बेदखली के लिए एक डिक्री पर रोक लगाने के बाद, अपीलीय अदालत के लिए यह आवश्यक है कि परिसर का कब्जा जारी रखने के लिए किरायेदार द्वारा मकान मालिक को भुगतान किए जाने वाले मध्यवर्ती मुनाफे को तय किया जाए।

श्रीराम हाउसिंग फाइनेंस एंड इंवेस्टमेंट इंडिया लिमिटेड बनाम ओमेश मिश्रा मेमोरियल चैरिटेबल ट्रस्ट
CIVIL APPEAL NO. 4649 OF 2022 [ARISING OUT OF SLP (C) NO.12833 OF 2014]
बेंच – जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस जेके माहेश्वरी

कब्जे के लिए डिक्री का निष्पादन में केवल ‘ डिक्री धारक ‘ ही आवेदन करने का हकदार है , जहां उसे ‘ किसी व्यक्ति ‘ द्वारा प्रतिरोध या बाधा की पेशकश की जाती है

डिक्री धारक से वाद की संपत्ति का खरीदार डिक्री धारक द्वारा डिक्री के निष्पादन पर आपत्ति जताते हुए सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश XXI नियम 97 के तहत एक आवेदन दायर करने का हकदार नहीं

▶ आदेश XXI नियम 97 डिक्री धारक के खिलाफ संपत्ति का कब्जा प्राप्त करने वाले ‘किसी भी व्यक्ति’ द्वारा अचल संपत्ति के कब्जे में प्रतिरोध या बाधा से संबंधित है। यह ‘डिक्री धारक’ को इस तरह के प्रतिरोध या बाधा के बारे में शिकायत करने के लिए आवेदन करने का अधिकार देता है।

करण कपूर बनाम माधुरी कुमार
CA 4545 of 2022
बेंच : जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस जेके माहेश्वरी

[ सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908; आदेश XII नियम 6 ] स्वीकृतियों के आधार पर निर्णय

न्यायालयों की स्वीकृतियों (Admissions) के आधार पर निर्णय पारित करने की शक्ति विवेकाधीन है इसका अधिकार के रूप में दावा नहीं किया जा सकता

उक्त शक्ति का प्रयोग केवल तभी किया जाना चाहिए जब “तथ्यों और दस्तावेजों की” विशिष्ट, स्पष्ट स्वीकृति रिकॉर्ड में हो, अन्यथा न्यायालय इसे लागू करने से इंकार कर सकता है

▶CPC के आदेश 12 नियम 6 के अनुसार यदि किसी भी प्रकार से तथ्य की स्वीकृतियाँ की जा चुकी है तो न्यायालय स्वप्रेरणा से या पक्षकार के आवेदन पर ऐसी स्वीकृतियों को ध्यान में रखते हुए उचित निर्णय या आदेश कर सकता है ।

नीलन इंटरनेशनल कंपनी लिमिटेड बनाम पॉवरिका लिमिटेड और अन्य
TRANSFER PETITION (CIVIL) NO.32/2020
बेंच – न्यायमूर्ति जेके माहेश्वरी

क्या धारा 25 CPC के तहत प्रादेशिक क्षेत्राधिकार की याचिका या उसी की कमी पर विचार किया जा सकता है ?

अधिकारिता या इसके अभाव की याचिका उस अदालत के समक्ष प्रस्तुत की जा सकती है जिसमें कार्यवाही लंबित है

धारा 25 सीपीसी के तहत सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष नहीं है

CPC 1908 की धारा 25 के तहत मुकदमों को स्थानांतरित करने की उसकी शक्ति सीमित है इसे क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र के प्रश्न को निर्धारित करने के लिए विस्तारित नहीं किया जा सकता है

◾CPC की धारा 25 वादों को अंतरित करने की उच्चतम न्यायालय के शक्ति से सम्बन्धित है

◾धारा 25 ( 1 ) के अन्तर्गत उच्चतम न्यायालय को यह शक्ति प्राप्त है कि वह किसी भी वाद , अपील या अन्य कार्यवाही को एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय को या एक राज्य के एक दीवानी न्यायालय से दूसरे राज्य के किसी दीवानी न्यायालय में अंतरित कर सकता है

📑 05 JULY 2022

सिंह गिल बनाम छत्तीसगढ़ राज्य
CRIMINAL APPEAL NO. 915 OF 2022 (ARISING OUT OF SLP (CRL.) NO.800 OF 2021)
बेंच – जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जेके माहेश्वरी

दंड प्रक्रिया संहिता, 1973; धारा 31

“ट्रायल कोर्ट” के साथ-साथ “अपीलीय न्यायालय” को दो या दो से अधिक अपराधों के लिए सजा के मामले में

सजा एक साथ चलने का आदेश देने का पूरा विवेक

📚 [ CRPC SEC 31]

एक ही विचारण में कई अपराधों के लिए दोषसिद्ध होने के मामलों में दंडादेश–

▶जब एक विचारण में कोई व्यक्ति दो या अधिक अपराधों के लिए दोषसिद्ध किया जाता है तब, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 71 के उपबंधों के अधीन रहते हुए,

▶ न्यायालय उसे उन अपराधों के लिए विहित विभिन्न दंडों में से उन दंडों के लिए, जिन्हें देने के लिए ऐसा न्यायालय सक्षम है. दंडादेश दे सकता है

▶ जब ऐसे दंड कारावास के रूप में हो तब, यदि न्यायालय ने यह निदेश न दिया हो कि ऐसे दंड साथ-साथ भोगे जाएंगे, तो वे ऐसे क्रम से एक के बाद एक प्रारंभ होंगे जिसका न्यायालय निदेश दे।

📑 27 JUNE 2022

मनोज परिहार बनाम जम्मू और कश्मीर राज्य
SPECIAL LEAVE PETITION (C) NO. 11039 OF 2022
बेंच : जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जेबी पारदीवाला

जब तक अन्यथा स्पष्ट रूप से नहीं कहा जाता है, तब तक अदालत द्वारा की गई “कानून की घोषणा” का सदैव “पूर्वव्यापी प्रभाव” (Retrospective effect) होगा

▶ यह भी जानना जरूरी है

पूर्वव्यापी प्रभाव (Retrospective effect) इसका अर्थ है पीछे की ओर देखना

यह शब्द आमतौर पर विधायिका के उन कृत्यों पर लागू होता है, जो उन अधिनियमों को पारित करने से पहले किसी विषय, अनुबंध या अपराध पर संचालित करने के लिए बनाए जाते हैं, इसलिए उन्हें पूर्वव्यापी कानून कहा जाता है।

इसका अर्थ है कि वर्तमान कानून या अधिनियम पिछली घटनाओं या अपराधों पर लागू किया जा सकता है।

📑 24 JUNE 2022

जकिया अहसान जाफरी और अन्य बनाम गुजरात राज्य
Diary No. (34207/2018)
बेंच – न्यायमूर्ति एएम खानविलकर, न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी और न्यायमूर्ति सीटी रविकुमार

भारतीय दंड संहिता 1860, धारा 120 बी – आपराधिक षड्यंत्र

किसी बड़े आपराधिक षड्यंत्र के मामले को स्थापित करने के लिए, अपराध के कमीशन के लिए “संबंधित व्यक्तियों के दिमाग की बैठक का संकेत लिंक” स्थापित करना आवश्यक

🔘 सुप्रीम कोर्ट के कुछ पुराने मामले

▶ स्टेट ऑफ महाराष्ट्र बनाम सोमनाथ थापा एआईआर 2013 एससी 651 के प्रकरण में कहा गया है कि आपराधिक षड्यंत्र के अपराध के गठन के लिए निम्नांकित बातें आवश्यक हैं- किसी अवैध कार्य में लिप्त रहने का ज्ञान होना और किसी वैध कार्य को अवैध साधनों द्वारा किए जाने का ज्ञान होना।

▶ के हासिम बनाम स्टेट ऑफ तमिलनाडु के मामले में भी उच्चतम न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया है कि आपराधिक षडयंत्र के लिए किसी अवैध कार्य को करने का करार मात्र आवश्यक है कोई प्रकट कार्य कर लिया जाना आवश्यक नहीं है।

▶ हीरालाल भगवती बनाम सीबीआई एआईआर 2003 एससी 2545 के प्रकरण में उच्चतम न्यायालय द्वारा यह कहा गया है कि आपराधिक षड्यंत्र को प्रत्यक्ष साक्ष्य द्वारा साबित किया जाना कठिन है क्योंकि इस प्रकार के षड्यंत्रकारी आपस में हुए करार के लिए कोई लिखित समझौता नहीं करते हैं तथा इनके समझौते को साबित किया जाना कठिन होता है, इसके लिए यह साबित किया जाना आवश्यक है कि अभियुक्त किसी अवैध कार्य को करने के लिए सहमत हुए थे। इस प्रकार की सहमति को परिस्थितिजन्य साक्ष्य के द्वारा साबित किया जा सकता है।

के एम मंजूनाथ बनाम इरप्पा जी (डी)
बेंच – जस्टिस सीटी रविकुमार और जस्टिस सुधांशु धूलिया

[ संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1882; धारा 111 ]

पट्टे की अवधि समाप्त होने के बाद मकान मालिक द्वारा किराए की स्वीकृति मात्र

पट्टे की समाप्ति की छूट नहीं होगी

◾TP ACT 1882 की धारा 111 किसी भी पट्टे के समाप्त होने के आधारों का वर्णन करती है। किसी भी पट्टे का पर्यवसान इन आधारों पर होता है।

स्थावर सम्पत्ति के पट्टे का पर्यवसान निम्नलिखित में से किसी भी एक के द्वारा हो सकेगा-

(1) समय बीतने से। {धारा 111 (क)}

(2) विनिर्दिष्ट घटना के घटने से। {धारा 111 (ख)}

(3) पट्टाकर्ता के हित की समाप्ति से। {धारा 111 (ग)}

(4) विलयन से। {धारा 111 (घ)}

(5) अभिव्यक्त समर्पण से। {धारा 111 (ङ)}

(6) विवक्षित समर्पण से। {धारा 111 (च)}

(7) जब्ती से। {धारा 111 (छ)}

(8) छोड़ने की सूचना से। {धारा 111 (ज)}

मनोज प्रताप सिह बनाम राजस्थान राज्य
Criminal Appeal No ( s ) . 910-911 of 2022 ( Arising Out Of Slp ( Crl . ) No ( s ) . 7899-7900 of 2015 )
बेंच – जस्टिस ए.एम. खानविलकर, जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस सी.टी. रविकुमार

( मौत की सजा – अवशिष्ट संदेह का सिद्धांत )

अपराध पर अंतिम निष्कर्ष के बाद और सजा सुनाए जाने के बाद, सजा के उद्देश्य के लिए अवशिष्ट संदेह की कोई अवधारणा उपलब्ध नहीं है

🔘 अवशिष्ट संदेह सिद्धांत ( Residual doubt theory ) का अर्थ और दायरा

▶ शब्द “अवशिष्ट संदेह” किसी भी शेष या स्थायी अनिश्चितता को संदर्भित करता है जो अदालत को “उचित संदेह से परे” और ” पूर्ण निश्चितता ” के बावजूद प्रतिवादी के अपराध के बारे में है, अवशिष्ट संदेह को न्यायाधीश द्वारा गैर-सांविधिक शमन कारक के रूप में माना जा सकता है।

▶ भारत में मृत्युदंड में ‘अवशिष्ट संदेह’ को एक शमन तत्व के रूप में स्वीकार किया गया है। अशोक देबबर्मा बनाम त्रिपुरा राज्य (2014) में , सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निर्णय लेने वाले ‘उचित संदेह’ और ‘पूर्ण आत्मविश्वास’ के बीच घूम सकते हैं, जिसके परिणामस्वरूप संदेह बना रहता है। 

इस मामले में मौत की सजा को कम से कम बीस साल की सजा के साथ आजीवन कारावास में बदल दिया गया था, जिसमें कहा गया था कि अभियोजन पक्ष के सबूत एक उचित संदेह से परे अपराध साबित हुए, फिर भी संदेह था कि क्या अपराध पूरी तरह से आरोपी द्वारा किया गया 

▶ सुदाम उर्फ ​​राहुल कुमार कनीराम जाधव बनाम महाराष्ट्र राज्य (2019) , जहां सबूत के परिस्थितिजन्य चरित्र के आधार पर मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया गया था, सिद्धांत का पहला उपयोग था

📑 22 JUNE 2022

शेख नाज़नीन बनाम तेलंगाना राज्य और अन्य
CRIMINAL APPEAL NO. 908 OF 2022 (@ SLP (CRL. ) NO. 4260 OF 2022
बेंच – जस्टिस सी टी रविकुमार और जस्टिस सुधांशु धूलिया

भारत का संविधान – ARTICLE 22 निवारक हिरासत

निवारक हिरासत कानून “किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता और स्वाधीनता पर कड़ा प्रहार करता है, इसे नियमित तरीके से प्रयोग नहीं किया जा सकता”

“इस कानून के तहत प्रयोग की जाने वाली शक्तियां असाधारण शक्तियां हैं जिन्हें सरकार को एक असाधारण स्थिति में अभ्यास के लिए दिया गया है। “

📑 16 JUNE 2022

सुश्री पी XXX बनाम उत्तराखंड राज्य और अन्य
Criminal Appeal No. 903 of 2022
बेंच – जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस विक्रम नाथ

[ दंड प्रक्रिया संहिता, 1973- धारा 220 (1) – एक से अधिक अपराधों के लिए ट्रायल ]

CRPC की धारा 220 के तहत दो या दो से अधिक कृत्यों का एक साथ ट्रायल चलाने के उद्देश्य से एक ही लेनदेन का गठन होगा,

यह विशुद्ध रूप से तथ्य का सवाल

🔘 इसका उचित निर्धारण –

▶ समय की निकटता ( proximity of time )
▶ एकता या स्थान की निकटता ( unity or proximity of place )
▶ कार्रवाई की निरंतरता ( continuity of action )
▶ और उद्देश्य का समुदाय या डिजाइन जैसे तत्वों पर निर्भर करेगा ( community of purpose or design )

यह सभी यह निर्धारित करने के कारक हैं कि क्या कुछ कार्य एक ही लेनदेन के हिस्से हैं या नहीं

सुश्री पी बनाम उत्तराखंड राज्य और एएनआर
CRIMINAL APPEAL NO. 903 OF 2022
बेंच – न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी और न्यायमूर्ति विक्रम नाथ

क्या भारतीय दंड संहिता की धारा 376 और धारा 504 और 506 के तहत अपराध सीआरपीसी की धारा 200 के तहत परीक्षण के उद्देश्य के लिए ‘एक ही परिणति के रूप में जुड़े कृत्यों की एक श्रृंखला’ के दायरे में आते है ?

IPC की धारा 376 और धारा 504 और 506 के तहत अपराध CRPC की धारा 200 के तहत परीक्षण के उद्देश्य के लिए ‘एक ही परिणति के रूप में जुड़े कृत्यों की एक श्रृंखला’ के दायरे में नहीं आएगा।

“जिस भी कोण से हम मामले की जांच करते हैं, दिए गए तथ्यों के क्रम में, कथित कृत्यों को एक साथ जोड़ना मुश्किल है।

इसे एक साधारण मुहावरे में रखने के लिए, दो कथित कृत्यों में से एक यौन शोषण, जिससे बलात्कार का अपराध (भारतीय दंड संहिता की धारा 376) और दूसरा गाली-गलौज और धमकियां, जिससे अपमान और धमकाने का अपराध होता है (धारा 504/506 आईपीसी), चाक और पनीर की तरह होते हैं; वो एक साथ तो है किन्तु उन्हें एक साथ नहीं जोड़ा जा सकता है।”

📑 14 JUNE 2022

सीटी महादेव बनाम महानिदेशक, सीमा सुरक्षा बल
CA 2606 OF 2012
बेंच – जस्टिस बीआर गवई और हेमा कोहली

[ IPC 1860 Section 96-106 – Right Of Private defence ]

अभियुक्तों को उचित संदेह से परे आत्मरक्षा के अधिकार के अस्तित्व को साबित करने की आवश्यकता नहीं

निजी प्रतिरक्षा ( Private Defense ) के अस्तित्व को साबित करने के लिए सबूत के बोझ की डिग्री “संभावनाओं की प्रधानता”

यदि कोई आरोपी निजी प्रतिरक्षा ( Private Defense ) की दलील लेता है तो सबूत के बोझ की डिग्री उचित संदेह से परे नहीं होगी

🔴 Right To Self Defense

▶ संक्षेप में आत्मरक्षा का अधिकार अनिवार्य रूप से एक रक्षात्मक अधिकार है जो तभी उपलब्ध होता है जब परिस्थितियां इसे उचित ठहराती हैं।

▶ परिस्थितियां वे हैं जिन्हें आईपीसी में विस्तृत किया गया है। ऐसा अधिकार अभियुक्त को तब उपलब्ध होगा जब उसे या उसकी संपत्ति को खतरे का सामना करना पड़ रहा है और उसकी सहायता के लिए राज्य मशीनरी के आने की बहुत कम गुंजाइश है।

📑 13 JUNE 2022

कट्टुकंडी एडाथिल कृष्णन बनाम कट्टुकंडी एडाथिल वलसाण
केस नंबर: CA 6406-6407/2010
बेंच – जस्टिस एस . अब्दुल नजीर और जस्टिस विक्रम नाथ

” यह साफ है कि अगर एक पुरुष और एक महिला पति और पत्नी के रूप में लंबे समय तक एक साथ रहते हैं , तो इसे विवाह जैसा ही माना जायेगा

इस तरह का अनुमान साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 के तहत लगाया जा सकता है

और उनके बेटे को पैतृक संपत्तियों में हिस्सेदारी से वंचित भी नहीं किया जा सकता है

🔘 इस मामले में केरल HC ने आदेश दिया था कि ‘ नाजायज ‘ बेटा पैतृक संपत्तियों का हकदार नहीं सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया , जिसमें कहा गया था कि विवाह के सबूत के अभाव में एक साथ रहने वाले पुरुष और महिला का ‘ नाजायज ‘ बेटा पैतृक संपत्तियों में हिस्सा पाने का हकदार नहीं है .

🔘 सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को रद्द करते हुए कहा कि जब महिला और पुरुष ने ये सिद्ध कर दिया कि वे पति और पत्नी की तरह रहे हैं , तो कानून यह मान लेगा कि वे वैध विवाह के परिणामस्वरूप एक साथ रह रहे थे .

कट्टुकंडी एडाथिल कृष्णन बनाम कट्टुकंडी एडाथिल वलसन
CA 6406-6407/2010
बेंच : जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर और जस्टिस विक्रम नाथ

[ CPC 1908 ORDER 20 RULE 18 ]

ट्रायल कोर्ट द्वारा प्रारंभिक डिक्री पारित होने के बाद, अदालत को अंतिम डिक्री तैयार करने के मामले में स्वप्रेरणा से आगे बढ़ना चाहिए

प्रारंभिक डिक्री पारित होने के बाद, ट्रायल कोर्ट को सीपीसी के आदेश 20, नियम 18 के तहत कदम उठाने के मामले को सूचीबद्ध करना है

न्यायालयों को मामले को अनिश्चित काल के लिए स्थगित नहीं करना चाहिए – उसी मुकदमे में अलग अंतिम डिक्री कार्यवाही दायर करने की आवश्यकता नहीं है – अदालत को संबंधित पक्ष को अंतिम डिक्री तैयार करने के लिए उपयुक्त आवेदन दायर करने की अनुमति देनी चाहिए।

अंतिम डिक्री तैयार होने पर ही वाद समाप्त होता है – इसलिए, विचारण न्यायालयों को निर्देश दिया जाता है कि वे विभाजन और संपत्ति के अलग कब्जे के लिए प्रारंभिक डिक्री पारित करने के तुरंत बाद स्वप्रेरणा से और बिना आवश्यकता के कोई अलग कार्यवाही शुरू किये

सीपीसी के आदेश 20, नियम 18 के तहत कदम उठाने के लिए मामले को सूचीबद्ध करें

📑 05 JUNE 2022

जगमोहन सिंह बनाम विमलेश कुमार और अन्य
CRIMINAL APPEAL NO. 741 OF 2022
बेंच – जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस एएस बोपन्ना

[ Code of Criminal Procedure 1973- Section 482 ]

सीआरपीसी की धारा 482 के तहत अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए, उच्च न्यायालय को आम तौर पर इस बात की जांच शुरू नहीं करनी चाहिए कि साक्ष्य विश्वसनीय हैं या नहीं

क्षेत्राधिकार का प्रयोग संयम से, सावधानी से और सावधानी के साथ तभी किया जाना चाहिए जब इस तरह की कवायद सीआरपीसी की धारा 482 के विशिष्ट प्रावधानों द्वारा उचित हो।

अदालत सीआरपीसी की धारा 482 के तहत आपराधिक कार्यवाही में हस्तक्षेप करती है, दुर्लभ और असाधारण मामलों में, सीआरपीसी के प्रावधानों को प्रभावी बनाने के लिये, किसी भी न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए या अन्यथा न्याय के अंत को सुरक्षित करने के लिए

📑 03 JUNE 2022

महेंद्र सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य
( 2021 की आपराधिक अपील संख्या 764 )
बेंच – जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस हिमा कोहली

[ प्रत्यक्षदर्शी की एकमात्र गवाही ]

यदि न्यायालय को लगता है कि गवाह ” पूरी तरह से अविश्वसनीय ” है , तो न तो दोषसिद्धि और न ही दोषमुक्ति

गवाह की गवाही पर आधारित हो सकती है

▶ गवाह तीन प्रकार के होते हैं, अर्थात

(a) पूरी तरह से विश्वसनीय;
(b) पूरी तरह से अविश्वसनीय; और
(c) न तो पूरी तरह विश्वसनीय और न ही पूरी तरह अविश्वसनीय

• जब गवाह “पूरी तरह से विश्वसनीय” हो, तो अदालत को कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए क्योंकि दोषसिद्धि या दोषमुक्ति ऐसे एकल गवाह की गवाही पर आधारित हो सकती है।

• लेकिन जब गवाह “पूरी तरह से अविश्वसनीय” है, तो ऐसे गवाह की गवाही के आधार पर न तो दोषसिद्धि और न ही दोषमुक्ति का आधार बनाया जा सकता है।

• गवाहों की केवल तीसरी श्रेणी में ही न्यायालय को चौकस रहना पड़ता है और विश्वसनीय साक्ष्य, प्रत्यक्ष या परिस्थितिजन्य साक्ष्य द्वारा भौतिक विवरणों में पुष्टि की की तलाश करनी होती है।

📑 02 JUNE 2022

सऊद फैसल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और एएनआर
Special Leave to Appeal (Crl.) No(s). 5647/2022
बेंच – जस्टिस सी.टी. रवि कुमार, जस्टिस सुधांशु धूलिया

एक ही घटना से संबंधित एक अन्य मामले में एक ही अभियोजन पक्ष के किसी गवाह को

केवल इसलिए वापस नहीं बुलाया जा सकता क्योंकि उसने उसी घटना से संबंधित एक अन्य मामले में एक अलग बयान दिया था

यह स्वयं धारा 311, सीआरपीसी के तहत गवाह को वापस बुलाने का कारण नहीं

🔘 CRPC 1973 SEC 311 आवश्यक साक्षी को समन करने या उपस्थित व्यक्ति की  परीक्षा करने की शक्ति

▶ कोई न्यायालय इस संहिता के अधीन किसी जांच, विचारण या अन्य कार्यवाही के किसी प्रक्रम में किसी व्यक्ति को साक्षी के तौर पर समन कर सकता है या किसी ऐसे व्यक्ति की, जो हाजिर हो, यद्यपि वह साक्षी के रूप में समन न किया गया हो, परीक्षा कर सकता है,

▶ किसी व्यक्ति को, जिसकी पहले परीक्षा की जा चुकी है पुनः बुला सकता है और उसकी पुनः परीक्षा कर सकता है ;

▶ और यदि न्यायालय को मामले के न्यायसंगत विनिश्चय के लिए किसी ऐसे व्यक्ति का साक्ष्य आवश्यक प्रतीत होता है तो वह ऐसे व्यक्ति को समन करेगा और उसकी परीक्षा करेगा या उसे पुनः बुलाएगा और उसकी पुनः परीक्षा करेगा ।

📑 27 MAY 2022

चंद्रपाल बनाम छत्तीसगढ़ राज्य
CRA 378
बेंच – जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस बेला एम त्रिवेदी

एक सह-अभियुक्त द्वारा किए गए अतिरिक्त-न्यायिक स्वीकारोक्ति का उपयोग केवल पुष्टि के प्रयोजनों के लिए साक्ष्य के रूप में किया जा सकता है।

अभियुक्त के खिलाफ किसी भी ठोस सबूत के अभाव में, न्यायेतर स्वीकारोक्ति अपना महत्व खो देती है, और केवल इस तरह के स्वीकारोक्ति पर आधारित कोई दोषसिद्धि नहीं हो सकती है। 

साक्ष्य अधिनियम की धारा 30 के अनुसार, जब एक से अधिक व्यक्तियों पर एक ही अपराध के लिए संयुक्त रूप से ट्रायल चलाया जा रहा है, और ऐसे व्यक्तियों में से एक द्वारा खुद को और ऐसे कुछ अन्य व्यक्तियों को प्रभावित करने वाली स्वीकारोक्ति साबित हो जाती है, तो अदालत इस तरह की स्वीकारोक्ति को ऐसे अन्य व्यक्ति के साथ-साथ उस व्यक्ति के खिलाफ भी ध्यान में रखना चाहिए जो ऐसी स्वीकारोक्ति करता है।

अदालत ने पाया कि एक अतिरिक्त न्यायिक स्वीकारोक्ति अधिक विश्वसनीयता और साक्ष्य मूल्य प्राप्त करती है यदि यह ठोस परिस्थितियों की श्रृंखला द्वारा समर्थित है और अन्य अभियोजन साक्ष्य द्वारा इसकी पुष्टि की जाती है

📑 20 MAY 2022

साबित्री सामंतराय बनाम ओडिशा राज्य
2017 की आपराधिक अपील संख्या 988
बेंच – सीजेआई एनवी रमना, जस्टिस कृष्णा मुरारी और जस्टिस हेमा कोहली

[ Indian Evidence Act 1872 Sec 106 ]

धारा 106 किसी भी तरह से अभियुक्त के अपराध को स्थापित करने के लिए अभियोजन पक्ष को अपने बोझ से मुक्त करने के उद्देश्य से नहीं

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 उन मामलों पर लागू होती है जहां अभियोजन पक्ष द्वारा सफलतापूर्वक घटनाओं की श्रृंखला स्थापित की गई है, जिससे आरोपी के खिलाफ एक उचित निष्कर्ष निकाला जाता है।

एक बार अभियोजन ने सफलतापूर्वक घटनाओं की श्रृंखला स्थापित कर ली , तो इसे साबित करने के लिए आरोपी व्यक्तियों पर बोझ

परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर, जब भी अभियुक्त से कोई आपत्तिजनक प्रश्न किया जाता है और वह या तो प्रतिक्रिया से बचता है, या कोई प्रतिक्रिया देता है जो सत्य नहीं है, तो ऐसी प्रतिक्रिया अपने आप में घटना की श्रृंखला में एक अतिरिक्त कड़ी बन जाती हैं

मनोज बनाम मध्य प्रदेश राज्य
CRA 248-250 of 2015
बेंच – जस्टिस उदय उमेश ललित, जस्टिस एस रवींद्र भट और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी

सभी आपराधिक मामलों में अभियोजन पक्ष उन बयानों, दस्तावेजों और प्रदर्शनों की सूची प्रस्तुत करेगा जिन पर जांच अधिकारी (आईओ) द्वारा भरोसा नहीं किया जाता है। 

सीआरपीसी की धारा 24 के तहत नियुक्त लोक अभियोजक एक स्वतंत्र वैधानिक प्राधिकरण हैं जो न्यायालय के अधिकारियों के रूप में कार्य करते हैं।

उनकी भूमिका निष्पक्ष सुनवाई के लिए समर्पित है, न कि किसी मामले में दोषसिद्धि तक पहुंचने की लालसा के लिए। 

आरोपी को धारा 161 और 164 सीआरपीसी के तहत दर्ज गवाहों के बयान और जांच के दौरान जब्त किए गए दस्तावेजों, सामग्री वस्तुओं और एग्जिबिट की एक सूची और धारा 207 और 208, सीआरपीसी के अनुसार जांच अधिकारी (आईओ) द्वारा भरोसा की जाने वाले सामग्री की आपूर्ति की जाएगी

मेसर्स निट प्रो इंटरनेशनल बनाम स्टेट ऑफ एनसीटी दिल्ली
बेंच – न्यायमूर्ति एमआर शाह  और  न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना
CRIMINAL APPEAL NO. 807 of 2022 

कॉपीराइट अधिनियम की धारा 63 के तहत कॉपीराइट का उल्लंघन एक संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध है।

कॉपीराइट अधिनियम की धारा 63 के तहत अपराध के लिए, प्रदान की गई सजा एक अवधि के लिए कारावास है जो छह महीने से कम नहीं होगी लेकिन जिसे तीन साल तक बढ़ाया जा सकता है और जुर्माना हो सकता है। 

इसलिए मजिस्ट्रेट आरोपी को तीन साल की सजा भी दे सकता है। केवल उस मामले में जहां अपराध तीन साल से कम के कारावास या जुर्माने के लिए दंडनीय है, केवल अपराध को असंज्ञेय कहा जा सकता है, ” 

पहली अनुसूची के भाग II में प्रावधान की भाषा बहुत सीधी है, और इसमें कोई अस्पष्टता नहीं

🔘 सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें अधिनियम की धारा 63 को गैर-संज्ञेय और जमानती अपराध घोषित किया गया था।

📑 19 MAY 2022

भारत संघ और अन्य बनाम मेसर्स मोहित मिनरल्स
Civil Appeal No. 1390 of 2022
बेंच – जस्टिस धनंजय वाई चंद्रचूड़, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ

GST परिषद (Goods & Services Tax Council) की सिफारिशें केंद्र और राज्यों पर बाध्यकारी नहीं हैं,

यानी जीएसटी काउंसिल जो भी सिफारिशें देता हैं, उन्हें लागू करने के लिए केंद्र और राज्य सरकार बाध्य नहीं

संसद और राज्य विधानमंडल दोनों ही माल और सेवा कर के मामलों पर समान रूप से कानून बना सकते हैं

🔘 अनुच्छेद 246 ए जिसे संविधान संशोधन अधिनियम 2016 द्वारा पेश किया गया था, संसद और राज्य विधानसभाओं को जीएसटी के संबंध में कानून बनाने के लिए समवर्ती शक्ति प्रदान करता है

🔘 संविधान में संशोधन जिसमे साफतौर कहा गया था कि जीएसटी काउंसिल जो फैसला लेगी , वह केंद्र और राज्य दोनों के लिए बाध्यकारी होगी हालांकि कुछ हद तक इसमें छूट गई थी , लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले में यह साफतौर कहा गया है कि GST Council का जो फैसला होता है वो बाध्यकारी नहीं होता बल्कि “पपेंसिव” ( persuasive value ) होता है

🔘 सुप्रीम कोर्ट ने Art 279A एवं Art 246A का हवाला दिया है और कहा कि Art 279 ए इस बात के लिए बाध्य नहीं करता कि जीएसटी काउंसिल के फैसले को केंद्र और राज्य सरकारें मानें इसी तरह Art 246 ए भी इस बात का प्रावधान नहीं करता , जिसके तहत हर हाल में जीएसटी काउंसिल के फैसले को राज्यों को मानना है

बुद्धदेव कर्मस्कर बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य
[2010 की आपराधिक अपील संख्या 135]
बेंच – जस्टिस एल नागेश्वर राव, बीआर गवई और एएस बोपन्ना

यौनकर्मियों के अधिकार – भारत का संविधान 1950 अनुच्छेद 21

भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के प्रावधानों के अनुसार यौनकर्मियों को सम्मान के साथ जीने के लिए अनुकूल परिस्थितियों के लिए राज्यों / केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश जारी करते हैं

पुलिस को चाहिए उनके साथ शारीरिक या मौखिक रूप से दुर्व्यवहार न करें

मानव शालीनता और गरिमा के लिए संवैधानिक सम्मान को इस न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 21 में स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है। कहने की जरूरत नहीं है कि मानव शालीनता और गरिमा की यह बुनियादी सुरक्षा यौनकर्मियों और उनके बच्चों तक फैली हुई है, जो अपने काम से जुड़े सामाजिक कलंक का खामियाजा भुगतते हुए समाज के हाशिये पर चले जाते हैं, गरिमा के साथ जीने के अपने अधिकार से वंचित हो जाते हैं

यह देखा गया है कि यौनकर्मियों के प्रति पुलिस का रवैया अक्सर क्रूर और हिंसक होता है। यह ऐसा है जैसे वे एक ऐसा वर्ग हैं जिनके अधिकारों को मान्यता नहीं है। पुलिस और अन्य कानून प्रवर्तन एजेंसियों को यौनकर्मियों के अधिकारों के प्रति संवेदनशील बनाया जाना चाहिए, जो सभी नागरिकों के लिए संविधान में गारंटीकृत सभी बुनियादी मानवाधिकारों और अन्य अधिकारों का भी आनंद लेते हैं।

🔘 यौनकर्मियों को भी जारी किया जाए आधार कार्ड

भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) से यह सुनिश्चित करने को कहा कि आधार कार्ड जारी करने की प्रक्रिया में यौनकर्मियों की गोपनीयता बनी रहनी चाहिए. इस प्रक्रिया में गोपनीयता का उल्लंघन नहीं होगा, जिसमें आधार नामांकन संख्या में किसी भी कोड को असाइन करना भी शामिल है, जिससे कार्ड धारक को सेक्स वर्कर के रूप में पहचाना जा सकता है

📑 18 MAY 2022

बीबीआर (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड बनाम एसपी सिंगला कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड
CIVIL APPEAL NOS. 4130-4131 OF 2022 (ARISING OUT OF SPECIAL LEAVE PETITION (CIVIL) NOS. 30019-30020 OF 2019)
बेंच : जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस संजीव खन्ना

यदि समझौते की शर्तों में विशेष रूप से मध्यस्थता के स्थान का उल्लेख नहीं किया गया है तो क्या नए मध्यस्थ की नियुक्ति के साथ ‘मध्यस्थता की क्षेत्राधिकार सीट’ बदल जाती है ?

Arbitration and Conciliation Act, 1996 Section 20

एक नए मध्यस्थ की नियुक्ति जो एक अलग स्थान पर मध्यस्थता की कार्यवाही करता है, पहले मध्यस्थ द्वारा पहले से तय की गई क्षेत्राधिकार वाली ‘सीट’ को नहीं बदलेगा

एक बार जब मध्यस्थता की क्षेत्राधिकार ‘सीट’ क़ानून के अनुसार तय हो जाती है, तो मध्यस्थता से संबंधित पार्टियों की स्पष्ट आपसी सहमति के बिना, ‘सीट’ को नहीं बदला जा सकता है।

हम मानते हैं कि मध्यस्थता की कार्यवाही के लिए तय किया गया स्थान ही क्षेत्राधिकार वाली ‘सीट’ होगी और इस ‘सीट’ पर अधिकार क्षेत्र वाली अदालतों का विशेष अधिकार होगा।

इस सिद्धांत का एक अपवाद हो सकता है, जो तब लागू होगा जब संबंधित पक्ष क्षेत्राधिकार ‘सीट’ को बदले जाने को लेकर सहमत हों।’’

मुन्नी देवी उर्फ ​​नाथी देवी बनाम राजेंद्र उर्फ ​​लल्लू लाल
सीए 5894/ 2019
बेंच – जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी

हिंदू उत्तराधिकार कानून 1956 के सेक्शन 14(1) के तहत, हिंदू विधवा महिला अगर किसी संपत्ति की देखभाल कर रही है या उसका उस पर नियंत्रण है तो

पति की मृत्यु के बाद भी महिला का उस पर पूरा अधिकार है

▶ कोर्ट ने कहा, ‘धारा 14 (1) का उद्देश्य महिलाओं को सशक्त बनाना’  बेंच ने अपने फैसले में कहा कि धारा 14(1) महिलाओं के पक्ष में एक उदार परिदृश्य की अपेक्षा करता है, इसके पीछे सामाजिक-आर्थिक उद्देश्य हैं

▶ न्यायालय ने यह भी देखा कि अधिनियम की धारा 14(1) के आधार पर एक हिंदू विधवा का सीमित हित स्वतः पूर्ण अधिकार में बदल जाता है, चाहे ऐसी संपत्ति हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के शुरू होने से पहले या बाद में उसके पास हो। , उसके भरण-पोषण के अधिकार के एवज में। 

एजी पेरारिवलन बनाम राज्य
2022 की आपराधिक अपील संख्या 833-834
बेंच – जस्टिस एल नागेश्वर राव, बी.आर. गवई और ए.एस. बोपन्ना  

सजा का रूपान्तरण – आईपीसी की धारा 302 के तहत लगाई गई सजा को कम करने की शक्ति राज्य सरकार के पास है न कि केंद्र सरकार के पास

पीठ ने यह माना कि केंद्र सरकार की भारत संघ बनाम श्रीहरन (2015) में न्यायालय के फैसले की समझ, कि धारा 302 के तहत दी गई सजा को माफ/ कम करने का अधिकार सिर्फ केंद्र सरकार को है, पूर्ण रूप से गलत है।

क्योंकि इस संबंध में न तो भारतीय दंड संहिता [आईपीसी] और न ही संविधान या संसद द्वारा धारा 302 के संबंध में बनाए गए किसी भी कानून के तहत केंद्र को कोई व्यक्त कार्यकारी शक्ति प्रदान की गई है।

इस तरह के विशिष्ट अधिकार के अभाव में, राज्य की कार्यकारी शक्ति को ही धारा 302 के संबंध में फैसला लेने का अधिकार है, क्योंकि धारा 302  समवर्ती सूची यानि लिस्ट III की पहली एंट्री के तहत आती है।

राजपाल सिंह बनाम सरोज (मृतक) एलआर और अन्य के माध्यम से
CIVIL APPEAL NO. 3489 OF 2022
बेंच – न्यायमूर्ति एमआर शाह और न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना

जब बिक्री विलेख को रद्द करने के साथ-साथ कब्जे की वसूली के लिए एक समग्र मुकदमा दायर किया जाता है,

तो बिक्री विलेख को रद्द करने की वास्तविक राहत के संबंध में परिसीमा अवधि पर विचार किया जाना आवश्यक है।

जो बिक्री विलेख को रद्द करने की जानकारी की तारीख से तीन वर्ष होगी

📑 17 MAY 2022

नंजुंदप्पा और अन्य बनाम कर्नाटक राज्य
2017 की आपराधिक अपील संख्या 900
बेंच : सीजेआई एनवी रमना , जस्टिस कृष्णा मुरारी और जस्टिस हिमा कोहली

[ भारतीय दंड संहिता , 1860 , धारा 304 ( ए ) लापरवाही द्वारा मृत्यु कारित करना ]

भारतीय दंड संहिता की धारा 304 ए के तहत आरोपी के अपराध को स्थापित करने के लिए अभियोजन पक्ष को पहले लापरवाही साबित करनी होगी

और फिर आरोपी की लापरवाही और पीड़ित की मौत के बीच सीधा संबंध स्थापित करना होगा 

लापरवाही से चोट लगने के आपराधिक मामले में ‘रेस इप्सा लोक्विटुर स्ट्रिक्टो सेंसु’ का सिद्धांत लागू नहीं होगा

🔘 IPC की धारा 304A इस प्रकार है –

[लापरवाही से मृत्यु कारित करना — जो कोई भी जल्दबाजी या लापरवाही से किसी व्यक्ति की मृत्यु का कारण बनता है, जो गैर इरादतन मानव वध की कोटि में नहीं आता है, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से दण्डित किया जाएगा या दोनों के साथ]

सुधीर रंजन पात्रा ( मृत ) एलआर और अन्य बनाम हिमांशु शेखर श्रीचंदन व अन्य
2022 की सिविल अपील संख्या 3641
बेंच – जस्टिस एम आर शाह और जस्टिस बी वी नागरत्ना

Order IX Rule 13 CPC | क्या ट्रायल कोर्ट एकतरफा डिक्री ( ex-parte decree ) को रद्द करने के बाद लिखित कथन दाखिल करने की अनुमति देने के लिए प्रतिवादियों की प्रार्थना पर फैसला कर सकता है ?

जब एक पक्षीय डिक्री को रद्द कर दिया जाता है और मुकदमा दायर करने के लिए बहाल किया जाता है तो प्रतिवादियों को उस स्थिति में नहीं लाया जा सकता है जो सूट की तारीख से पहले है, जब उसे एकतरफा ख़ारिज किया गया था।

यहाँ प्रतिवादियों की प्रार्थना पर विचार करने के लिए ट्रायल कोर्ट पर छोड़ दिया जाना चाहिए कि उन्हें लिखित कथन दाखिल करने की अनुमति दी जाए या नहीं

इसलिए कोई अनुमति नहीं प्रतिवादी लिखित बयान दाखिल करने के लिए अस्थिर और अपास्त

🔘 इस मामले में प्रतिवादी एक वाद में एकपक्षीय थे और उन्होंने आदेश IX नियम 13 सीपीसी के तहत एक पक्षीय डिक्री को रद्द करने के लिए एक आवेदन दायर किया और बयान दाखिल करने की अनुमति देने की भी प्रार्थना की थी

सतीश कुमार जाटव बनाम यूपी राज्य
CrA 770 of 2022
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और बीवी नागरत्ना

जब कथित अपराधों के लिए एक स्पष्ट मामला बनता है तो आपराधिक कार्यवाही को केवल इस आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता है

कि “मामले की कार्यवाही को लंबा करने से कोई उपयोगी उद्देश्य पूरा नहीं होगा”

धारा 482 सीआरपीसी की याचिका का निपटारा करते समय उच्च न्यायालय को एक तर्कसंगत और बोलने वाला आदेश पारित करना चाहिए

▶ इस मामले में, मजिस्ट्रेट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 307, 504, 506 और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) की धारा 3(10)(15) के तहत दंडनीय अपराधों के लिए मुकदमे की कार्यवाही का सामना करने के लिए समन भेजा था।

▶ आदेश के खिलाफ आरोपी द्वारा दायर याचिका को स्वीकार करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आपराधिक कार्यवाही को केवल यह कहते हुए रद्द कर दिया कि “मामले की कार्यवाही को लंबा करने से कोई उपयोगी उद्देश्य पूरा नहीं होगा”।

▶सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि उच्च न्यायालय का आदेश गुप्त और गैर-बोलने वाला आदेश था। अदालत ने आगे कहा कि निचली अदालत ने सीआरपीसी की धारा 200 और 202 दर्ज किए गए बयानों के आधार पर आरोपी को तलब किया था लेकिन उच्च न्यायालय ने आकस्मिक तरीके से कार्यवाही को रद्द कर दिया।

▶ जब आईपीसी की धारा 307, 504, 506 और अधिनियम की धारा 3(10)(15) के तहत अपराधों के गंभीर आरोप लगाए गए थे तो हाईकोर्ट को धारा 482 के तहत आवेदन पर विचार करते समय अधिक सतर्क और चौकस होना चाहिए था।

लेवाकु पेड्डा रेड्डम्मा बनाम गोट्टुमुक्कला वेंकट सुब्बम्मा
Civil Apeal 4096/2022
बेंच – जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस वी रामासुब्रमण्यम

[ Order VIII Rule 1 A (3) ]

भले ही कुछ देरी हुई हो, लेकिन सिविल वाद में किसी पक्ष को अतिरिक्त दस्तावेज पेश करने की अनुमति देने से इनकार करना ,

न्याय देने से इनकार करना होगा

ट्रायल कोर्ट को दस्तावेजों के पेश करने को अस्वीकार करने के बजाय कुछ जुर्माना लगाना चाहिए, प्रक्रिया के नियम न्याय के हाथ के नीचे

🔘 Order VIII Rule 1 A (3)

▶ आदेश VIII नियम 1 ए के अनुसार, जहां प्रतिवादी अपने बचाव को किसी दस्तावेज़ पर आधारित करता है या अपने अधिकार या कब्जे में किसी दस्तावेज़ पर निर्भर करता है,

▶ तो अपने बचाव या सेट-ऑफ़ या प्रतिदावे के दावे के समर्थन में, वह ऐसे दस्तावेज़ को एक सूची में दर्ज करेगा, और जब उसके द्वारा लिखित बयान प्रस्तुत किया जाता है तो उसे न्यायालय में पेश करेगा और साथ ही, लिखित बयान के साथ दायर किए जाने के लिए दस्तावेज और उसकी एक प्रति प्रदान करेगा।

▶ उप नियम (3) में प्रावधान है कि एक दस्तावेज जो इस नियम के तहत प्रतिवादी द्वारा अदालत में पेश किया जाना चाहिए, लेकिन, ऐसा नहीं किया गया है, अदालत की अनुमति के बिना सुनवाई में उसकी ओर से वाद के साक्ष्य में ग्रहण नहीं किया जाएगा।

📑 13 MAY 2022

सुरेंद्रन बनाम केरल राज्य
CrA 1080 of 2019
बेंच – सीजेआई एनवी रमाना, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस हिमा कोहली

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 32 के तहत क्रूरता के संबंध में मृत्यु पूर्व दिए गए पत्नी के बयान

आईपीसी की धारा 498 ए के तहत आरोप के लिए एक मुकदमे में स्वीकार्य

अर्थात पत्नी के डाईंग डिक्लेयरेशन का इस्तेमाल क्रूरता साबित करने के लिए किया जा सकता है, भले ही पति उसकी मौत से संबंधित आरोपों से बरी हो जाए

🔘 हालांकि यह दो पूर्वशर्तों की संतुष्टि के अधीन है

▶ (1) मामले में उसकी मृत्यु का कारण प्रश्न में आना चाहिए

▶ (2) अभियोजन पक्ष को यह दिखाना होगा कि आईपीसी की धारा 498ए के संबंध में स्वीकार किए जाने के लिए जो सबूत मांगे गए हैं, वे मृत्यु की परिस्थितियों से भी संबंधित होने चाहिए।

वीरेंद्र बनाम मध्य प्रदेश राज्य
2018 की आपराधिक अपील संख्या 5 और 6
बेंच : – जस्टिस एएम खानविलकर , जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस सीटी रविकुमार

बलात्कार के अपराध में मुकदमे का निर्णय ‘डीएनए प्रोफाइलिंग’ में चूक से तय नहीं हो सकता, खासकर तब जब इसमें हत्या का मामला भी जुड़ा हो

क्योंकि यदि जांच में केवल इस तरह की खामी के कारण अपराधी बरी होता है तो आपराधिक न्याय का उद्देश्य खुद पीड़ित बन जाएगा

🔘 इस मामले में अदालत के समक्ष दायर अपील में आरोपी पक्ष की ओर से यह तर्क दिया गया था कि अपीलकर्ता और मृतक के शरीर पर पाए गए नमूनों के बीच संबंध स्थापित करने के लिए कोई डीएनए परीक्षण नहीं किया गया था और इस तरह सीआरपीसी की धारा 53 ए का उल्लंघन किया गया है

📑 12 MAY 2022

प्रभा त्यागी बनाम कमलेश देवी
2022 की आपराधिक अपील संख्या 511
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस बीवी नागरत्ना

घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 – धारा 12

🔘 [ धारा 18 से 20 और 22 ] क्या घरेलू हिंसा अधिनियम , 2005 के तहत कार्यवाही शुरू करने से पहले घरेलू घटना रिपोर्ट पर विचार करना अनिवार्य है ताकि वास्तविक हिंसा को लागू किया जा सके ।

▶ घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत कोई भी आदेश पारित करने से पहले मजिस्ट्रेट के लिए संरक्षण अधिकारी या सेवा प्रदाता द्वारा दायर घरेलू घटना रिपोर्ट पर विचार करना अनिवार्य नहीं | यहां तक कि घरेलू घटना रिपोर्ट की अनुपस्थिति में भी मजिस्ट्रेट को डीवी अधिनियम के प्रावधानों के तहत एक पक्षीय या अंतरिम दोनों के साथ – साथ अंतिम आदेश पारित करने का अधिकार

🔘 [ धारा 17- निवास का अधिकार ] क्या पीड़ित व्यक्ति के लिए उन व्यक्तियों के साथ रहना अनिवार्य है जिनके खिलाफ हिंसा के बिंदु पर आरोप लगाए गए हैं ?

▶ ‘साझा घर में रहने का अधिकार’ शब्द की व्यापक व्याख्या दी, यह मानते हुए कि इसे केवल वास्तविक वैवाहिक निवास तक सीमित नहीं किया जा सकता है, लेकिन संपत्ति पर किसी के अधिकार के बावजूद अन्य घरों तक बढ़ाया जा सकता है अर्थात साझा घर में रहने का अधिकार वैवाहिक घर तक सीमित नहीं

🔘 [ धारा 12 मजिस्ट्रेट को आवेदन ] क्या पीड़ित व्यक्ति और जिस व्यक्ति के खिलाफ राहत का दावा किया गया है, के बीच स्थायी घरेलू संबंध होना चाहिए ?

▶ यह आवश्यक नहीं है कि व्यथित व्यक्ति द्वारा आवेदन दाखिल करते समय घरेलू संबंध बने रहें । भले ही पीड़ित व्यक्ति डी.वी. की धारा 12 के तहत आवेदन दाखिल करने के समय साझा घर में प्रतिवादी के साथ घरेलू संबंध में न हो।

गुरुकंवरपाल कृपाल सिंह बनाम सूर्य प्रकाशम और अन्य
Petition for Special Leave to Appeal (Crli) No. 5485 of 2021
बेंच – न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी और न्यायमूर्ति सीटी रविकुमार

जब तक आरोपी को संपत्ति सौंपने की पुष्टि नहीं हो जाती, तब तक आईपीसी की धारा 405 के तहत आपराधिक न्यासभंग के अपराध को आकर्षित नहीं किया जाएगा।

धारा 405 आईपीसी को आकर्षित करने के लिए अनिवार्य योग्यता आरोपी व्यक्तियों को संपत्ति का सौंपना

अर्थात जहां आरोपी व्यक्ति को संपत्ति सौंपी गई थी, और ऐसी संपत्ति का बेईमानी से दुरुपयोग किया गया था या उसके द्वारा अपने उपयोग के लिए परिवर्तित किया गया था

🔘 आपराधिक न्यास भंग क्या है ? 

▶ आम भाषा में इसे हम ‘आपराधिक विश्वासघात’ भी कह सकते हैं, लेकिन कानूनी रूप से इसे आईपीसी की धारा 405 के तहत परिभाषित किया गया है।

▶ धारा 405 के अनुसार – जब एक व्यक्ति को किसी संपत्ति की जिम्मेदारी के साथ उसका प्रभुत्व भी दिया जाता है, और वह व्यक्ति बेईमानी के उद्देश्य से संपत्ति को अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करता है या संपत्ति को अपने उपयोग में परिवर्तित करता है, या वह कानून द्वारा वर्णित प्रक्रिया के खिलाफ संपत्ति का निर्वहन करता है, या किसी कानूनी अनुबंध को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करता है या किसी दूसरे से ऐसा करवाता है, तो हम उसे आपराधिक न्यास भंग कहेंगे।

पीटीसी इंडिया फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड बनाम वेंकटेश्वरलू कारी और अन्य
CIVIL APPEAL NO. 5443 OF 2019
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस संजीव खन्ना

भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 गिरवी रखे गए माल को गिरवी रखने वाले द्वारा भुगतान न करने पर

स्वयं को बेचने को मान्यता नहीं देता है

यहां भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 176 के अनुसार , गिरवीदार द्वारा चूक की स्थिति में, गिरवी रखने वाला एक मुकदमा ला सकता है या गिरवी रखी वस्तुओं को गिरवी रखने वाले को उचित नोटिस देकर बेच सकता है।

धारा 177 के अनुसार गिरवी रखने वाले को गिरवी रखे माल की वास्तविक बिक्री से पहले उसे भुनाने का अधिकार है । कोर्ट ने आगे कहा कि गिरवी रखने वाले के पास गिरवी रखे गए सामानों पर केवल विशेष अधिकार होते हैं – उन्हें ऋण के लिए सुरक्षा के रूप में बनाए रखने के लिए और उन पर कोई सामान्य अधिकार नहीं होता है।

📑 11 MAY 2022

एसजी वोम्बटकेरे बनाम भारत संघ
Writ Petition(C) No.682 of 2021
बेंच – सीजेआई एन.वी. रमना, जस्टिस सूर्यकांत और हिमा कोहली

भारतीय दंड संहिता की धारा 124A के तहत 162 साल पुराने राजद्रोह कानून को तब तक स्थगित रखा जाना चाहिए

जब तक कि केंद्र सरकार इस प्रावधान पर पुनर्विचार नहीं करती

“धारा 124 ए के तहत लगाए गए आरोपों के संबंध में सभी लंबित मामले, अपील और कार्यवाही को स्थगित किए जाते हैं”

▶हम उम्मीद करते हैं कि केंद्र और राज्य सरकारें किसी भी प्राथमिकी दर्ज करने, जांच जारी रखने या आईपीसी की धारा 124 ए के तहत जबरन कदम उठाने से परहेज करेंगी।”

▶कोर्ट ने कहा कि जो लोग पहले से ही आईपीसी की धारा 124ए के तहत बुक हैं और जेल में हैं, वे जमानत के लिए संबंधित अदालतों का दरवाजा खटखटा सकते हैं

📑 10 MAY 2022

रेखा जैन बनाम कर्नाटक राज्य
CRA 749 of 2022
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और बीवी नागरत्न

🔘 क्या धारा 420 आईपीसी के तहत अपराध के लिए शिकायत / प्राथमिकी को रद्द करने से इनकार करना उचित है जब कोई “बेईमान प्रलोभन” का आरोप नहीं ?

[ बेईमान प्रलोभन और धोखाधड़ी का अपराध ]

भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 420 के तहत धोखाधड़ी के अपराध को गठित करने के लिए,

किसी व्यक्ति को कुछ संपत्ति देने के लिए धोखा देने के लिए एक “बेईमान प्रलोभन” होना आवश्यक

“बेईमान प्रलोभन” के किसी भी आरोप के अभाव में, आईपीसी की धारा 420 के तहत अपराध के लिए मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है

📑 09 MAY 2022

दिलीप हरिरामनी बनाम बैंक ऑफ बड़ौदा
Case No.: Crl Appeal No.: 767/2022
बेंच – न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना

नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (एनआई एक्ट) की धारा 138 के तहत चेक बाउंस के मामलों के लिए आपराधिक दायित्व किसी व्यक्ति पर केवल इसलिए नहीं लगाया जा सकता है

क्योंकि वह उस फर्म में भागीदार था जिसने ऋण लिया था या इस तरह के ऋण के लिए एक गारंटर के रुप में वह खड़ा था

धारा 141 के प्रावधान जो काल्पनिक मानते हुए प्रतिवर्ती दायित्व को लागू करते हैं, जिसके लिए फर्म / कंपनी द्वारा अपराध करने की भी आवश्यकता होती है।

भरत कालरा बनाम राज किशन छाबड़ा
CA 3788 OF 2022
बेंच – जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस वी. रामसुब्रमण्यम

🔘 आदेश 8 नियम 1 सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के तहत लिखित कथन दाखिल करने की समय सीमा (यदि यह एक वाणिज्यिक मुकदमा नहीं है) अनिवार्य या निर्देशिका है ?

लिखित कथन दाखिल करने की समय सीमा अनिवार्य ( Mandatory ) नहीं है, लिखित कथन ( written statement ) दाखिल करने में देरी की भरपाई प्रतिकर के साथ की जा सकती है।

▶ सुप्रीम कोर्ट पूर्व निर्णय सलेम एडवोकेट बार एसोसिएशन, तमिलनाडु बनाम भारत संघ में देखा गया था कि आदेश VIII नियम 10 में कोई प्रतिबंध नहीं है कि नब्बे दिनों की समाप्ति के बाद आगे का समय नहीं दिया जा सकता है।

▶ न्यायालय के पास ‘मुकदमे के संबंध में ऐसा आदेश देने जैसा कि वह ठीक समझे’ करने की व्यापक शक्ति है। स्पष्ट रूप से इसलिए लिखित कथन दर्ज करने के लिए 90 दिनों की ऊपरी सीमा प्रदान करने वाले आदेश VIII नियम 1 का प्रावधान निर्देशिका है |

किशोर घनश्यामसा परलीकर बनाम बालाजी मंदिर संस्थान मंगरुल (नाथ)
2022 की सिविल अपील संख्या 3794
बेंच – जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर और जस्टिस विक्रम नाथ

विशिष्ट अनुतोष अधिनियम 1963 – धारा 28 न केवल निर्णय – देनदारों को अनुबंध को रद्द करने की अनुमति देता है ,

बल्कि राशि का भुगतान करने के लिए अदालत द्वारा समय के विस्तार की भी अनुमति देता है ।

धारा 28 के तहत शक्ति विवेकाधीन है और अदालत को आदेश पारित करना होगा जैसा कि मामले में न्याय की आवश्यकता हो सकती है

” एक डिक्री के पारित होने पर विशिष्ट प्रदर्शन के लिए एक वाद समाप्त नहीं होता है और जिस अदालत ने विशिष्ट प्रदर्शन के लिए डिक्री पारित की है, वह डिक्री पारित होने के बाद भी डिक्री पर नियंत्रण रखती है।”

📑 04 MAY 2022

रवींदर सिंह @ काकू बनाम पंजाब सरकार
CRA 1307/2019
बेंच – जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस विनीत सरन

🔘 क्या अभियोजन द्वारा पेश किए गए कॉल रिकॉर्ड साक्ष्य अधिनियम की धारा 65ए और 65बी के तहत स्वीकार्य होंगे, यह देखते हुए कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के प्रमाणीकरण की आवश्यकता का अनुपालन नहीं किया गया

इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य पेश करने के लिए साक्ष्य अधिनियम की धारा 65बी (4) के तहत प्रमाण पत्र अनिवार्य,

ऐसे प्रमाण पत्र के स्थान पर मौखिक साक्ष्य संभवतः पर्याप्त नहीं हो सकता है। 

यह धारा अनिवार्य प्रकृति की है, क्योंकि अधिनियम की धारा 65बी(4) में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि द्वितीयक साक्ष्य केवल तभी स्वीकार्य है जब बताए गए तरीके से नेतृत्व किया जाए और अन्यथा नहीं, और अन्यथा रखने से धारा 65बी का उल्लंघन होगा।

📑 02 MAY 2022

जैकब पुलियेल बनाम भारत संघ
Writ Petition (Civil) No. 607 of 2021
बेंच – जस्टिस एल नागेश्वर राव और बीआर गवई

“शारीरिक स्वायत्तता को ध्यान में रखते हुए अनुच्छेद 21 के तहत शारीरिक अखंडता की रक्षा करते हुए

किसी को भी COVID – 19 टीकाकरण के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। “

लेकिन सामुदायिक स्वास्थ्य की सुरक्षा के हित में सरकार व्यक्तिगत अधिकारों पर कुछ सीमाएं लगाकर सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों को विनियमित करने की हकदार है , जो संवैधानिक न्यायालयों द्वारा जांच के लिए खुले हैं ।

फैसले से पांच निष्कर्ष दिए गए हैं:

  1. किसी को भी टीकाकरण के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है;
  2. केंद्र सरकार ने टीकाकरण के दुष्परिणामों को सार्वजनिक करने का निर्देश दिया;
  3. वर्तमान COVID टीकाकरण नीति अनुचित या मनमानी नहीं है;
  4. वैक्सीन परीक्षण डेटा सार्वजनिक डोमेन में रखा जाना चाहिए;
  5. न्यायालय वैज्ञानिक या विशेषज्ञ राय का दूसरा अनुमान नहीं लगा सकता है।

📑 29 APRIL 2022

अतबीर बनाम दिल्ली के एनसीटी राज्य
Criminal Appeal No. 714 of 2022 (Arising out of SLP(Crl.) No. 7887 of 2021)
बेंच – जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस अनिरुद्ध बोस

कैदी को फरलो मांगने का अधिकार है, भले ही वह सजा छूट के लिए योग्य न हो

छूट प्राप्त करने की पात्रता फरलो प्राप्त करने के लिए पूर्व-आवश्यकता नहीं

फरलो देने की पूरी योजना सुधार के दृष्टिकोण और अच्छे आचरण को बनाए रखने के लिए प्रोत्साहन के रूप में आधारित

🔘 फरलो को दिल्ली जेल अधिनियम, 2000 की धारा 2 (एच) में परिभाषित किया गया है –

फरलो का अर्थ है एक दोषी कैदी को दी जाने वाली पुरस्कार के रूप में छुट्टी, जिसे 5 साल या उससे अधिक के लिए कठोर कारावास की सजा सुनाई गई है और उसके 3 साल बीत चुके हैं”

🔴 यह भी जानना जरूरी

▶ पैरोल का अर्थ है एक कैदी की अल्प अवधि के लिए अस्थायी रिहाई ताकि वह अपने पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों और जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए अपने परिवार और समुदाय के साथ सामाजिक संबंध बनाए रख सके। यह एक कैदी के लिए बाहरी दुनिया के साथ नियमित संपर्क बनाए रखने का एक अवसर है ताकि वह खुद को समाज के नवीनतम विकास से अपडेट रख सके। हालांकि यह स्पष्ट किया जाता है कि जेल के बाहर कैदी द्वारा पैरोल पर बिताई गई अवधि किसी भी तरह से रियायत नहीं है जहां तक ​​उसकी सजा का संबंध है। कैदी को जेल के बाहर पैरोल पर अपने द्वारा बिताई गई अवधि के लिए अतिरिक्त समय जेल में बिताना पड़ता है।

▶ फरलो का अर्थ है अच्छे आचरण को बनाए रखने और जेल में अनुशासित रहने के लिए प्रेरणा के माध्यम से कुछ योग्य संख्या के वर्षों के अंतराल के बाद थोड़े समय के लिए कैदी की रिहाई। यह पूरी तरह से जेल में अच्छे आचरण के लिए एक प्रोत्साहन है। इसलिए, कैदी द्वारा जेल के बाहर फरलो पर बिताई गई अवधि को उसकी सजा में गिना जाएगा।

▶ पैरोल की अवधि एक महीने तक होती है जबकि फरलो के मामले में यह अधिकतम चौदह दिनों तक होती है

▶ पैरोल कई बार दी जा सकती है जबकि फरलो के मामले में सीमा होती है।

विपन अग्रवाल बनाम रमन गंडोत्रा
CA 3492 OF 2022
बेंच – जस्टिस हेमंत गुप्ता और वी. रामसुब्रमण्यम

[ सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 आदेश 43 नियम 1ए ]

एक समझौता डिक्री को वापस लेने के लिए आवेदन (इस आधार पर कि यह धोखाधड़ी और मिलीभगत से ग्रस्त है)

उस न्यायालय के समक्ष दायर किया जा सकता है जिसने डिक्री को मंजूरी दी थी

📑 28 APRIL 2022

बीएसएनएल बनाम संदीप चौधरी
CIVIL APPEAL NO. 8717 OF 2015
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और बीवी नागरत्ना

यदि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित उम्मीदवारों ने उच्च अंक प्राप्त किए हैं या अधिक मेधावी हैं,

तो सामान्य श्रेणी में अंतिम रैंक वाले व्यक्ति से अधिक अंक प्राप्त करने वाले आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवार को सामान्य श्रेणी के पूल में नियुक्ति के लिए विचार किया जाना चाहिए

ताकि आरक्षित वर्ग की शेष सीटों को ऐसे अन्य योग्य उम्मीदवार द्वारा भरा जा सके

अर्थात आरक्षित श्रेणियों से संबंधित उम्मीदवार अनारक्षित श्रेणियों में सीटों के लिए दावा कर सकते हैं यदि मेरिट सूची में उनकी योग्यता और स्थिति उन्हें ऐसा करने का अधिकार देती है

📑 27 APRIL 2022

हरमिंदर सिंह (डी) बनाम सुरजीत कौर (डी
CIVIL APPEAL NO.89 OF 2012
बेंच – जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस वी रामासुब्रमण्यम

Transfer of Property Act, 1882 Section 62 – Usufructuary Mortgage

एक बार एक भोग बंधक बन जाने के बाद, गिरवी रखने वाले को इस सिद्धांत पर ( “एक बार बंधक हमेशा एक बंधक होता है।” )

किसी भी समय बंधक को भुनाने का अधिकार

🔴 इस मामले में 30 साल की अवधि के भीतर गिरवीकर्ता द्वारा भोग बंधक को भुनाया नहीं गया था , वादी ने घोषणा के लिए एक वाद दायर किया था कि वह बंधक अधिकारों की समाप्ति के बाद और स्थायी निषेधाज्ञा के लिए मालिक बन गई है ।

🔘 TP ACT की धारा 58 (डी) एक भोग बंधक परिभाषित करती है

• जहां गिरवीदार कब्जा देता है या स्पष्ट रूप से या निहितार्थ द्वारा गिरवीदार को गिरवी रखी गई संपत्ति का कब्जा देने के लिए बाध्य करता है, और उसे भुगतान होने तक इस तरह के कब्जे को बनाए रखने के लिए अधिकृत करता है,

• बंधक-धन का और संपत्ति या इस तरह के किराए और मुनाफे के किसी भी हिस्से से अर्जित किराए और मुनाफे को प्राप्त करने के लिए और ब्याज के बदले में, या बंधक-धन के भुगतान में, या आंशिक रूप से इसके बदले में ब्याज या आंशिक रूप से बंधक-धन के भुगतान में, लेन-देन को बंधक और गिरवीदार को “भोग बंधक” कहा जाता है।

▶ भोग बंधक और किसी अन्य बंधक में अंतर स्पष्ट रूप से टीपी अधिनियम की धारा 58, धारा 60 और धारा 62 के प्रावधानों को परिसीमा अधिनियम की अनुसूची के अनुच्छेद 61 के साथ पढ़ा जाता है। भोग बंधक को किसी अन्य बंधक के बराबर नहीं माना जाता है

📑 26 APRIL 2022

रतीश बाबू उन्नीकृष्णन बनाम द स्टेट एंड एनरी
Criminal Appeal No. 694-695 of 2022
बेंच:  जस्टिस जेकेएम जोसेफ और जस्टिस हृषिकेश रॉय

जहां तथ्यों का विरोध किया जाता है वहां गेहूं को भूसी से अलग करने का भार रद्द करने वाली अदालत को अपने ऊपर नहीं लेना चाहिए

अदालत को पूर्व-परीक्षण ( ट्रायल से पहले ) के चरण में एक शिकायत को रद्द करने की राहत देने के लिए धीमा होना चाहिए

जब तथ्यात्मक विवाद संभावना के दायरे में हो

किसी भी मामले में जब कानूनी अनुमान होता है, तो यह न्यायसंगत नहीं होगा कि

रद्द करने वाला न्यायालय पहले ट्रायल कोर्ट को पक्षकारों के साक्ष्य का मूल्यांकन करने की अनुमति दिए बिना।

कथित तथ्यों पर विस्तृत जांच करे

🔘 अदालत का रुख इतना सतर्क होना चाहिए कि शिकायत का समर्थन करने वाले कानूनी अनुमान की अवहेलना करके मामले को समय से पहले समाप्त ना किया जाए।

मनीबेन मगनभाई भारिया बनाम जिला विकास अधिकारी दाहोद व अन्य
Civil Appeal No(S). 3153 Of 2022
बेंच – न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी और न्यायमूर्ति अभय एस. ओका

आंगनवाड़ी कार्यकर्ता (AWWs) और आंगनवाड़ी सहायिकाएँ (AWH) सरकार की एक विस्तारित शाखा हैं

ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम, 1972 के तहत ग्रेच्युटी प्राप्त करने के हकदार

संविधान के अनुच्छेद 47 के तहत परिभाषित राज्य के दायित्वों को प्रभावी बनाने के लिए आंगनवाड़ी केंद्रों की स्थापना की गई है और ऐसे में कहा जा सकता है कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और आंगनवाड़ी सहायक के पद वैधानिक हैं।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून, 2013 के प्रावधानों और शिक्षा का अधिकार कानून की धारा 11 के कारण आंगनवाड़ी केंद्र भी वैधानिक कर्तव्यों का पालन करते हैं।

🔘 न्यायालय ने रेखांकित किया कि केंद्र और राज्यों के लिये आँगनवाड़ी कार्यकर्त्ताओं एवं सहायिकाओं की सेवा शर्तों को बेहतर बनाने पर “सामूहिक रूप से विचार” (Collectively Consider) करने का यह उचित समय है।

🔘 न्यायालय ने इस बात की ओर भी ध्यान आकर्षित किया कि सार्वजनिक नीति में एकीकृत बाल विकास योजना (Integrated Child Development Scheme- ICDS) पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।  

🔘 यह योजना “बाल और महिला अधिकारों की प्राप्ति हेतु एक संस्थागत तंत्र” के रूप में कार्य करती है फिर भी इन सेवाओं को लागू करने योग्य अधिकारों के बजाय राज्य चैरिटी के रूप में माना जाता है।

🔴 ग्रेच्युटी (उपदान): – एक ऐसा लाभ है जो ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम 1972 के तहत देय है। यह किसी कर्मचारी को मिलने वाले वेतन का एक हिस्सा होता है और इसे एक लाभ योजना के रूप में देखा जा सकता है, जिसे किसी व्यक्ति को उसकी सेवानिवृत्ति पर उसकी सहायता करने के लिये डिज़ाइन किया गया है।

🔴 एक नियोक्ता द्वारा ग्रेच्युटी का भुगतान तब किया जाता है, जब कोई कर्मचारी कम-से-कम 5 वर्ष की अवधि के लिये किसी संगठन की सेवा करने के बाद नौकरी छोड़ देता है। 

📑 22 APRIL 2022

इमरान बनाम श्री मोहम्मद भव और अनरी
[Criminal Appeal No. 658 of 2022 arising out of S.L.P. (Crl.) No. 27 of 2022]
बेंच – सीजेआई एनवी रमना, जस्टिस कृष्णा मुरारी और हेमा कोहली

“सबूत, अपराध की गंभीरता या सामाजिक प्रभाव” पर विचार न करने पर निचली अदालत द्वारा दी गई जमानत को उच्च न्यायालय द्वारा रद्द किया जा सकता है

भले ही निचली अदालत द्वारा दी गई जमानत को रद्द करते समय उच्च न्यायालय द्वारा महत्वपूर्ण जांच की जानी चाहिए, वह कि जा सकती हैं

वास्तव में, यह एक सुस्थापित सिद्धांत है कि एक बार जमानत मिल जाने के बाद इसे रद्द करने के लिए भारी परिस्थितियों की आवश्यकता होगी। 

इस न्यायालय ने विपन कुमार धीर बनाम पंजाब राज्य और अन्य में अपने फैसले को दोहराया

परंपरागत रूप से निष्पक्ष सुनवाई में बाधा डालने वाली कुछ पर्यवेक्षण परिस्थितियों को एक आरोपी को जमानत देने के बाद विकसित होना चाहिए

🔘 जमानत के लिए एक आवेदन पर विचार करते समय निम्नलिखित कारकों को ध्यान में रखा जाना चाहिए

(i) क्या यह मानने का कोई प्रथम दृष्टया या युक्तियुक्त आधार है कि अभियुक्त ने अपराध किया है; 
(ii) आरोप की प्रकृति और गंभीरता; 
(iii) दोषसिद्धि की स्थिति में सजा की गंभीरता; 
(iv) जमानत पर रिहा होने पर आरोपी के फरार होने या भागने का खतरा; 
(v) आरोपी का चरित्र, व्यवहार, साधन और स्थिति; 
(vi) अपराध के दोहराए जाने की संभावना; 
(vii) गवाहों के प्रभावित होने की उचित आशंका; और
(viii) निश्चित रूप से, जमानत मिलने से न्याय के विफल होने का खतरा

राम चंदर बनाम छत्तीसगढ़ राज्य और अन्य
Writ Petition (Crl) No 49 of 2022
बेंच – न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस

Code of Criminal Procedure, 1973

कोई भी अदालत दोषियों को सजा में छूट देने की सरकार की शक्ति को नहीं छीन सकती

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 432 के तहत दी गई छूट मनमानी थी या नहीं,

इस संबंध में अदालत केवल सरकार के निर्णय की समीक्षा कर सकती है

ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि निर्णय प्रकृति में मनमाना है या नहीं। अदालत सरकार को अपने फैसले पर पुनर्विचार करने का निर्देश देने का अधिकार रखती है जहां कार्यपालिका द्वारा शक्ति का प्रयोग मनमाना पाया जाता है, अधिकारियों को निर्देशित किया जा सकता है दोषी के मामले पर नए सिरे से विचार लिया जाये

🔘 निम्नलिखित कारक हैं जिन पर छूट के अनुदान के लिए विचार करने की आवश्यकता होती है

➡ हरियाणा राज्य बनाम जगदीश (2010)
▶ क्या अपराध बड़े पैमाने पर समाज को प्रभावित करता है
▶ इसके दोहराए जाने की संभावना
▶ अपराधी के भविष्य में अपराध करने की क्षमता
▶ क्या दोषी को कारागार में रखकर किसी प्रयोजन की पूर्ति हो रही है
▶ दोषी के परिवार की सामाजिक-आर्थिक स्थिति

अनुज सिंह @ रामानुज सिंह @ सेठ सिंह बनाम बिहार सरकार
CRIMINAL APPEAL NO. 150 OF 2020
बेंच – सीजेआई एनवी रमना, जस्टिस कृष्ण मुरारी और जस्टिस हिमा कोहली

एक आपराधिक मुकदमे में एक गवाह की गवाही को केवल मामूली विरोधाभासों या चूक के कारण खारिज नहीं किया जा सकता है ,

प्रत्येक व्यक्ति की देखने की शक्ति भिन्न होती है। समय बीतने के साथ साक्षी कुछ विवरण भूल सकते हैं। यह स्मृति चूक का एक वास्तविक मामला हो सकता है। इन कारकों से अदालत में अभियोजन पक्ष का मामला नहीं बिगड़ना चाहिए

केवल तथ्यात्मक विवरणों में विरोधाभास गवाहों की गवाही को अविश्वसनीय बनाने का आधार हो सकता है, न कि मामूली विरोधाभास

🔘 गवाह वह व्यक्ति होता है जो किसी कार्य या कृत्यों की श्रृंखला या घटित होने वाले दृश्य को देखता है। साक्षी कोई भी व्यक्ति हो सकता है जो किसी तथ्य को अपनी इंद्रियों के माध्यम से बोध करके की क्षमता रखता है। एक सक्षम गवाह अपनी आंखों या कानों से या गंध या सनसनी या स्पर्श या किसी अन्य उचित तरीके से किसी भी कार्य का बोध कर सकता है।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 118 के अनुसार , एक सक्षम गवाह वह होता है जिसके पास अदालत द्वारा पूछे गए प्रश्नों को समझने की क्षमता होती है। यदि उसके पास प्रश्नों की समझ है और तर्कसंगत उत्तर देने की क्षमता है, तो वह एक सक्षम गवाह है।

महत्वपूर्ण प्रकार के गवाह हैं:

• इच्छुक गवाह
• मौका गवाह
• स्टॉक गवाह
• चश्मदीद गवाह
• आधिकारिक गवाह
• संबंधित गवाह

📑 21 APRIL 2022

देवेंद्र सिंह और अन्य बनाम उत्तराखंड राज्य
CRIMINAL APPEAL NO.383 OF 2018
बेंच – मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना, न्यायमूर्ति एएस बोपन्ना और हिमा कोहली

आईपीसी की धारा 304बी के तहत ‘मृत्यु से ठीक पहले’ का अर्थ है मृत्यु से “लगभग पहले” Proximate

तत्काल नहीं” Not immediate

🔴 बेंच ने राय दी “जहां तक ‘उसकी मृत्यु से ठीक पहले’ वाक्यांश का संबंध है, यह अच्छी तरह से तय है कि उसी की व्याख्या की जानी चाहिए जिसका अर्थ निकट और साथ जुड़ा होना चाहिए, लेकिन मृत्यु से तुरंत पहले इसका मतलब नहीं समझा जाना चाहिए। 

🔴 साक्ष्य और मामले के अन्य पहलुओं को ध्यान में रखते हुए तत्काल मामले में यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि मौत जो सामान्य परिस्थितियों में नहीं हुई थी, शादी की तारीख से सिर्फ 6 महीने के भीतर हुई थी।

🔵 भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 113 बी के साथ पढ़ी गई धारा 304 बी आईपीसी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि एक बार अभियोजन पक्ष यह प्रदर्शित करने में सफल रहा है कि दहेज की किसी भी मांग के संबंध में या उसके तुरंत बाद एक महिला के साथ क्रूरता या उत्पीड़न किया गया है। मृत्यु के मामले में, उक्त व्यक्तियों के खिलाफ एक अनुमान लगाया जाएगा कि उन्होंने आईपीसी की धारा 304 बी के तहत दहेज की मौत का कारण बना दिया है।

🔵 अदालत ने कहा कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 113 ए द्वारा बनाई गई धारणा को आरोपी द्वारा खंडन किया जा सकता है, अगर वह सफलतापूर्वक साबित कर देता है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 304 बी की उपरोक्त सामग्री पूरी नहीं हुई है।

📑 19 APRIL 2022

केसी लक्ष्मण बनाम केसी चंद्रप्पा गौड़ा
CIVIL APPEAL NO. 2582 OF 2010
बेंच – जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर और जस्टिस कृष्ण मुरारी

एक हिंदू पिता या हिंदू अविभाजित परिवार के किसी भी प्रबंध सदस्य को “पैतृक संपत्ति का उपहार”

केवल ”पवित्र उद्देश्य” के लिए देने की शक्ति है जो धर्मार्थ या धार्मिक उद्देश्य के लिए एक उपहार है

 ”प्यार और स्नेह से निष्पादित पैतृक संपत्ति के संबंध में उपहार का एक विलेख” “पवित्र उद्देश्य शब्द के दायरे में नहीं आता”

अर्थात हिंदू अविभाजित परिवार की पैतृक संपत्ति केवल पवित्र उद्देश्य के लिए उपहार मे दी जा सकती है न कि प्यार, स्नेह से

🔴 लिमिटेशन एक्ट, 1963 के अनुच्छेद 109 में ‘हस्तांतरण’ शब्द में ‘उपहार’ भी शामिल है।

🔴 हिंदू अविभाजित परिवार – संयुक्त परिवार संपत्ति केवल तीन स्थितियों में हस्तांतरित

▶ (i) कानूनी आवश्यकता
▶ (ii) संपत्ति के लाभ के लिए और
▶ (iii) परिवार के सभी सहदायिकों की सहमति से

⏩ जहां एक हस्तांतरण सभी सहदायिकों की सहमति से नहीं किया गया है, यह उन सहदायिकों के कहने पर शून्यकरणीय होगा जिनकी सहमति प्राप्त नहीं की गई है

📑 18 APRIL 2022

जगजीत सिंह और अन्य बनाम आशीष मिश्रा @ मोनू और अन्य
CRIMINAL APPEAL NO.632 of 2022 [Arising out of Special Leave Petition (Crl.) No. 2640 of 2022]
बेंच – मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस हिमा कोहली

दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 2 (wa) के तहत परिभाषित एक ‘पीड़ित’ को अपराध होने के बाद जांच से लेकर अपील/पुनरीक्षण के मुकदमे की परिणति तक हर चरण में सुनवाई का अधिकार

जिसमें आरोपी की जमानत अर्जी पर फैसला सुनाने का चरण भी शामिल

अगर बरी करने के खिलाफ अपील दायर करने का अधिकार, जमानत आवेदन पर निर्णय लेने के समय सुनवाई के अधिकार के साथ नहीं है, तो इसका परिणाम न्याय का गंभीर पतन

🔴 दंड प्रक्रिया संहिता (संशोधन) अधिनियम, 2008 को लागू किया गया, जो धारा 2 (wa) के तहत ‘पीड़ित’ को परिभाषित करता है –

” का अर्थ उस व्यक्ति से है जिसे उस कार्य या चूक के कारण कोई नुकसान या चोट लगी है जिसके लिए आरोपी व्यक्ति पर आरोप लगाया गया है और अभिव्यक्ति “पीड़ित” में उसका अभिभावक या कानूनी उत्तराधिकारी शामिल है।”

📑 13 APRIL 2022

कामाची बनाम लक्ष्मी नारायणन
Case Number: CRA 627/2022
बेंच – जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस पीएस नरसिम्हा

क्या एक साल बाद भी घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 में आवेदन दायर किया जा सकता है ?

सीआरपीसी की धारा 468 के तहत प्रदान की गई परिसीमा अवधि घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 12 के तहत एक आवेदन दाखिल करने पर लागू नहीं

• डीवी अधिनियम की धारा 12 के तहत एक आवेदन को अपराध के संबंध में एक आवेदन के रूप में नहीं माना जा सकता

• घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत किए गए अपराध की परिसीमा के लिए आवेदन की तारीख से परिसीमा के लिए कोई शुरुआती बिंदु नहीं होगा । शुरुआती बिंदु तभी उठेगा जब अधिनियम की धारा 12 के तहत पारित आदेश का उल्लंघन होगा

💡 डीवी अधिनियम की धारा 12 एक पीड़ित महिला या एक संरक्षण अधिकारी को मजिस्ट्रेट के समक्ष एक आवेदन दायर करने की अनुमति देती है जिसमें विभिन्न प्रकार की राहत जैसे सुरक्षा आदेश या मुआवजे के भुगतान के आदेश की मांग की जाती है।

💡 दूसरी ओर सीआरपीसी की धारा 468, अपराधों का संज्ञान लेने के लिए सीमा की अवधि निर्धारित करती है, जो अपराध के लिए प्रदान की गई सजा पर निर्भर करती है। 

🔴 इस मामले में ससुराल छोड़ने के करीब 10 साल बाद एक महिला ने डीवी एक्ट की धारा 12 के तहत एक आवेदन दायर किया था। मद्रास उच्च न्यायालय ने धारा 468 सीआरपीसी के तहत कार्यवाही को समयबद्ध बताते हुए रद्द कर दिया था।

🔴 HC ने देखा था कि डीवी अधिनियम की धारा 28 और 32 को डीवी नियमों के नियम 15 (6) के साथ मिलाकर सीआरपीसी के प्रावधान लागू होंगे। 

📑 12 APRIL 2022

शंकरलाल नदानी बनाम सोहनलाल जैन
CIVIL APPEAL NO. 2816 OF 2022
(ARISING OUT OF SLP (CIVIL) NO. 2455 OF 2022)
बेंच – न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता और न्यायमूर्ति वी. रामसुब्रमण्यम

Rajasthan Rent Control Act 2001 – सिविल कोर्ट के पास अधिनियम की प्रयोज्यता से पहले स्थापित मामलों को तय करने का अधिकार क्षेत्र है

राजस्थान किराया नियंत्रण अधिनियम की प्रयोज्यता से पहले दीवानी अदालत के समक्ष दायर किए गए कब्जे के मुकदमे में पारित एक डिक्री वैध और निष्पादन योग्य है।

राजस्थान किराया नियंत्रण अधिनियम, 2001 कि धारा 18 केवल उस तारीख से दीवानी अदालत के अधिकार क्षेत्र को प्रतिबंधित करती है, जिस दिन से यह अधिनियम लागू हुआ था

अधिनियम के लागू होने से पहले दीवानी अदालत के समक्ष दायर एक मुकदमे का फैसला दीवानी अदालत द्वारा किया जाना है।

💡 दीवानी वाद – पक्षकारों के अधिकारों का निर्धारण उस तारीख को किया जाता है जब मुकदमा शुरू होता है वाद दायर करने की तारीख पर। वादी उस दिन डिक्री का हकदार है जब उसने कार्यवाही शुरू की थी, इसलिए, उक्त दिन के अनुसार पक्षों के अधिकारों की जांच की जानी चाहिए।

📑 11 APRIL 2022

रामसुब्बम्मा बनाम वी. विजयलक्ष्मी और अन्य
CIVIL APPEAL NO. 2095 OF 2022
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस बीवी नागरत्ना

विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 [ विनिर्दिष्ट पालन के लिए वाद ]

यदि विक्रेता बिक्री समझौते के निष्पादन और प्रतिफल के भुगतान को स्वीकार करता है, तो विक्रेता को बिक्री समझौते के विशिष्ट प्रदर्शन के लिए दावे में कुछ भी स्थापित करने की आवश्यकता नहीं

📑 08 APRIL 2022

राजस्थान राज्य बनाम बनवारी लाल
SPECIAL LEAVE PETITION (CRIMINAL) Diary No. 21596/2020
बेंच – कोरम: जस्टिस एमआर शाह और बीवी नागरत्ना

केवल इसलिए कि अपील पर फैसला होने तक एक लंबी अवधि बीत चुकी है,

यह अनुपातहीन और अपर्याप्त सजा देने का आधार नहीं हो सकता 

हम शॉर्टकट अपनाकर आपराधिक अपीलों के निपटारे की इस तरह की प्रथा की निंदा करते है

🔴 इस मामले में, राजस्थान हाईकोर्ट ने धारा 307 आईपीसी के तहत अपराध के लिए आरोपी की सजा को बिना कोई कारण बताए गलत तरीके से निचली अदालत द्वारा सुनाई गई तीन साल की जेल की अवधि को घटाकर (44 दिन) कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हो सकता है कि हाई कोर्ट ने नरम रुख अपनाया हो क्योंकि ट्रायल की कार्यवाही 24 साल तक चली थी लेकिन यह कम सजा का आधार नहीं हो सकता।

🔴 धारा 307 आईपीसी के तहत कोई न्यूनतम सजा नहीं है, पीठ ने कहा कि विवेक का प्रयोग विवेकपूर्ण तरीके से किया जाना चाहिए और सजा को आनुपातिक रूप से लगाया जाना चाहिए और अपराध की प्रकृति और गंभीरता को देखते हुए और सजा लागू करने के सिद्धांतों पर विचार करना चाहिए।

🔴 आरोपी ने जानलेवा चोट की थी जो मौत का कारण बनने के लिए पर्याप्त थी और निचली अदालत ने तीन साल की जेल की सजा देने में नरम रुख अपनाया था जिसमें उच्च न्यायालय को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए था ।

🔴 हमारे पास विभिन्न उच्च न्यायालयों के कई निर्णय सामने आए हैं और यह पाया गया है कि कई मामलों में आपराधिक अपीलों का निपटारा सरसरी तौर पर और छंटे हुए तरीकों को अपनाकर किया जाता है । कुछ मामलों में 302 आईपीसी ( हत्या ) के तहत दोषसिद्धि को धारा 304 भाग । या धारा 304 भाग ।। के आईपीसी में परिवर्तित कर दिया जाता है , बिना कोई पर्याप्त कारण बताए और केवल अभियुक्तों की ओर से प्रस्तुतियाँ दर्ज की जाती हैं कि उनकी सजा को बदला जा सकता है

📑 07 APRIL 2022

ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड और अन्य बनाम रवींद्र कुमार भारती
CIVIL APPEAL NO.2794 OF 2022
(Arising out of SLP (C) No.12061/2021)
बेंच – जस्टिस केएम जोसेफ और जस्टिस हृषिकेश रॉय

आदेश 41 नियम 33 सीपीसी – अपीलीय न्यायालयों को दी गई असाधारण शक्ति “दुर्लभ क्षेत्राधिकार”

आदेश 41 नियम 33 निस्संदेह एक असाधारण शक्ति के साथ अपीलीय अदालत को तैयार करता है, जो एक दुर्लभ अधिकार क्षेत्र है।

यह किसी मामले के विशेष तथ्यों में न्याय तक पहुंचना है। यह पूरे बोर्ड में सभी अपीलों में लागू होने वाला सामान्य नियम नहीं

🔴 सीपीसी का आदेश 41 नियम 33 इस तथ्य की परवाह किए बिना कि अपील केवल डिक्री के एक हिस्से के संबंध में है या अपील केवल कुछ पक्षकारों द्वारा दायर की गई है, किसी मामले में उचित आदेश पारित करने के लिए अपील की अदालत की शक्ति से संबंधित है।

🔴 सामान्य शब्दों में अपीलीय न्यायालय अपील के दायरे की परवाह किए बिना एक आदेश पारित कर सकता है जैसा कि वह उचित समझे।

📑 04 APRIL 2022

यूनियन ऑफ इंडिया बनाम मेजर आर मेट्री
CRIMINAL APPEAL NOS. 537­538 OF 2018
बेंच – न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति बी आर गवई

न्यायिकेतर स्वीकारोक्ति साक्ष्य का कमजोर टुकड़ा

जब तक इस तरह के एक स्वीकारोक्ति को स्वैच्छिक, भरोसेमंद और विश्वसनीय नहीं पाया जाता है,

तब तक केवल उसी के आधार पर दोषसिद्धि, बिना पुष्टि के, उचित नहीं होगी

किसी व्यक्ति को न्यायिकेतर स्वीकारोक्ति देने के लिए मजबूर किया गया था या नहीं, यह प्रत्येक मामले में तथ्य का प्रश्न

📑 01 APRIL 2022

यूपी राज्य बनाम सुभाष @ पप्पू
CRIMINAL APPEAL NO. 436 OF 2022
बेंच – न्यायमूर्ति एमआर शाह और न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना

केवल भाषा या कथन या आरोप के रूप में “दोष”

दोषसिद्धि को अस्थिर नहीं करेगा, बशर्ते कि आरोपी पूर्वाग्रह से ग्रस्त न हो

एक प्रसिद्ध सिद्धांत को दोहराया गया यदि धारा की सामग्री स्पष्ट रूप से लगाए गए आरोपों में निहित है, तो इस तथ्य के बावजूद कि धारा का चार्जशीट में जिक्र नहीं दोषसिद्धि को अस्थिर नहीं करेगा 

यदि धारा के अवयव स्पष्ट या आरोप में निहित हैं तो उसके संबंध में दोषसिद्धि कायम रखी जा सकती है, इस तथ्य के बावजूद कि उक्त धारा का उल्लेख नहीं किया गया है

🔴 यह सिद्धांत सीआरपीसी की तीन धाराओं: धारा 215, 221(2), 464 में निर्धारित किया गया है। 

• सीआरपीसी की धारा 221(2) में कहा गया है कि यदि आरोपी पर एक अपराध का आरोप लगाया जाता है, और रिकॉर्ड में रखे गए सबूतों से यह स्पष्ट रूप से प्रकट होता है कि वह किसी अन्य अपराध का दोषी था, तो उसे इस तरह के अंतिम उल्लिखित अपराध के लिए दोषी ठहराया जा सकता है, यद्यपि उसके लिए उस पर विशेष रुप् से आरोप नहीं लगाया गया हो

• सीआरपीसी की धारा 215 में प्रावधान है कि अपराध या विवरण जो आरोप में बताए जाने की आवश्यकता है, को बताते हुए किसी भी त्रुटि या चूक को कार्यवाही के किसी भी चरण में सामग्री के रूप में नहीं माना जाएगा, जब तक कि यह नहीं दिखाया जाता है कि आरोपी को इस तरह से गुमराह किया गया था। त्रुटि या चूक से न्याय की विफलता हुई है। 

• इसी तरह, सीआरपीसी की धारा 464 भी सक्षम अधिकार क्षेत्र के न्यायालय के किसी भी निष्कर्ष, सजा या आदेश को केवल इस आधार पर अमान्य घोषित न किया जाएगा कि कोई आरोप तय नहीं किया गया था, या आरोप तय करने में कोई त्रुटि, चूक या अनियमितता थी, जब तक कि इसके परिणामस्वरूप न्याय का गर्भपात न हो जाए।

• आरोप तय करने में चूक की स्थिति में, अपील, पुष्टिकरण या पुनरीक्षण न्यायालय आदेश दे सकता है कि मुकदमा आरोप तय करने के चरण से शुरू होगा, और आरोप तय करने में किसी त्रुटि, चूक या अनियमितता के मामले में, न्यायालय नए आरोप पर नए परीक्षण का आदेश दे सकता है

📑 31 MARCH 2022

पट्टाली मक्कल काची बनाम ए मयिलरुम्परुमल
Civil Appeal No. 2600 of 2022
(@ SLP (Civil) No.19574 of 2021)
बेंच – जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस बीआर गवई

जाति पिछड़े वर्गों की पहचान के लिए शुरुआती बिंदु हो सकती है,

लेकिन आरक्षण देने के लिए पिछड़ेपन का फैसला करने का एकमात्र आधार नहीं हो सकती है।

🔴 सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु में वन्नियारों को दिए 10.5 प्रतिशत आरक्षण को रद्द कर दिया है। वन्नियारों को दिए 10.5 प्रतिशत आरक्षण को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने वन्नियार आरक्षण अधिनियम 2021 को असंवैधानिक बताया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमारा मत है कि वन्नियार को दूसरों की तुलना में एक अलग समूह के रूप में मानने का कोई आधार नहीं है। यह आरक्षण संविधान के अनुच्छेद 14,15 और 16 के तहत समानता के अधिकार; धर्म, जाति, वर्ण, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव; सार्वजनिक रोजगार के मामलों में अवसर की समानता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

📑 28 MARCH 2022

मफत लाल बनाम राजस्थान राज्य
केस नंबर: CRIMINAL APPEAL NO(s).592 OF 2022
बेंच – न्यायमूर्ति एस अब्दुल नज़ीर और न्यायमूर्ति विक्रम नाथ 

भाग कर शादी करने के मामलों में कब धारा 366 IPC के तहत मामला बनेगा ?

आईपीसी की धारा 366 का अपराध तभी आकर्षित होगा, जब किसी महिला को जबरन शादी के लिए उकसाया/अपहरण किया गया हो।

एक बार अपहरणकर्ता के यह कहने के बाद कि वह अपहरणकर्ता से प्यार करती थी और उसने परेशान परिस्थितियों के कारण अपना घर छोड़ दिया, ऐसा अपराध नहीं किया जाएगा

कोर्ट ने आगे कहा कि यदि अठारह वर्ष से कम उम्र की किसी भी नाबालिग को बहला-फुसलाकर ले जाया जाता है और उससे शादी की जाती है तो यह आईपीसी की धारा 363 के तहत अपराध होगा।

आईपीसी की धारा 366 केवल तभी लागू होगी जब शादी ज़बरदस्ती, अपहरण द्वारा या महिला को उकसाकर की जाए

📑 24 MARCH 2022

एस सेंथिल कुमार बनाम तमिलनाडु राज्य
Petition for Special Leave to Appeal (Crl.) No. 2693/2022
बेंच – न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस 

गिरफ्तारी पूर्व जमानत ( अग्रिम जमानत ) के लिए आवेदन को खारिज करते समय

कोर्ट द्वारा ऐसा कोई अनिवार्य आदेश या निर्देश जारी नहीं किया जाना चाहिए कि आरोपी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाए

इस तरह के एक पहलू को जांच एजेंसी पर छोड़ने की आवश्यकता है, और ऐसे कदम उठाने की आवश्यकता है जो कानून में अनुमत हैं और आवश्यक

सरताज खान बनाम उत्तराखंड राज्य
CrA 852 OF 2018
बेंच – जस्टिस उदय उमेश ललित, जस्टिस एस रवींद्र भट, जस्टिस पी श्री नरसिम्हा

धारा 188 CrPC वहाँ लागू नहीं होगी जहा अपराध का कुछ हिस्सा भारत में किया गया हो

यह प्रावधान तब ही लागू होता है जब संपूर्ण अपराध भारत के बाहर किया जाता है

और मंजूरी प्रदान करने से ऐसे अपराध की भारत में जांच या ट्रायल किया जा सकेगा

🔴 धारा 188 का विवरण

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में धारा 188 के अन्तर्गत जब कोई अपराध भारत से बाहर किसी नागरिक द्वारा चाहे खुले समुद्र पर या अन्यत्र, अथवा किसी व्यक्ति द्वारा, जो भारत का नागरिक नहीं है, भारत में रजिस्ट्रीकृत किसी पोत या विमान पर, किया जाता है तब उस अपराध के बारे में उसके विरुद्ध ऐसे कार्यवाही की जा सकती है मानो वह अपराध भारत के अन्दर उस स्थान में किया गया है। यह धारा 188 भारत से बाहर किये गये अपराधों पर होने वाले प्रक्रिया को बताता है।

📑 23 MARCH 2022

प्रेमलता @ सुनीता बनाम नसीब बी और अन्यl
CIVIL APPEAL NOS.2055-2056 OF 2022
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और बीवी नागरत्ना

पार्टियों या वादियों  को दो अलग-अलग अदालतों/प्राधिकारियों के सामने विरोधाभासी रुख अपनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती

यदि किसी भी पक्ष के विरोधाभासी रुख की अनुमति दी जाती है, तो दूसरे पक्ष को उपचारहीन बना दिया जाएगा

📑 16 MARCH 2022

नाहर सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
CRIMINAL APPEAL NO. 443 OF 2022
कोरम – जस्टिस विनीत सरन और जस्टिस अनिरुद्ध बोस

क्या एक न्यायाधीश जिसने सीआरपीसी, 1973 की धारा 190 (1) (बी) के तहत पुलिस रिपोर्ट के आधार पर अपराध का संज्ञान लिया है,

वह किसी ऐसे व्यक्ति को समन जारी कर सकता है जिसे पुलिस रिपोर्ट में अपराधी के रूप में नामित नहीं किया गया है।

दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 190 (1) (बी) के तहत पुलिस रिपोर्ट के आधार पर किसी अपराध का संज्ञान लेते हुए मजिस्ट्रेट किसी भी ऐसे व्यक्ति को समन जारी कर सकता है जिस पर पुलिस रिपोर्ट या एफआईआर में आरोप नहीं लगाया गया है।

किसी अपराध का संज्ञान लेने पर व्यक्तियों को बुलाने के लिए, मजिस्ट्रेट को अपने सामने उपलब्ध सामग्री की जांच करनी होती है ताकि इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि पुलिस द्वारा बताए गए लोगों के अलावा कुछ अन्य व्यक्ति भी अपराध में शामिल हैं। इन सामग्रियों को पुलिस रिपोर्ट, चार्जशीट या एफआईआर तक ही सीमित रखने की आवश्यकता नहीं है।

📑 14 MARCH 2022

विश्वनाथ बानिक बनाम सुलंगा बोस
CIVIL APPEAL NO. 1848 OF 2022
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस बीवी नागरत्ना

आदेश VII नियम 11 सीपीसी के तहत एक वाद की अस्वीकृति के लिए एक आवेदन पर विचार करते कोर्ट को

वाद में किए गए सभी कथनों का अध्ययन करना चाहिए और केवल कुछ पंक्तियों के आधार पर निर्णय नहीं लेना चाहिए।

केवल उस मामले में जहां यह देखा जाता है कि

वाद परिसीमा द्वारा वर्जित है, तब और उसके बाद ही

एक वादपत्र को खारिज किया जा सकता है

वादपत्र को आंशिक रूप से खारिज नहीं किया जा सकता है।

मनोरमा नाइक बनाम ओडिशा राज्य और अन्य।
(आपराधिक अपील संख्या 423/2022)
बेंच – न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति बेला एम. त्रिवेदी 

हस्तलेख विशेषज्ञ की राय किसी व्यक्ति के हस्ताक्षर और हस्तलेखन को साबित करने का एकमात्र तरीका नहीं

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 45, 47 और 73 के तहत भी व्यक्ति के हस्ताक्षर और लिखावट को साबित किया जा सकता है

🔴 साक्ष्य अधिनियम की धारा 45 के अनुसार, जब न्यायालय को हस्तलेखन की पहचान आदि जैसे किसी विषय पर राय बनाने की आवश्यकता होती है, तो ऐसी चीजों में विशेष रूप से पारंगत व्यक्तियों की राय प्रासंगिक होती है।

🔴 धारा 47 में कहा गया है कि जब न्यायालय को इस बारे में एक राय विकसित करनी चाहिए कि दस्तावेज़ किसने लिखा या हस्ताक्षरित किया है, तो उस व्यक्ति की हस्तलेखन से परिचित किसी व्यक्ति की राय जिसके द्वारा यह लिखा या हस्ताक्षरित होने का आरोप लगाया गया है कि यह लिखा गया था या नहीं लिखा गया था या उस व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षरित एक प्रासंगिक तथ्य है।

🔴 धारा 73 में प्रावधान है कि, यह निर्धारित करने के लिए कि क्या हस्ताक्षर, लेखन, या मुहर उस व्यक्ति का है जिसके द्वारा यह लिखा या बनाया गया है, कोई हस्ताक्षर, लेखन, या मुहर अदालत में स्वीकार की गई है या साबित हुई है। उस व्यक्ति द्वारा लिखा या बनाया गया है, उसकी तुलना साबित किए जाने वाले से की जा सकती है, भले ही उस हस्ताक्षर, लेखन, या मुहर को किसी अन्य उद्देश्य के लिए प्रस्तुत या साबित नहीं किया गया हो। उस मामले में, न्यायालय न्यायालय में उपस्थित किसी भी व्यक्ति को इस प्रकार लिखे गए शब्दों या अंकों की तुलना किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा कथित रूप से लिखे गए शब्दों या अंकों से करने के उद्देश्य से कोई भी शब्द या संख्या लिखने का निर्देश दे सकता है।

📑 10 MARCH 2022

एसके नौशाद रहमान और अन्य बनाम भारत संघ
Civil Appeal No. 1243 of 2022
बेंच – जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, सूर्यकांत और विक्रम नाथ

राज्य बुनियादी संवैधानिक मूल्यों से बेखबर नहीं हो सकता है ,

जिसमें पारिवारिक जीवन का संरक्षण भी शामिल है। जो अनुच्छेद 21 का एक पहलू है । 

किसी कर्मचारी को पोस्टिंग या ट्रांसफर का कोई मौलिक अधिकार नहीं है। 

फिर भी राज्य को नीति बनाते समय ‘ पारिवारिक जीवन ‘ पर विचार करना चाहिए | व्यक्तियों की निजता, गरिमा और पारिवारिक जीवन के अधिकारों में राज्य का हस्तक्षेप आनुपातिक होना चाहिए।

पति-पत्नी की पोस्टिंग के लिए जो प्रावधान किया गया है, वह मूल रूप से महिलाओं के लिए विशेष प्रावधानों को अपनाने की आवश्यकता पर आधारित है, जिन्हें संविधान के अनुच्छेद 15 (3) द्वारा मान्यता प्राप्त है

अजय कुमार राठी बनाम सीमा राठी
Civil Appeal No.5141/2011
बेंच – जस्टिस संजय किशन कौल और एमएम सुंदरेश

[ Divorce Matter ]

अगर बेटी की आयु 18 साल के करीब है और वह अपने पिता के साथ कोई संबंध नहीं रखना चाहती तो उसकी शिक्षा और विवाह के मद में होने वाले खर्च के लिये पिता से धन की मांग नहीं कर सकती है.

वह अपना रास्ता खुद चुनने की हकदार

सुप्रीम कोर्ट ने पति और पत्नी बीच तलाक के एक मामले की सुनवाई करते हुये यह निर्णय दिया

साथ ही, कोर्ट ने कहा कि पिता द्वारा मां को स्थायी गुजारा भत्ता के रूप में भुगतान की जाने वाली राशि का निर्धारण करते समय,

अगर मां अपनी बेटी के खर्चों का भुगतान करने का विकल्प चुनती है, तो कोर्ट यह सुनिश्चित करेगा कि बेटी को समर्थन देने के लिए मां के पास पर्याप्त धन उपलब्ध हो (यदि मां ऐसा चाहती है)

📑 09 MARCH 2022

[मध्य प्रदेश राज्य बनाम रामजी लाल शर्मा और अन्य]
CRIMINAL APPEAL NO. 293 OF 2022
बेंच – न्यायमूर्ति एमआर शाह और न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना

IPC 1860 SEC 34 [ COMMON INTENTION ]

एक बार जब यह साबित हो गया और अभियोजन पक्ष ने यह साबित कर दिया है कि

सभी आरोपी घटना के स्थान पर मृतक को मारने के लिए एक सामान्य इरादे से एकत्रित हुए थे

और इस तरह उन्होंने सामान्य इरादा साझा किया, तो उस मामले में इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि

सामान्य इरादे को साझा करने वाले किसी भी आरोपी ने किसी हथियार का इस्तेमाल किया था या नहीं या उनमें से किसी ने मृतक को कोई चोट पहुंचाई या नहीं

🔴 सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें संदेह का लाभ देते हुए और यह देखते हुए कि नेत्र और चिकित्सा साक्ष्य में विरोधाभास था, और इसलिए आरोपी की उपस्थिति ही संदिग्ध थी, उच्च न्यायालय ने दो आरोपियों की दोषसिद्धि को रद्द कर दिया था।

देवदासन बनाम द्वितीय श्रेणी के कार्यकारी मजिस्ट्रेट,रामनाथपुरम और अन्य
CRIMINAL APPEAL NO. 388 OF 2022
(ARISING OUT OF SLP (CRL.) NO. 8438 OF 2021)
बेंच: जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जेके माहेश्वरी

आपराधिक प्रक्रिया संहिता, धारा 122, आदतन अपराधी, सुरक्षा, अच्छा व्यवहार, संदिग्ध
[सीआरपीसी की धारा 122]  

एक कार्यकारी मजिस्ट्रेट जो संदिग्ध व्यक्तियों और आदतन अपराधियों से अच्छे व्यवहार के लिए प्रतिभूति लेना चाहता है,

उसके पास सीआरपीसी की धारा 109 और 110 के तहत शक्तियां हैं।

प्रतिभूति के लिए सीआरपीसी की धारा 111 और 117 के तहत आदेश जारी करने के लिए, शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि

ऐसे आदेशों के उल्लंघन पर, धारा 122 सीआरपीसी के तहत निर्दिष्ट सहारे की अनुमति

धारा 122 के अनुसार यदि किसी व्यक्ति को धारा 106 या धारा 117 के तहत प्रतिभूति देने का आदेश दिया जाता है और वह उस तारीख को या उससे पहले ऐसी सुरक्षा नहीं देता है, जिस अवधि के लिए ऐसी सुरक्षा दी जानी है,

उसे जेल में रखा जा सकता है या हिरासत में लिया जा सकता है।

📑 07 MARCH 2022

येरुवा सायरेड्डी वी. बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य
CRIMINAL APPEAL NO.233 OF 2016
बेंच – जस्टिस विनीत सरन और अनिरुद्ध बोस

मृतक अपीलकर्ता (दोषी) की ओर से अदालत द्वारा नियुक्त एक “न्याय मित्र” ( Amicus Curiae ) के रूप में पेश होने वाले वकील को

धारा 394 दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के प्रावधान के तहत उसके “निकट संबंधी” के रूप में नहीं माना जा सकता है।

सीआरपीसी की धारा 394 के अनुसार अपीलकर्ता/दोषी की मृत्यु होने पर अपील समाप्त की जाती है। 

हालाँकि, धारा के परंतुक में इस आशय का अपवाद है कि कोई निकट संबंधी, अपीलकर्ता/दोषी की मृत्यु के 30 दिनों के भीतर, अपील जारी रखने की अनुमति के लिए अपीलीय न्यायालय में आवेदन कर सकता है।

उक्त परंतुक की व्याख्या ‘निकट संबंधी’ को परिभाषित करती है जिसका अर्थ “माता-पिता, पति या पत्नी, वंशज, भाई या बहन” से है।

• कौन होता है न्याय मित्र (Amicus Curiae)

एक ऐसा व्यक्ति या संगठन है जो किसी कानूनी मामले में पक्षकार नहीं है , लेकिन जिसे मामले में मुद्दों पर असर डालने वाली जानकारी , विशेषज्ञता या अंतर्दृष्टि प्रदान करके अदालत की सहायता करने की अनुमति है । एक न्याय मित्र पर विचार करने का निर्णय न्यायालय के विवेक के अंतर्गत आता है ।

नीतू सिंह व अन्य
CRIMINAL APPEAL NO. OF 2022 (ARISING OUT OF SLP (Crl.) NO.783 OF 2020)
बेंच – न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति बेला एम. त्रिवेदी

क्या किराए का भुगतान न करना अपराध है ?

“किराए का भुगतान करने में विफलता के परिणामस्वरूप दीवानी ( Civil ) परिणाम हो सकते हैं,

लेकिन यह भारतीय दंड संहिता के तहत दंडनीय अपराध नहीं है”

भले ही हम शिकायत में किए गए तथ्यात्मक दावों को स्वीकार करते हैं, जिसे प्राथमिक सूचना रिपोर्ट के रूप में दर्ज किया गया था, हमारा मानना ​​है कि कोई आपराधिक अपराध स्थापित नहीं हुआ है। 

शीर्ष अदालत इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दायर अपील पर विचार कर रही थी, जिसमें आईपीसी की धारा-415 (धोखाधड़ी) और धारा-403 (संपत्ति का बेईमानी से दुरुपयोग) के तहत वर्तमान अपीलकर्ता के खिलाफ प्राथमिकी रद्द करने से इनकार कर दिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने यह देखते हुए कि अपीलकर्ताओं (किरायेदार) से भारी बकाया वसूला जाना है, शीर्ष अदालत ने प्रतिवादियों को उपलब्ध दीवानी उपचारों का सहारा लेने की छूट दी है।

📑 03 MARCH 2022

पाधियार प्रह्लादजी चेनाजी (डी) बनाम मणिबेन जगमलभाई (डी)
CIVIL APPEAL NO . 1382 OF 2022
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस बीवी नागरत्ना

वादी द्वारा स्थायी निषेधाज्ञा के लिए वाद असली मालिक के खिलाफ सुनवाई योग्य नहीं होगा

एक बार मालिकाना हक के संबंध में विवाद का निपटारा हो जाता है तो यह वादी के खिलाफ हो जाता है,

विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963 – धारा 38 – स्थायी निषेधाज्ञा के लिए वाद से संबंधित

निषेधाज्ञा संपत्ति के असली मालिक के खिलाफ भी तभी दी जा सकती है, जब राहत चाहने वाला व्यक्ति संपत्ति का वैध कब्जा और आनंद ले रहा हो और कानूनी रूप से हकदार भी हो।

कानून की उचित प्रक्रिया को छोड़कर उसका निपटान ना करे

गंभीरधन के गढ़वी बनाम गुजरात राज्य और अन्य
Writ Petition (Civil) No.1525 OF 2019
बेन्च – न्यायमूर्ति एमआर शाह और न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना

किसी विश्वविद्यालय के कुलपति की नियुक्ति, यहां तक ​​कि राज्य के कानून के तहत भी,

यूजीसी के नियमों के प्रावधानों के विपरीत नहीं हो सकती है

ऐसे मामलों में जहां राज्य विधायिका केंद्रीय कानून के प्रतिकूल है,

केंद्रीय कानून “अनुच्छेद 254” के अनुसार प्रभावी होगा क्योंकि ‘शिक्षा’ सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची में एक तत्व है

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कुलपति बनने के लिए प्रोफेसर के रूप में 10 साल अनुभव जरूरी

🔴 कुलपति नियुक्ति के लिए क्या है यूजीसी का मानदंड: सर्वोच्च स्तर की सक्षमता, सत्यनिष्ठता, नैतिकता और संस्था के प्रति प्रतिबद्धता संपन्न व्यक्ति को ही कुलपति नियुक्त किया जायेगा. विवि में कम से कम 10 वर्ष का प्रोफेसर के रूप में अनुभव या प्रतिष्ठित अनुसंधान या शैक्षणिक संगठन में 10 वर्षों के शैक्षणिक नेतृत्व के साथ विशिष्ठ शिक्षाविद हो

📑 2 MARCH 2022

एफ लियानसांगा और एएनआर बनाम भारत संघ और ओआरएस
EXTRAORDINARY APPELLATE JURISDICTION
SPECIAL LEAVE PETITION (CIVIL) NOS. 32875-32876 OF 2018
बेंच – जस्टिस इंदिरा बनर्जी, जस्टिस जे.के. माहेश्वरी

लिमिटेशन एक्ट, 1963 – धारा 5 वादों पर लागू नहीं होती है, बल्कि सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश XXI के तहत आवेदनों को छोड़कर केवल अपीलों और आवेदनों पर लागू होती है

सीमा किसी विशेष पार्टी को कठोर रूप से प्रभावित कर सकती है, लेकिन इसे पूरी कठोरता के साथ लागू किया जाना है। जब क़ानून ऐसा निर्धारित करता है।

📑 28 FEBRUARY 2022

नगर परिषद गोंदिया बनाम दिवि वर्क्स एंड सप्लायर्स, एचयूएफ और अन्य
CIVIL APEAL NO 1530 OF 2022
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस बीवी नागरत्ना

संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत परमादेश रिट द्वारा “संविदाओं के विनिर्दिष्ट पालन” की अनुमति नहीं दी जा सकती

वाद के पक्षकार किसी भी नुकसान या क्षतिपूर्ति के लिए दीवानी अदालत के समक्ष उचित कार्यवाही शुरू करने के लिए स्वतंत्र

💡 यह भी जानना जरूरी –

निम्नलिखित स्थितियों में परमादेश रिट जारी नहीं किया जा सकता है-

• विभागीय निर्देश को प्रवर्तित कराने हेतु जिसमें वैधानिक बल नहीं है
• किसी को कार्य संपादित करने का आदेश देने के लिए जब कार्य विवेकाधीन प्रकृति का है एवं अनिवार्य नहीं है
• एक संविदात्मक दायित्व को लागू करने के लिए
• भारतीय राष्ट्रपति या राज्य के राज्यपालों के विरुद्ध परमादेश रिट जारी नहीं किया जा सकता है
• न्यायिक क्षमता में कार्य करने वाले उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध परमादेश रिट जारी नहीं किया जा सकता है

अमृतलाल बनाम शांतिलाल सोनी
CRIMINAL APPEAL NO . 301 OF 2022
( Arising out of SLP ( Crl . No. ) 5122 of 2019 )
बेंच – जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और विक्रम नाथ

468 सीआरपीसी के तहत परिसीमा अवधि की गणना कैसे करें ?

धारा 468 सीआरपीसी के तहत परिसीमा अवधि की गणना के उद्देश्य से “संबंधित तारीख”

शिकायत दर्ज करने की तारीख या अभियोजन की स्थापना की तारीख है

न कि जिस तारीख को मजिस्ट्रेट अपराध का संज्ञान लेता है 

📑 25 FEBRUARY 2022

सुरेश यादव @ गुड्डू बनाम छत्तीसगढ़ सरकार
CRIMINAL APPEAL NO. 1349 OF 2013
बेंच – न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी और न्यायमूर्ति विक्रम नाथ

एक चश्मदीद गवाह का साक्ष्य केवल इसलिए खारिज नहीं हो सकता कि जब मृतक पर बेरहमी से हमला किया जा रहा था तो उसने कथित तौर पर शोर नहीं मचाया या मृतक पर हमला होने पर हस्तक्षेप करने का प्रयास नहीं किया

इसी मामले में कहा गया –
(भारतीय दंड संहिता, 1860 – धारा 302)

चोटों की अत्यधिक संख्या वास्तव में एक से अधिक व्यक्तियों की भागीदारी के बारे में अनुमान नहीं लगाती है; बल्कि चोटों की प्रकृति और उनके आकार/आयाम की समानता से केवल यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उसे एक ही हथियार और एक ही व्यक्ति द्वारा बेरहमी से और बार-बार चाकू मारा गया था

नंदू सिंह बनाम छत्तीसगढ़ राज्य
बेंच – जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस एस. रवींद्र भट और जस्टिस पी एस नरसिम्हा

“परिस्थितिजन्य साक्ष्य” के मामले में MOTIVE (हेतुक) परिस्थितियों की श्रृंखला को पूरा करने के लिए एक महत्वपूर्ण कड़ी है

जहां परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर एक मामले में MOTIVE (हेतुक) की पूर्ण अनुपस्थिति हैं ,

वहां यह सदैव अभियुक्त के पक्ष में

अगर MOTIVE (हेतुक) साबित होता है तो यह परिस्थितिजन्य साक्ष्य की श्रृंखला में लिंक की आपूर्ति करेगा

“वही प्रत्यक्ष साक्ष्य ( direct evidence ) के मामले में MOTIVE (हेतुक) प्रासंगिक नहीं है।”

वहीद-उर-रहमान पारा            
बनाम
जम्मू और कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश 
बेंच – जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एमएम सुंदरेश

[ Sec 207 CrPC] क्या बचाव पक्ष संरक्षित गवाहों के संशोधित बयानों की प्रतियां प्राप्त करने के लिए धारा 207 सीआरपीसी के तहत उपाय का सहारा ले सकता है ? सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

धारा 173 सीआरपीसी के तहत, मुकदमे के सामान्य पाठ्यक्रम के दौरान सभी अभियोजन के बयान अभियुक्तों को प्रकट किए जा सकते हैं

लेकिन बयान का वह हिस्सा जो अप्रासंगिक या जिसका खुलासा जनहित में नहीं किया जा सकता, आरोपी को दी गई प्रतियों से हटाने का अनुरोध किया जा सकता है

धारा 207 सीआरपीसी जो आरोपी को पुलिस रिपोर्ट और अन्य दस्तावेजों की प्रतियों के दिए जाने के बारे में प्रावधान करती है,

जिसके के अंतर्गत मजिस्ट्रेट आरोपी को बयान सहित दस्तावेज के प्रति उपलब्ध कराने के लिए बाध्य है, हालांकि पुलिस अधिकारी अनुरोध कर सकता है कि इसके कुछ हिस्सों को बाहर रखा जाए

इसी तरह यूएपीए अधिनियम की धारा 44 की समीक्षा के बाद, जो गवाहों की सुरक्षा से संबंधित है, अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि इसका लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि गवाह की गवाही का वह हिस्सा जो पहचान प्रकट करता है, आरोपी को नहीं दिया जाता है। 

अर्थात यूएपीए मामलों में गवाह की पहचान और पता गुप्त रखेगी कोर्ट

📑 24 FEBRUARY 2022

श्री बाबूजी रावजी शाह बनाम एस हुसैन जैदी और अन्य
बेंच – न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी और न्यायमूर्ति जेके माहेश्वरी

केवल संवेदनाओं को ठेस पहुँचाना मानहानि नहीं है, यदि उस मानहानि से किसी व्यक्ति का चरित्र या श्रेय कम नहीं होता

📑 23 FEBRUARY 2022

बागवानी प्रयोग केंद्र गोनिकोप्पल, कूर्ग बनाम क्षेत्रीय भविष्य निधि संगठन
CIVIL APPEAL NO(S). 2136 OF 2012
बेंच – जस्टिस अजय रस्तोगी एवं जस्टिस अभय एस. ओका

सिविल दायित्वों के उल्लंघन के लिए दंड लगाने के लिए mens rea या actus reus एक आवश्यक तत्व नहीं है।

आपराधिक अपराध के लिए mens rea एक अनिवार्य या अनिवार्य शर्त

mens rea आपराधिक इरादे को संदर्भित करता है जबकि actus reus आचरण को संदर्भित करता है जो अपराध का घटक तत्व है।

📑 21 FEBRUARY 2022

X (Minor) Vs The State Of Jharkhand And Anr.
बेंच – जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और सूर्यकांत

एक बार प्रथम दृष्टया यह लगे कि पीड़िता नाबालिग है

तो उसके अभियुक्त के साथ प्रेम प्रसंग का कोई अर्थ नहीं है,

अभियुक्त को उस आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती।

अर्थात लव अफेयर का जमानत के लिए अप्रासंगिक आधार जब पीड़िता नाबालिग हो

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने यह आदेश झारखंड हाई कोर्ट के एक आदेश को पलटते हुए दिया जिसमें अभियुक्त को झारखंड हाईकोर्ट से मिली जमानत को पीड़िता (13) ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

अभियुक्त (20) को रांची में आईपीसी की धारा 376 और पोक्सो की धारा 6 के तहत जेल भेजा गया था। लेकिन हाईकोर्ट ने अगस्त 2021 को उसे जमानत दे दी थी।

हाईकोर्ट ने आदेश में कहा था कि धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष दिया गया बयान तथा एफआईआर में दिए गए तथ्यों को देखते हुए कहा जा सकता कि याचिकाकर्ता और अभियुक्त के बीच में प्रेम प्रसंग था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में हाईकोर्ट ने अभियुक्त को जमानत देकर गलती की है, क्योंकि लड़की के नाबालिग होने के कारण उसकी सहमति और असहमति का कोई मूल्य नहीं है।

📑 18 FEBRUARY 2022

बाबू वेंकटेश बनाम कर्नाटक राज्य
(आपराधिक अपील संख्या 252 का 2022)
बेंच – जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस कृष्ण मुरारी

जब शिकायत एक शपथ पत्र  द्वारा समर्थित ना हो तो मजिस्ट्रेट आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 156 (3) के तहत किसी आवेदन पर विचार नहीं कर सकता

कोर्ट ने माना कि सीआरपीसी की धारा 156 (3) के तहत याचिका दायर करने से पहले सीआरपीसी की धारा 154 (1) और 154 (3) के तहत एक शपथ पत्र दाखिल करना होता है।

ताकि आवेदन करने वाले व्यक्ति जागरूक हों और झूठा हलफनामा न दें। 

इस तरह की आवश्यकता के साथ, व्यक्तियों को सीआरपीसी की धारा 156 (3) के तहत मजिस्ट्रेट के अधिकार को लागू करने से रोका जाएगा, यदि शपथ पत्र गलत पाया जाता है, तो व्यक्ति कानून के अनुसार अभियोजन के लिए उत्तरदायी होगा

यूनिवर्सल पेट्रो केमिकल्स लिमिटेड बनाम बीपी पीएलसी और अन्य
बेंच – न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और बीआर गावई

क्या विशिष्ट प्रदर्शन के बदले मुआवजा दिया जा सकता है जब कि वाद में विशेष रूप से दावा नहीं किया गया

विशिष्ट अनुतोष अधिनियम 1963 – विशिष्ट प्रदर्शन के बदले मुआवजा तब तक नहीं दिया जा सकता जब तक विशेष रूप से वाद में दावा नहीं किया जाता

कोर्ट ने विशिष्ट अनुतोष अधिनियम 1963 की धारा 21(5) का उल्लेख किया

• “इस धारा के तहत कोई मुआवजा नहीं दिया जाएगा जब तक कि वादी ने अपने वाद में इस तरह के मुआवजे का दावा नहीं किया है

• बशर्ते कि जहां वादी ने वादपत्र में ऐसे किसी मुआवजे का दावा नहीं किया है, कोर्ट कार्यवाही के किसी भी चरण में, उसे ऐसे मुआवजे के दावे को शामिल करने के लिए, जो उचित हो, वादपत्र में संशोधन करने की अनुमति देगा।”

लकोस जकारिया और अन्य बनाम जोसेफ और अन्य
Criminal Appeal No 256 of 2022 ( Arising out of SLP ( Crl ) No 9556 of 2021 )
बेंच – जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस सूर्यकांत

यह मानने का आधार है कि आरोपी ने अपराध किया है,

न्यायिक मजिस्ट्रेट को यह तय करने से पहले

• सीआरपीसी की धारा 173 (2) के तहत प्रस्तुत प्रारंभिक अंतिम रिपोर्ट (initial final report) और

• धारा 173 (8) के तहत प्रस्तुत पूरक रिपोर्ट (supplementary report)

दोनों पर विचार करना चाहिए

📑 16 FEBRUARY 2022

कृष्णमूर्ति @ गुनोडु बनाम कर्नाटक राज्य
Criminal Appeal No.288 of 2022
( Arising out of Special Leave Petition ( Crl . ) No.6893 of 2021 )
बेंच – जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी

[ सामान्य आशय ]

यदि आपराधिक अपराध स्पष्ट रूप से दूरस्थ है और सामान्य आशय से असंबद्ध है, तो धारा 34 लागू नहीं होगी

भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 34 को आकर्षित नहीं किया जाता है यदि “अंतिम परिणाम” दूरस्थ और अपराधियों के बीच आम इरादे से असंबद्ध है।

प्री – कॉन्सर्ट या प्रीप्लानिंग मौके पर या अपराध के कमीशन के दौरान विकसित हो सकती है लेकिन महत्वपूर्ण परीक्षा यह है कि इस तरह की योजना को अपराध बनाने वाले अधिनियम से पहले होना चाहिए । सामान्य इरादा पहले या घटना के दौरान और पल के आधार पर बनाया जा सकता है ।

एक सामान्य आशय का अस्तित्व प्रत्येक मामले में तथ्य का प्रश्न है जिसे मुख्य रूप से मामले की परिस्थितियों से अनुमान के रूप में साबित किया जाना है ।

सामान्य इरादा अनिवार्य रूप से एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है क्योंकि इसके लिए पहले से दिमाग की बैठक की आवश्यकता होती है और इस सामान्य इरादे को पूर्व नियोजित होने की आवश्यकता नहीं है। यह पर्याप्त होगा, भले ही इरादा वास्तविक अधिनियम से एक मिनट पहले ही बना हो।  

एक सह-अपराधी, जो एक सामान्य इरादे को साझा करता है, केवल उस हद तक उत्तरदायी होगा। कि वह अंतिम अधिनियम की संभावना या संभावना की कल्पना करना चाहता है या कर सकता है या करना चाहिए था

📑 15 FEBRUARY 2022

बी आर पाटिल बनाम तुलसा वाई सावकर
CIVIL APPEAL NO. 1339 OF 2022
[@ SLP(C) No.22667 of 2019]
बेंच – जस्टिस केएम जोसेफ और जस्टिस हृषिकेश रॉय

सिविल प्रक्रिया संहिता का आदेश 2 नियम 3 ( वाद हेतुको का संयोजन )

एक वादी को एक ही मुकदमे में कार्रवाई के दो या दो से अधिक कारणों में शामिल होने के लिए मजबूर नहीं करता है

बल्कि केवल ऐसा करने की अनुमति देता है।

लेकिन अदालत ने यह भी कहा कि कार्रवाई के कारण से उत्पन्न होने वाले सभी दावों में शामिल नहीं होने के परिणाम भविष्य के वाद में वादी के लिए घातक हो सकते हैं।

सत्ये सिंह बनाम उत्तराखंड राज्य
CRIMINAL APPEAL NO. 2374 of 2014
बेंच – जस्टिस संजीव खन्ना और बेला एम त्रिवेदी

साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 “अभियोजन पक्ष” को 

अभियुक्त के अपराध को साबित करने के अपने कर्तव्य का निर्वहन करने से मुक्त करने के लिए नहीं है

साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 में निहित प्रावधानों को लागू करके भार को अभियुक्त पर स्थानांतरित नहीं किया जा सकता है

जब अभियोजन पक्ष मूल तथ्यों को साबित करने में असफल रहा हो

👉 साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 में प्रावधान है कि जब कोई तथ्य विशेष रूप से किसी व्यक्ति की जानकारी में होता है, तो उस तथ्य को साबित करने का भार उस पर होता है।

📑 10 FEBRUARY 2022

किशोर मधुकर पिंगलीकर बनाम ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया
CIVIL APPEAL NO. OF 2022
(ARISING OUT OF SPECIAL LEAVE PETITION (C) NO. 6637 OF 2019)
बेंच – जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी

किसी निकाय पर पब्लिक ड्यूटी या कार्य की उपस्थिति मात्र से यह संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत राज्य की परिभाषा के अंतर्गत नहीं आता है।

यह कहा जाना चाहिए कि एक ‘राज्य’ के रूप में एक निकाय का निर्धारण सिद्धांतों का एक कठोर सेट नहीं है।

यह देखा जाना चाहिए कि स्थापित किए गए संचयी तथ्यों के आलोक में “निकाय “

वित्तीय, कार्यात्मक और प्रशासनिक रूप से सरकार के नियंत्रण में है या नहीं,

भले ही नियंत्रण केवल नियामक हो, चाहे वह क़ानून के तहत हो या अन्यथा, यह निकाय को राज्य बनाने का काम नहीं करेगा।

साथ ही, किसी निकाय को अनुच्छेद 12 के दायरे में लाने के लिए सार्वजनिक कर्तव्य या कार्य के कुछ तत्वों की उपस्थिति अपने आप में पर्याप्त नहीं होगी। 

📑 09 FEBRUARY 2022

पप्पू बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
CRIMINAL APPEAL NOS. 1097-1098 OF 2018
बेंच – जस्टिस एएम खानविलकर, दिनेश माहेश्वरी और सीटी रविकुमार

जुर्म कितना भी खौफनाक क्यों ना हो, दोषी की मौत की सजा को कम किए जाने के कारणों पर जजों को विचार करना चाहिए

केवल अपराध की घृणित प्रकृति मौत की सजा देने के लिए निर्णायक कारक नहीं हो सकती, कम करने वाले कारक समान रूप से प्रासंगिक

दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 – धारा 354(3) – मौत की सजा – जब आरोपी को आपराधिक पूर्ववृत्त वाला व्यक्ति नहीं दिखाया जाता है और वह कठोर अपराधी नहीं है, तो यह नहीं कहा जा सकता है कि उसके सुधार की कोई संभावना नहीं है |

पुनर्वासित – बेदाग जेल आचरण और पत्नी, बच्चों और वृद्ध पिता का परिवार होना भी उनके सुधार की संभावना की ओर संकेत करेगा।

आपराधिक परीक्षण – परीक्षा से पहले मृत्यु का अनुमानित समय, जैसा कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दर्शाया गया है, गणितीय सटीकता के रूप में लागू नहीं किया जा सकता

आर जानकीअम्मल बनाम एस के कुमारसामी (मृत)
CA 439 OF 2022
बेंच – न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी

सहमति डिक्री को चुनौती देने के लिए एक अलग मुकदमा बनाए रखने योग्य नहीं

एक अनुबंध या समझौता जो शून्य या शून्यकरणीय है, उसे वैध नहीं माना जाएगा

CPC के आदेश 23 का नियम 3 A में प्रावधान है कि डिक्री को इस आधार पर रद्द करने के लिए कोई वाद नहीं होगा कि
“समझौता जिस पर डिक्री आधारित है वह वैध नहीं था।” 

नियम 3 “वैध अनुबंध या समझौता” अभिव्यक्ति का उपयोग करता है। संशोधन द्वारा जोड़ा गया स्पष्टीकरण प्रदान करता है कि एक अनुबंध या समझौता जो भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 के तहत शून्य या शून्यकरणीय होने योग्य है, को वैध नहीं माना जाएगा

📑 08 FEBRUARY 2022

कहकशां कौसर @ सोनम बनाम बिहार राज्य
CRIMINAL APPEAL NO. 195 OF 2022
(arising out of S.L.P (Crl.) No. 6545 OF 2020)
बेंच – जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर और जस्टिस कृष्ण मुरारी 

महिलाओं के खिलाफ क्रूरता को रोकने के लिए आईपीसी की धारा 498 ए को शामिल किया गया था। 

सामान्य आरोपों पर पति के रिश्तेदारों पर मुकदमा चलाना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग

क्या है IPC 498 A

इसका मुख्य उद्देश्य महिला को पति या उसके रिश्तेदारों की प्रताड़ना से बचाना था। अगर किसी पति या उसके रिश्तेदार महिला का उत्पीड़न करते हैं तो उन्हें 3 साल तक की सजा के साथ-साथ जुर्माना भी हो सकती है।

2014 में सुप्रीम कोर्ट में अर्नेश कुमार बनाम बिहार सरकार मामले में भी 498 A के दुरुपयोग पर चिंता जताई थी।

नवाबुद्दीन बनाम उत्तराखंड राज्य
[2022 की आपराधिक अपील 144]
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और बीवी नागरत्न

एक नाबालिग लड़की की योनि में उंगली डालने का कार्य यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो अधिनियम) 2012 के तहत

‘भेदक यौन हमले’ का अपराध

शीर्ष अदालत ने 75 वर्षीय एक व्यक्ति की दोषसिद्धि को बरकरार रखा, जिस पर 4 साल के बच्चे की योनि में अपनी उंगली डालने का आरोप लगाया गया था।

यह स्थापित और साबित हो गया है कि आरोपी ने अपनी उंगली योनि में प्रवेश की और इस वजह से पीड़ित लड़की को पेशाब में दर्द और जलन के साथ-साथ उसके शरीर पर दर्द भी महसूस हुआ और डॉक्टर द्वारा पाया गया योनि के चारों ओर लाली और सूजन थी।

हमारी राय है कि इसलिए मामला पॉक्सो अधिनियम की धारा 3 (बी) के तहत आएगा और इसे पेनेट्रेटिव यौन हमला कहा जा सकता है और पॉक्सो अधिनियम की धारा 5 (एम) को देखते हुए इस तरह का यौन हमला किया गया था।

चार साल (बारह साल से कम) की बच्ची को पोक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत दंडनीय ‘एग्रेटेड पेनेट्रेटिव सेक्शुअल असॉल्ट’ कहा जा सकता है । “

📑 07 FEBRUARY 2022

एसएफआईओ बनाम राहुल मोदी
Criminal Appeal Nos.185-186 of 2022
बेंच – जस्टिस एल नागेश्वर राव और बीआर गवई

क्या एक आरोपी सीआरपीसी की धारा 167 (2) के तहत वैधानिक जमानत का हकदार है, इस आधार पर कि 60 दिनों या 90 दिनों की समाप्ति से पहले संज्ञान नहीं लिया गया ?

एक आरोपी धारा 167 (2) के तहत इस आधार पर डिफ़ॉल्ट जमानत पर रिहाई की मांग नहीं कर सकता है,

कि 60 दिनों की समाप्ति से पहले संज्ञान नहीं लिया गया है।

चार्जशीट दाखिल करना दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 167 के प्रावधानों के पर्याप्त अनुपालन के बराबर होगा

आरोपी तब तक मजिस्ट्रेट की हिरासत में रहता है जब तक कि अदालत द्वारा अपराध का विचार करने के लिए संज्ञान नहीं लिया जाता है,

जो संज्ञान लेने के बाद रिमांड के उद्देश्य से आरोपी को हिरासत में लेती है।

किसी अभियुक्त का धारा 167 (2), सीआरपीसी के तहत वैधानिक जमानत लेने का अक्षम्य अधिकार केवल तभी उत्पन्न होता है जब आरोप पत्र वैधानिक अवधि की समाप्ति से पहले दायर नहीं किया गया हो

बी बोरैया प्रतिनिधि एलआरएस के माध्यम से बनाम एमजी तीर्थप्रसाद और अन्य
CIVIL APPEAL NO. OF 2022
(Arising from SLP(C) No. 31174 of 2016)
बेंच – जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस सीटी रविकुमार

क्या डिक्री के सुधार के लिए एक आवेदन जिसकी पुष्टि हाईकोर्ट द्वारा योग्यता के आधार पर दायर अपील पर निर्णय लेते समय की गई है, को ट्रायल कोर्ट द्वारा सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 153ए के अभिप्राय को ध्यान में रखते हुए सुधारा/बदला जा सकता है।

CPC धारा 153A (अपील और क्रास)

जब निचली अदालत के फैसले/डिक्री का उच्च न्यायालय के फैसले के साथ विलय हो जाता है, तो डिक्री में सुधार के लिए आवेदन केवल उस उच्च न्यायालय में दायर किया जा सकता है जहां डिक्री की पुष्टि की गई थी

📑 04 FEBRUARY 2022

अजंता एलएलपी बनाम कैसियो कंप्यूटर कंपनी लिमिटेड
Civil Appeal No. 1052 of 2022
बेंच – न्यायमूर्ति एल.एन. राव और न्यायमूर्ति बी.आर. गवई

अगर मान भी लिया जाए कि कोई गलती भी हुई तो सहमति डिक्री को तब तक संशोधित या बदला नहीं जा सकता जब तक गलती प्रत्यक्ष या स्पष्ट न हो

अन्यथा पक्षकार की गलतफहमी के आधार पर इस तरह के हर डिक्री को बदलने की मांग का खतरा हो सकता है

न्यायालय सिर्फ सीपीसी की धारा 151 के तहत सहमति डिक्री में परिवर्तन/संशोधन के लिए एक आवेदन पर विचार कर सकता है यदि वह धोखाधड़ी, गलत बयानी, या गलतफहमी से विकृत है।

सहमति से निर्णय का उद्देश्य पक्षों के बीच मुकदमेबाजी को रोकना है, जितना कि एक लंबी खींची गई लड़ाई के अंत में न्यायालय के निर्णय के परिणामस्वरूप एक निर्णय।

उत्तराखंड राज्य बनाम सचेंद्र सिंह रावत
CRIMINAL APPEAL NO. 143 OF 2022
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस बीवी नागरत्न

[ IPC 302 ] किन परिस्थितियों से हत्या के मामले में मंशा का पता लगाएं ? सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या

मौत का कारण बनने का इरादा जो IPC की धारा 302 के तहत एक घटक

• हथियार की प्रकृति,
• प्रहार का उद्देश्य शरीर किस भाग को लक्षित था,
• क्या कार्य पूर्व नियोजित था या नहीं ,
• चोट पहुंचाने में नियोजित बल की मात्रा
• कोई गंभीर और अचानक उकसावा
• कोई पूर्व दुश्मनी थी या मृतक एक अजनबी
• आरोपी ने एक ही वार किया या कई वार किए

इत्यादि जैसी परिस्थितियों से एकत्र किया जा सकता है

अजीत सिंह (मृतक) Thr. Lrs बनाम पद्मा भंडारी
Petition(s) for Special Leave to Appeal (C) No(s). 949/2022
बेंच – जस्टिस एसके कौल और जस्टिस एमएम सुंदरेश

डिक्री का फल तब तक महसूस नहीं किया जा सकता जब तक इसे निष्पादित नहीं किया जाता

जहां डिक्री का निष्पादन ही मुकदमेबाजी का दूसरा दौर बन जाता है, वहां डिक्री धारक को उसके फल का एहसास होने में उम्र लगती है

फिट केसेज को लॉ स्कूल के सिलेबस में शामिल किया जाएगा’ 50 साल पुराने सूट में मुकदमेबाजी के 5 वें दौर में सुप्रीम कोर्ट

सिविल डिक्री के निष्पादन को रोकने के लिए पांच दशकों में एक वादी और उसके उत्तराधिकारियों द्वारा शुरू की गई मुकदमेबाजी के पांच दौर से चकित सुप्रीम को सुप्रीम कोर्ट

राजेश यादव बनाम यूपी राज्य CRIMINAL APPEAL NOS . 339-340 OF 2014
बेंच – जस्टिस संजय किशन कौली , जस्टिस एम एम सुंदरशो

सुप्रीम कोर्ट ने गवाहों की परीक्षा के सिद्धांतों की व्याख्या

केवल इसलिए कि एक गवाह संयोग से किसी घटना को देखता है, उसकी गवाही को टाला नहीं जा सकता है, हालांकि कभी-कभी थोड़ी और जांच की आवश्यकता हो सकती है।

एक संबंधित गवाह भी एक प्राकृतिक गवाह हो सकता है और यदि उनका सबूत स्पष्ट, ठोस है, यदि न्यायालय साक्ष्य की गुणवत्ता से आश्वस्त है, यह विश्वसनीय साक्ष्य बन जाता है।

केवल गवाह की गैर-परीक्षा अभियोजन के मामले को खराब नहीं करेगी। आपराधिक मुकदमे में गवाह की गुणवत्ता मात्रा से अधिक होती है।

सीआरपीसी की धारा 173 (2) के तहत अंतिम रिपोर्ट जांच अधिकारी की उसके द्वारा एकत्र किए गए साक्ष्य पर एक राय मात्र है। इस तरह की रिपोर्ट की सच्चाई का फैसला अदालत ही कर सकती है। केवल तथ्य यह है कि जांच अधिकारी ने अदालत के समक्ष पेश नहीं किया है या पर्याप्त सहयोग नहीं किया है, एक आरोपी तर्क पर बरी होने का हकदार नहीं हो सकता है

राजेश यादव बनाम उत्तर प्रदेश सरकार
CRIMINAL APPEAL NOS. 339-340 OF 2014
बेंच – जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एम.एम. सुंदरेश

ट्रायल कोर्ट जहां तक संभव हो पहले निजी गवाहों का परीक्षण करें और एक ही दिन मुख्य गवाही और जिरह (क्रॉस-एक्जामिनेशन) को पूरा करने का प्रयास करें

📑 03 FEBRUARY 2022

ओखला औद्योगिक विकास प्राधिकरण (नोएडा) बनाम यूनुस
CIVIL APPEAL NO.901 OF 2022
बेंच – न्यायमूर्ति केएम जोसेफ और न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा

लोक अदालत द्वारा “पारित अवार्ड” “समझौता डिक्री” नहीं

विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 20 के अनुसार “लोक अदालत का कार्य किसी मामले में पक्षकारों के बीच विवादों के समाधान की सुविधा प्रदान करना है।

यह न्यायिक कृत्यों का अनुपालन नहीं करता तथा यह किसी मामले में निर्णायक भूमिका नहीं निभा सकता।

वास्तव में लोक अदालत मात्र पक्षकारों के मध्य समझौते की सुविधा प्रदान करता है।

इसी मामले में –

माननीय उच्चतम न्यायालय ने कहा कि , “विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 की धारा 20 के तहत लोक अदालत द्वारा पारित अवार्ड, भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 28ए के तहत मुआवजे के पुनर्निर्धारण का आधार नहीं हो सकता।”

समझौता डिक्री क्या है :-

समझौता डिक्री न्यायालय का निर्णय नहीं होता तथा इसमें न्यायिक निर्णय की क्षमता निहित नहीं होती। यह मात्र न्यायालय द्वारा कराई गई ऐसी स्वीकृति है, जिस पर पक्षकार सहमत हुए हैं।

इस अभिनिर्धारण से दो सिद्धांत स्पष्ट हुए :-

विधि निर्माताओं का उद्देश्य मात्र इसे डिक्री के समकक्ष प्रवर्तित करने की क्षमता प्रदान करना था।

अब अवार्ड को डिक्री मानने की विधिक संकल्पना शून्य हो जाएगी।

📑 01 FEBRUARY 2022

स्टेट ऑफ यूपी बनाम वीरपाल
CRIMINAL APPEAL NO.   34 OF 2022
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस बीवी नागरत्ना

अगर कोर्ट संतुष्ट है कि मृत्यु से पहले कि गई घोषणा सही और स्वैच्छिक है, तो बिना पुष्टि के ही मृत्यु कालिक घोषणा के आधार पर दोषसिद्धि की जा सकती है

जोगी राम बनाम सुरेश कुमार
CIVIL APPEAL NOS.1543-1544 OF 2019
बेंच – जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एमएम सुंदरेश

पत्नी को दी गई “सीमित संपत्ति” 

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 14 के तहत उसकी “पूर्ण संपत्ति” हो सकती है 

यदि “सीमित संपत्ति” उसके “भरण-पोषण के लिए” लिए दी गई थी

“हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14 (1) का उद्देश्य यह नहीं हो सकता है कि एक हिंदू पुरुष जिसके पास स्व-अर्जित संपत्ति है, वह एक महिला को सीमित संपत्ति देने वाली वसीयत को निष्पादित करने में असमर्थ है , यदि भरण-पोषण सहित अन्य सभी पहलुओं का ध्यान रखा जाता है।”

📑 31 JANUARY 2022

पप्पू तिवारी बनाम झारखंड राज्य
CRIMINAL APPEAL NO.1492 OF 2021
बेंच – जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एमएम सुंदरेश

आरोपी अन्यत्रता (alibi) की याचिका स्थापित करना चाहता है, तो उसे साबित करने का बोझ उस पर भारी  

ताकि घटना के स्थान पर आरोपी की उपस्थिति की संभावना को पूरी तरह से हटाया जा सके

अर्थात अन्यत्रता (alibi) की याचिका को स्थापित करने का भार अभियुक्तों पर अधिक है

➡️ अन्यत्रता (alibi) की याचिका – जब आरोपी ऐलिबी की दलील देता है, तो इसका मतलब है कि आरोपी अदालत को यह समझाने और समझाने की कोशिश कर रहा है कि जिस समय अपराध हुआ था, वह किसी और जगह पर है ।

Read with IEA 1872 SEC 11 & 103

पप्पू तिवारी बनाम झारखंड राज्य
CRIMINAL APPEAL NO.1492 OF 2021
बेंच – जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एमएम सुंदरेश

एक मामले को उचित संदेह से परे साबित करते हुए, आरोपी को बरी होने का बहाना खोजने के लिए ‘निटपिक’ नहीं खोजना चाहिए। 

किसी भी खामी को छोड़ने से अभियोजन पक्ष को हमेशा लाभ होगा।

📑 28 JANUARY 2022

आशीष शेलार बनाम महाराष्ट्र विधान सभा
[रिट याचिका (सिविल) संख्या 797 of 2021]
बेंच – जस्टिस एएम खानविलकर , दिनेश माहेश्वरी और सीटी रविकुमार 

राज्य विधानसभाओं की शक्तियों और विशेषाधिकारों का प्रयोग करने के लिए बनाए गए नियम

संविधान के अनुच्छेद 13 के अर्थ के भीतर “कानून” का गठन करते हैं।

न्यायालय ने कहा कि विधान सभा द्वारा अनुच्छेद 208 के तहत बनाए गए नियम संविधान के अनुच्छेद 21 के उद्देश्य के लिए ” कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया “

📑 27 JANUARY 2022

के अरुमुगा वेलैया बनाम पी आर रामासैमी
CIVIL APPEAL NO.2564 OF 2012
बेंच – जस्टिस एल नागेश्वर राव, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस बीवी नागरत्ना 

बटवारे (partition) का एक दस्तावेज जो भविष्य में संपत्तियों के विभाजन को प्रभावी बनाने का प्रावधान करता है

पंजीकरण अधिनियम की धारा 17 के तहत अनिवार्य रूप से पंजीकरण योग्य नहीं है

अर्थात कोई दस्तावेज जो अचल संपत्ति में अपने आप में कोई अधिकार या रुचि पैदा नहीं करता है, बल्कि केवल एक अन्य दस्तावेज प्राप्त करने का अधिकार बनाता है, पंजीकरण की आवश्यकता नहीं है और तदनुसार साक्ष्य में स्वीकार्य 

📑 25 JANUARY 2022

पंजाब राज्य बनाम अंशिका गोयल और अन्य
CIVIL APPEAL NO. 317 OF 2022
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस बीवी नागरत्ना

भले ही सार्वजनिक सेवाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के कम प्रतिनिधित्व को न्यायालय के ध्यान में लाया गया हो

फिर भी राज्य सरकार को आरक्षण प्रदान करने के लिए न्यायालय द्वारा कोई “परमादेश” जारी नहीं किया जा सकता

“राज्य सरकार” के पास इस तरह का प्रावधान करने की शक्ति है

Read With Art 15 , 16 ‘ 16(4) (4a)

➡️ सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब हाईकोर्ट के फैसले के उस हिस्से को रद्द कर दिया, जिसमें पंजाब सरकार को राज्य के सरकारी मेडिकल और डेंटल कॉलेज में खेल कोटा में एक प्रतिशत की बजाय तीन फीसदी आरक्षण देने का निर्देश दिया गया था।

➡️ शीर्ष अदालत ने कहा कि कोर्ट आरक्षण देने के लिए रिट जारी नहीं कर सकती हैं। उच्च न्यायालय के साल 2019 के फैसले के खिलाफ पंजाब सरकार की अपील पर सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आया।

जोसेफ़ स्टीफ़न बनाम संथानासामी
CrA 92-93 of 2022
कोरम – जस्टिस एमआर शाह और संजीव खन्ना

उच्च न्यायालय धारा 401 CRPC के तहत पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते हुए दोषमुक्ति को दोषसिद्धि में परिवर्तित नहीं कर सकता

➡️ यदि ट्रायल कोर्ट द्वारा बरी करने का आदेश पारित किया गया है, तो उच्च न्यायालय मामले को ट्रायल कोर्ट को भेज सकता है और यहां तक ​​कि सीधे पुनर्विचार भी कर सकता हैं

➡️ और यदि बरी करने का आदेश प्रथम अपीलीय अदालत द्वारा पारित किया जाता है, तो उस मामले में, उच्च न्यायालय के पास दो विकल्प उपलब्ध हैं –

( i ) अपील की सुनवाई के लिए मामले को प्रथम अपीलीय न्यायालय में भेजना या

( ii ) उपयुक्त मामले में मामले को फिर से विचारण के लिए ट्रायल कोर्ट में भेजना ।

जोसेफ़ स्टीफ़न बनाम संथानासामी
CrA 92-93 OF 2022
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस संजीव खन्ना 

CRPC धारा 372 में 2009 के संशोधन के बाद और CRPC की धारा 372 के प्रावधान को सम्मिलित करने के बाद

बरी करने के आदेश के खिलाफ पीड़ित का अपील करने का अधिकार एक “वैधानिक अधिकार” 

और “विशेष अनुमति” प्राप्त करने की कोई आवश्यकता नहीं 

“धारा 372 के प्रोविज़ो” सीआरपीसी की धारा 378 की उपधारा (4) की तरह अपील के लिए विशेष अनुमति प्राप्त करने की कोई शर्त निर्धारित नहीं करते हैं

📑 21 JANUARY 2022

सुनील कुमार मैती बनाम स्टेट बैंक ऑफ इंडिया
CA 432 OF 2022
बेंच – जस्टिस संजीव खन्ना और बेला एम. त्रिवेदीक

धारा 5 परिसीमा अधिनियम दीवानी न्यायालय में दीवानी वाद की संस्थिती पर लागू नहीं होता है

सीमा अधिनियम 1963 की धारा 5 में प्रावधान है कि सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश XXI के किसी भी प्रावधान के तहत आवेदन के अलावा एक अपील या कोई आवेदन निर्धारित अवधि के बाद स्वीकार किया जा सकता है यदि अपीलकर्ता या आवेदक अदालत को संतुष्ट करता है कि वह ऐसी अवधि के भीतर अपील न करने या आवेदन करने का पर्याप्त कारण था।

मस्त रेहाना बेगम बनाम असम राज्य और अन्य
Criminal Appeal No 118 of 2022
(Arising out of SLP(Crl) No 559 of 2022)
बेंच – न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति बेला त्रिवेदी

भारतीय दंड संहिता की धारा 494/495 के तहत द्विविवाह (किसी से शादी करते हुए पहले से ही किसी अन्य व्यक्ति से शादी) के संबंध में एक शिकायत को रद्द करने के लिए

“उच्च न्यायालय” पिछली शादी से संबंधित “फैमिली कोर्ट” के निष्कर्षों पर भरोसा कर सकता है

भारतीय दंड संहिता की धारा 494 और 495 के तहत आपराधिक कार्यवाही – जो कि द्विविवाह से संबंधित है – की अनुमति देने का हाईकोर्ट का फैसला, 

फैमिली कोर्ट के इस निष्कर्ष के बावजूद कि पत्नी की पूर्व शादी नहीं हुई थी , प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा

📑 फैमिली कोर्ट एक्ट 1984 की धारा 7(1) का स्पष्टीकरण (बी) स्पष्ट रूप से फैमिली कोर्ट को किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति का निर्धारण करने का अधिकार देता है। अधिनियम एक फैमिली कोर्ट को जिला न्यायालय का दर्जा प्रदान करता है और इसे सीआरपीसी के अध्याय IX के तहत प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा प्रयोग करने योग्य अधिकार क्षेत्र प्रदान करता है, इस प्रकार इस तरह के निर्धारण के लिए साक्ष्य एकत्र करने में सक्षम बनाता है।

👉 भारतीय दंड संहिता की धारा 494 मौजूदा पति या पत्नी के जीवनकाल में दोबारा शादी करने के अपराध से संबंधित है और धारा 495 उस व्यक्ति से पूर्व विवाह को छिपाने के अपराध से संबंधित है जिसके साथ बाद में शादी का अनुबंध किया गया है।

📑 20 JANUARY 2022

अरुणाचल गौंडर (मृत) बनाम पोन्नुसामी
CIVIL APPEAL NO. 6659 OF 2011
बेंच – न्यायमूर्ति एस अब्दुल नज़ीर और न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी

क्या एक इकलौती बेटी को अपने पिता की अलग-अलग संपत्ति (हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के लागू होने से पहले) विरासत में मिल सकती है ?

हिंदू पर्सनल लॉ के संहिताकरण से पहले भी बेटियों को अपने पिता की संपत्ति पर समान अधिकार

संपत्ति के बंटवारे पर भी विरासत लागू होगी, भले ही पिता की मृत्यु 1956 से पहले हो गई हो। साथ ही परिवार के अन्य संपार्श्विक सदस्यों पर उन्हें वरीयता मिलेगी”

साथ ही कोर्ट ने कहा कि यदि एक हिंदू महिला बिना किसी वसीयत को छोड़े मर जाती है, तो उसके पिता या माता से विरासत में मिली संपत्ति उसके पिता के उत्तराधिकारियों के पास जाएगी, जबकि उसके पति या ससुर से विरासत में मिली संपत्ति उसके वारिसों के पास जाएगी

ये फैसला मद्रास उच्च न्यायालय के उस फैसले के खिलाफ अपील पर आया है जो हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत हिंदू महिलाओं और विधवाओं के संपत्ति अधिकारों से संबंधित था

📑 18 JANUARY 2022

बी. एल. कश्यप एंड सन्स लिमिटेड बनाम जेएमएस स्टील एंड पावर कॉरपोरेशन
CIVIL APPEAL NO. ……..…. OF 2022
(ARISING OUT OF SLP (C) NO. 19413 OF 2018)
बेंच – माननीय न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर, माननीय न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी, माननीय न्यायमूर्ति सी.टी. रवि कुमार

CPC 1908 के आदेश 37 के नियम 3

बचाव के लिए अनुमति देना (सशर्त या बिना शर्त) सामान्य नियम और बचाव के लिए अनुमति का इनकार एक अपवाद

कोर्ट ने संबंधित फैसले में नागरिक प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) 1908 के आदेश 37 के नियम 3 के दायरे पर चर्चा की है।

CPC का आदेश 37 ‘समरी प्रोसीजर’ से संबंधित है और उसके नियम 3 में प्रतिवादी की उपस्थिति संबंधी प्रक्रिया शामिल है।

उक्त नियम के अनुसार, उपस्थित होने वाले प्रतिवादियों को इस तरह के मुकदमे का बचाव करने के लिए अनुमति लेनी पड़ती है, और बचाव के लिए अनुमति बिना शर्त या ऐसी शर्तों पर दी जा सकती है जो कोर्ट या न्यायाधीश को न्यायपूर्ण प्रतीत हो।

इसमें यह भी कहा गया है कि बचाव के लिए अनुमति से इनकार नहीं किया जाएगा, जब तक कि कोर्ट संतुष्ट न हो कि प्रतिवादी द्वारा बताए गए तथ्यों से यह संकेत नहीं मिलता है कि उसके पास बचाव के पर्याप्त मुद्दे हैं या प्रतिवादी द्वारा बचाव का इरादा तुच्छ है या कपटपूर्ण है।

जी.टी. गिरीश बनाम वाई. सुब्बा राजू (मृत) एलआर और अन्य द्वारा
CIVIL APPEAL NO. 380 OF 2022
[@ SPECIAL LEAVE PETITION [C] NO. 6857/2017]
बेंच – जस्टिस केएम जोसेफ और पीएस नरसिम्हा

[Section 52 TP Act]
Doctrine of “Lis Pendens”and Effect of Transfer of Property Pending Suit

संपत्ति का स्थानांतरण केवल इसलिए शून्य नहीं हो जाता क्योंकि यह मुकदमेबाजी के लंबित रहने के दौरान किया गया है, धारा 52 ट्रान्स्फ़र ओफ़ प्रॉपर्टी ऐक्ट का प्रभाव यह है कि स्थानांतरण मुकदमे के परिणाम के अधीन होता है

कोर्ट ने यह भी कहा कि वास्तविक खरीद या नोटिस की कमी के खरीदार के बचाव लिस पेंडेंस के सिद्धांत के खिलाफ अप्रभावी हैं।

सूट बेचने वाले पक्ष का अधिकार को समाप्त नहीं कर देता है। संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम की धारा 52 में केवल यह कहा गया है कि कार्यवाही के लंबित रहने के दौरान किए गए स्थानान्तरण मुकदमे के परिणाम के अधीन हैं।

📑 12 JANUARY 2022

दीपक शर्मा बनाम हरियाणा राज्य
CrA 83 of 2022
बेंच – जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जेके माहेश्वरी

विदेश यात्रा करने के लिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार से केवल एक व्यक्ति को इसलिए इनकार नहीं किया जा सकता है क्योंकि उसे धारा 498 ए के तहत आरोपी के रूप में दिखाया गया है, जो उसके भाई की पत्नी द्वारा उसके भाई और परिवार के खिलाफ दायर की गई शिकायत है।

दीपक शर्मा बनाम हरियाणा राज्य
CRIMINAL APPEAL NO. 83 OF 2022
(Arising out of S.L.P.(CRL.) No. 9762 OF 2021)
बेंच – जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जेके माहेश्वरी   

सुरक्षा उद्देश्यों के लिए आभूषणों को हिरासत में लेना आईपीसी की धारा 498 ए के तहत क्रूरता के रूप में गठित नहीं किया जा सकता है ।

📑 11 JANUARY 2022


गारमेंट क्राफ्ट बनाम प्रकाश चंद गोयल
CIVIL APPEAL NO . OF 2022 ( ARISING OUT OF S.L.P. ( C ) NO . 13941 OF 2021 )
बेंच – जस्टिस संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति बेला एम. त्रिवेदी 

[अनुच्छेद 227] पर्यवेक्षी क्षेत्राधिकार (supervisory jurisdiction) का प्रयोग करने वाला उच्च न्यायालय प्रथम अपील न्यायालय के रूप में साक्ष्य की पुन: सराहना नहीं कर सकता

अनुच्छेद 227 के तहत शक्ति का प्रयोग उचित मामलों में किफायत से किया जाता है, जैसे न्यायोचित ठहराने के लिए यदि कोई सबूत नहीं है, या निष्कर्ष इतना विकृत है कि कोई भी तार्किक व्यक्ति संभवतः निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सकता, जिस निष्कर्ष पर न्यायालय या न्यायाधिकरण पहुंचा हो

हरियाणा टूरिज्म लिमिटेड बनाम मेसर्स कंधारी बेवरेजेज लिमिटेड
CA 266 OF 2022
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और बीवी नागरत्न

हाईकोर्ट मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 37 के तहत एक अपील में दावे के गुणदोष की जांच नहीं कर सकता है।

भारत संघ और अन्य बनाम शेख इस्तियाक अहमद और अन्य।
Criminal Appeal No.71 of 2022
(Arising out of SLP (Crl.) No. 7723 of 2019)
बेंच – जस्टिस एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति बी आर गवई

क्या एक विदेशी अदालत द्वारा एक भारतीय अपराधी, जिसे भारत प्रत्यावर्तित किया गया है, पर लगाया गया दंड भारत में इसी तरह के अपराध के लिए सजा से अधिक हो सकता है

कोर्ट ने माना कि सजा की अवधि विदेश और भारत के बीच स्थानांतरण के समझौते से नियंत्रित होगी। भारत सरकार विदेशी अदालत की सजा को तभी संशोधित कर सकती है जब ऐसी सजा “भारतीय कानून के साथ असंगत” हो।

केवल इसलिए कि विदेशी अदालत की सजा भारतीय कानून के तहत उससे अधिक है, यह “भारतीय कानून के साथ असंगत” नहीं हो जाती है।

यहां “असंगति” का अर्थ भारत के मौलिक कानूनों के विपरीत होगा।

📑 7 JANUARY 2022

जसदीप सिंह जस्सू बनाम पंजाब राज्य
CRIMINAL APPEAL NO.1584 of 2021
(@SLP (CRL.) NO. 11816 OF 2019)
बेंच – जस्टिस संजय किशन कौल और एमएम सुंदरेश

केवल कथन या सामान्य इरादे से IPC की धारा 34 लागू नहीं हो सकती,जब तक कि इस तरह के इरादे को आगे बढ़ाने में कोई कार्य नहीं किया जाता है

किसी अदालत को इस प्रावधान के तहत किसी को आरोपित करने से पहले सबूतों का विश्लेषण और मूल्यांकन करना होगा।

धारा 33 आईपीसी एकल कृत्य के रूप में कृत्यों की एक श्रृंखला को अपने अंदर लाती है। इसलिए, धारा 34 से 39 आईपीसी को आकर्षित करने के लिए, कई व्यक्तियों द्वारा किए गए कृत्यों की एक श्रृंखला एक एकल कृत्य से संबंधित होगी, जो एक अपराध का गठन करता है।

धारा 34 आईपीसी एक सामान्य इरादे के अनुसरण में, एक के द्वारा किए गए अपराध का गठन करने वाले एक आपराधिक कृत्य को दूसरों में शामिल करके और आयात करके एक काल्पनिक कल्पना का निर्माण करता है

यह फ़ुटबॉल के खेल के समान एक टीम प्रयास है जिसमें डिफेंडर, मिड-फील्डर, स्ट्राइकर और कीपर जैसे कई पोज‌िशन को शामिल किया जाता है। एक स्ट्राइकर लक्ष्य को हिट कर सकता है, जबकि एक कीपर एक हमले को रोक सकता है। मैच का परिणाम, या तो जीत या हार, सभी खिलाड़ियों द्वारा वहन किया जाता है, हालांकि उनकी अपनी अलग भूमिका हो सकती है। एक गोल किया गया या बचाया गया अंतिम कार्य हो सकता है, लेकिन परिणाम वही है जो मायने रखता है। विशिष्ट व्यक्तियों के विपरीत, जिन्होंने अधिक प्रभावित किया था, परिणाम खिलाड़ियों के बीच साझा किया जाता है। यही तर्क धारा 34 आईपीसी की नींव है जो उन लोगों पर साझा दायित्व बनाता है जिन्होंने अपराध करने का सामान्य इरादा साझा किया था।

📑 06.01.2022

भारत संघ बनाम अलपन बंद्योपाध्याय
CIVIL APPEAL NO.197 OF 2022
(Arising out of SLP(C)No.18338/2021)
बेंच – जस्टिस ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति सी टी रविकुमार 

एक ट्रिब्यूनल के किसी भी फैसले (प्रशासनिक ट्रिब्यूनल अधिनियम, 1985 की धारा 25 के तहत पारित एक फैसले सहित) की जांच केवल उस हाईकोर्ट द्वारा की जा सकती है, जिसके पास उक्त ट्रिब्यूनल पर क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र है।

संविधान पीठ द्वारा एल चंद्रकुमार फैसले में निर्धारित शासन का उल्लेख किया, “संविधान के अनुच्छेद 323 ए और 323 बी के तहत बनाए गए ट्रिब्यूनल के सभी निर्णय हाईकोर्ट की एक डिवीजन बेंच के समक्ष जांच के अधीन होंगे, जिसके अधिकार क्षेत्र में संबंधित ट्रिब्यूनल आता है।”

📑 05.01.2022

भादर राम (डी) बनाम जस्सा राम
CA 5933 of 2021
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और एएस बोपन्ना

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति को केवल उसके मूल राज्य का माना जाता है, जहां वह स्थायी निवासी है, न कि उस राज्य का जहां वह प्रवास करता है

महेंद्र बनाम मध्य प्रदेश सरकार
CRIMINAL  APPEAL  NO(S). 30  OF  2022
(Arising out of SLP(Crl.)No.6530/2018)
बेंच – जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस अभय एस. ओका

[धारा 149 IPC ] क्या विधि विरुद्ध जमाव ( Unlawful Assembly ) के लिए पांच से कम व्यक्तियों पर आरोप लगाया जा सकता है ?

गैरकानूनी रूप से जमा होने की एक अनिवार्य शर्त कि इसमें सदस्यों की संख्या पांच या इससे अधिक होनी चाहिए

लेकिन पांच से कम व्यक्तियों को धारा 149 के तहत भी आरोपित किया जा सकता है,

“यदि अभियोजन पक्ष के पास यह मामला है कि न्यायालय के समक्ष गैरकानूनी जमावड़ा वाले व्यक्तियों की संख्या पांच से अधिक है , जिनमें से अन्य ऐसे व्यक्ति हैं जिनकी पहचान नहीं की गई है और वे निहत्थे (unarmed) हैं”

📑 04.01.2022

राजस्थान मरुधरा ग्रामीण बैंक (आरएमजीबी) बनाम रमेश चंद्र मीणा
CA 7451 of 2021
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और संजीव खन्ना

विभागीय कार्यवाही में एक दोषी कर्मचारी को अपनी पसंद के वकील या एजेंट के माध्यम से प्रतिनिधित्व करने का कोई संपूर्ण अधिकार नहीं है, जब तक कि कानून विशेष रूप से ऐसा अधिकार प्रदान नहीं करता है । जहां तक ​​अपराधी के सुनवाई के अधिकार का संबंध है, नैसर्गिक न्याय के नियम की आवश्यकता वकील या एजेंट के माध्यम से प्रतिनिधित्व करने के अधिकार तक विस्तारित नहीं हो सकती है

📑 03.01.2022

राजेंद्र भगत बनाम झारखंड राज्य
CRA OF 2022
कोरम: जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और विक्रम नाथ

जब वैवाहिक विवादों का वास्तविक समाधान हो तो IPC की धारा 498A की सजा को बरकरार नहीं रखा जाना चाहिए

📑 02.01.2022

नील ऑरेलियो नून्स एंड अन्य बनाम भारत संघ और अन्य और यश टेकवानी और अन्य बनाम चिकित्सा परामर्श समिति और अन्य
बेंच – जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एएस बोपन्ना 

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि रु 8 लाख वार्षिक आय आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के तहत कोटा की गणना के लिए एक उचित और न्यायसंगत मानदंड है । केंद्र सरकार द्वारा कोर्ट को तैयार की गई विशेषज्ञ समिति ने कहा कि मानदंड बदलने की जरूरत नहीं है।

📑 17.12.2021

बृजमणि देवी बनाम पप्पू कुमार और अन्य
CRIMINAL APPEAL NO. OF 2021 (ARISING OUT OF SLP (CRL.) NO.6335 OF 2021)
बेंच – न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव, न्यायमूर्ति बी.आर. गवई, न्यायमूर्ति बीवी नागरत्न

अदालत को जमानत देते समय विस्तृत कारण बताने की जरूरत नहीं है, खासकर जब मामला शुरुआती चरण में हो और आरोपी द्वारा किए गए अपराधों के आरोपों को पुख्ता नहीं किया गया हो

जस्टिस एल नारेश्वर राव की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि जमानत देते वक्त उसके कारणों को इस विस्तार से नहीं दिया जा सकता है जिससे ऐसा लगे कि उस मामले में आरोपित को सजा मिलेगी या वह बरी हो जाएगा। शीर्ष अदालत ने कहा कि आरोपित के खिलाफ लगाए गए आरोपों की प्रकृति, आरोप साबित होने पर दोष सिद्धि और सजा की गंभीरता, गवाहों के प्रभावित होने की उचित आशंका, सुबूतों से छेड़छाड़, अरोपित का पूर्व आपराधिक इतिहास, अभियुक्त के विरुद्ध आरोप को लेकर अदालत के प्रथम दृष्टया संतोष के बीच संतुलन बनाना होगा।

📑 16.12.2021

महिंद्रा एंड महिंद्रा फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड बनाम महेशभाई टीनाभाई राठौड़
CA 11477 OF 2014
बेंच – सीजेआई एनवी रमना, एएस बोपन्ना और हिमा कोहली

मध्यस्थता अधिनियम की धारा 34 (3) के तहत निर्धारित सीमा अवधि से परे देरी को माफ करने के लिए,  परिसीमा सीमा की धारा 5 लागू नहीं हो सकती है

📑 13.12.2021

एन. राघवेंद्र बनाम आंध्र प्रदेश राज्य
CRIMINAL APPEAL NO. 5 OF 2010
बेंच – NV रमण जस्टिस सूर्य कांत और न्यायमूर्ति हिमा कोहली

बैंक में ग्राहक द्वारा जमा किया गया पैसा बैंक के पास ट्रस्टी के रूप में नहीं होता है, बल्कि यह बैंकर के फंड का एक हिस्सा बन जाता है, जो एक ग्राहक द्वारा जमा की गई राशि का भुगतान करने के लिए संविदात्मक दायित्व के तहत होता है, जो कि ब्याज की सहमत दर के साथ मांग पर होता है

📑 03.12.2021

उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य बनाम ऐश्वर्या पांडेय
Petition(s) for Special Leave to Appeal (C) No(s). 19255/2021
बेंच – जस्टिस एमआर शाह और बीवी नागरत्ना

अनुकंपा के आधार पर नियुक्त कर्मचारी और नियमित आधार पर नियुक्त कर्मचारी के अलग-अलग वेतनमान नहीं हो सकते हैं और जिस क्षण किसी व्यक्ति को किसी विशेष पद पर नियुक्त किया जाता है, वह व्यक्ति वेतन का हकदार होता है- भले ही नियुक्ति अनुकंपा के आधार पर ही क्यों न हो।

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